नई दिल्ली। हैदराबाद बम ब्लास्ट में 16 लोगों की मौत हो गई और 117 लोग जख्मी हुए। सवाल ये है कि इन लोगों का कसूर क्या था। आखिर आतंक के आका बेगुनाहों की हत्या और परिवारों को तबाह करके कौन सा मकसद हासिल करना चाहते हैं। हैदराबाद धमाकों के पीड़ित रोते बिलखते परिवारों को पता भी नहीं है, कि आखिर हर बार वो क्यों बनते हैं शिकार।
तस्वीर वही है। बस चेहरा बदला है। दर्द वही है बस किरदार बदल गए हैं। सालों से लगातार आतंक का शिकार हो रहे हैं ये लोग। दो जून के रोटी के जुगाड़ में दिन रात हाड़ तोड़ रहे ये लोग जीने की जद्दोजहद कर रहे थे। जिंदगी क्या पहले ही कम मुश्किल थी। जो इसे और दूभर बना दिया चंद नफरत पसंद लोगों ने।
मरने वाले एक युवक सईदा की मां रोए जा रही है। अस्पताल के बाहर जो आ रहा है इसे चुप कराने की कोशिश कर रहा है। लेकिन मां का कलेजा मानों फटा जा रहा है। आंसू रोके नहीं रुक रहे हैं। घंटों बीत गए। गले ने साथ छोड़ दिया है। लेकिन अपने बेटे की हालत ने उसे बेहाल कर दिया है।
एल सईदा नायक नाम का ये युवक नालगोंडा का रहने वाला था। अपने घर से दूर हैदराबाद के दिलखुश नगर में रहकर वो इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। शहर में अकेले रहकर अपने परिवार के सपने को साकार करने जुटा हुआ था। सबकुछ बेच कर पूरा परिवार उसे पढ़ाने में जुटा था। जैसे ही मां को बेटे के हालत की खबर मिली वो नालगोंडा से भागी चली आई। अब अपने रिश्तेदारों के साथ वो बेटे की खैर मनाने में जुटी है।
अस्पताल के बिस्तर घायलों से भरे हैं। जहां तक निगाह जाती है रोते बिलखते और दर्द से कराहते लोग। किसी की टांग चली गई। तो किसी के शरीर में घुसे लोहे के टुकड़ों की वजह से कई ऑपरेशन करने पड़े। यहीं पैसठ साल के डी हथिय्या की बहू का रो रो कर बुरा हाल है। मजदूरी कर अपनी जिंदगी गुजारने वाला ये परिवार अपनी छोटी सी बच्ची अर्चना का इलाज कराने नालगोंडा से हैदराबाद आया था।
डॉक्टर से बेटी को दिखाने के बाद ये लोग दिलसुख नगर के बस स्टैंड के पास नालगोंडा वापस जाने के लिए पहुंचे। तभी तेज धमाका हुआ। और इस धमाके में पूरा परिवार जख्मी हो गया। परिवार के सभी सात लोग धमाके की चपेट में आए। दो की हालत गंभीर है, एक का पैर काटना पड़ा। जबकि कई शरीर पर हल्के जख्म लेकर दर्द से जूझ रहे हैं। नन्ही बच्ची अर्चना की बहन जिंदगी और मौत से जूझ रही है। जबकि अर्चना को भी हल्की चोट लगी है।
चेहरे अलग हैं लेकिन दर्द एक है। आंतकियों की नापाक करतूत ने इन्हें सिर्फ एक दिन का दर्द नहीं दिया है। ये जख्म जिंदगी भर के हैं। इस बुजुर्ग दंपत्ति को समझ में नहीं आ रहा है कहां जाए, क्या करे। किससे जाकर अपने दिल का दर्द बयान करें। घर का कमाने वाला बेटा धमाके में बुरी तरह से घायल होकर क्रिटिकल केयर यूनिट में पड़ा है।
चालीस साल के यदागिरी गौड़ के मां-बाप का भी ऐसा ही हाल है। वो एक रियल इस्टेट फर्म में काम करते थे। अपनी कंपनी का कंप्यूटर ठीक कराने वो गुरुवार शाम दिलसुख नगर पहुंचे थे। लेकिन बम के शिकार हो गए। ये बुजुर्ग मां बाप अब बस इतना चाहते हैं किसी तरह उनका बेटा ठीक हो जाए।
किससे पूछें ये कि आखिर इन्हें किस गलती की सजा मिली है। किससे कहें ये कि सियासत, धर्म, जात से ज्यादा बड़ी चीज इनके लिए जिंदगी की जद्दोजहद है। सुबह और शाम की दो रोटी है। बच्चों का भविष्य है। किसे बताएं ये कि जिंदगी में इन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया कि इन्हें उसकी ऐसी सजा मिलनी चाहिए। किससे जाहिर करें ये अपना गुस्सा सरकार की उस नाकामी पर जो इन्हें हर बार शिकार बनने के लिए सड़कों पर छोड़ देती है। आखिर कब तक ये यूं ही मरते और घायल होते रहेंगे।
तस्वीर वही है। बस चेहरा बदला है। दर्द वही है बस किरदार बदल गए हैं। सालों से लगातार आतंक का शिकार हो रहे हैं ये लोग। दो जून के रोटी के जुगाड़ में दिन रात हाड़ तोड़ रहे ये लोग जीने की जद्दोजहद कर रहे थे। जिंदगी क्या पहले ही कम मुश्किल थी। जो इसे और दूभर बना दिया चंद नफरत पसंद लोगों ने।
मरने वाले एक युवक सईदा की मां रोए जा रही है। अस्पताल के बाहर जो आ रहा है इसे चुप कराने की कोशिश कर रहा है। लेकिन मां का कलेजा मानों फटा जा रहा है। आंसू रोके नहीं रुक रहे हैं। घंटों बीत गए। गले ने साथ छोड़ दिया है। लेकिन अपने बेटे की हालत ने उसे बेहाल कर दिया है।
एल सईदा नायक नाम का ये युवक नालगोंडा का रहने वाला था। अपने घर से दूर हैदराबाद के दिलखुश नगर में रहकर वो इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। शहर में अकेले रहकर अपने परिवार के सपने को साकार करने जुटा हुआ था। सबकुछ बेच कर पूरा परिवार उसे पढ़ाने में जुटा था। जैसे ही मां को बेटे के हालत की खबर मिली वो नालगोंडा से भागी चली आई। अब अपने रिश्तेदारों के साथ वो बेटे की खैर मनाने में जुटी है।
अस्पताल के बिस्तर घायलों से भरे हैं। जहां तक निगाह जाती है रोते बिलखते और दर्द से कराहते लोग। किसी की टांग चली गई। तो किसी के शरीर में घुसे लोहे के टुकड़ों की वजह से कई ऑपरेशन करने पड़े। यहीं पैसठ साल के डी हथिय्या की बहू का रो रो कर बुरा हाल है। मजदूरी कर अपनी जिंदगी गुजारने वाला ये परिवार अपनी छोटी सी बच्ची अर्चना का इलाज कराने नालगोंडा से हैदराबाद आया था।
डॉक्टर से बेटी को दिखाने के बाद ये लोग दिलसुख नगर के बस स्टैंड के पास नालगोंडा वापस जाने के लिए पहुंचे। तभी तेज धमाका हुआ। और इस धमाके में पूरा परिवार जख्मी हो गया। परिवार के सभी सात लोग धमाके की चपेट में आए। दो की हालत गंभीर है, एक का पैर काटना पड़ा। जबकि कई शरीर पर हल्के जख्म लेकर दर्द से जूझ रहे हैं। नन्ही बच्ची अर्चना की बहन जिंदगी और मौत से जूझ रही है। जबकि अर्चना को भी हल्की चोट लगी है।
चेहरे अलग हैं लेकिन दर्द एक है। आंतकियों की नापाक करतूत ने इन्हें सिर्फ एक दिन का दर्द नहीं दिया है। ये जख्म जिंदगी भर के हैं। इस बुजुर्ग दंपत्ति को समझ में नहीं आ रहा है कहां जाए, क्या करे। किससे जाकर अपने दिल का दर्द बयान करें। घर का कमाने वाला बेटा धमाके में बुरी तरह से घायल होकर क्रिटिकल केयर यूनिट में पड़ा है।
चालीस साल के यदागिरी गौड़ के मां-बाप का भी ऐसा ही हाल है। वो एक रियल इस्टेट फर्म में काम करते थे। अपनी कंपनी का कंप्यूटर ठीक कराने वो गुरुवार शाम दिलसुख नगर पहुंचे थे। लेकिन बम के शिकार हो गए। ये बुजुर्ग मां बाप अब बस इतना चाहते हैं किसी तरह उनका बेटा ठीक हो जाए।
किससे पूछें ये कि आखिर इन्हें किस गलती की सजा मिली है। किससे कहें ये कि सियासत, धर्म, जात से ज्यादा बड़ी चीज इनके लिए जिंदगी की जद्दोजहद है। सुबह और शाम की दो रोटी है। बच्चों का भविष्य है। किसे बताएं ये कि जिंदगी में इन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया कि इन्हें उसकी ऐसी सजा मिलनी चाहिए। किससे जाहिर करें ये अपना गुस्सा सरकार की उस नाकामी पर जो इन्हें हर बार शिकार बनने के लिए सड़कों पर छोड़ देती है। आखिर कब तक ये यूं ही मरते और घायल होते रहेंगे।

