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शनिवार, 16 मार्च 2013

हर महीने तीन दंगे, रोज एक बलात्‍कार, तीन मर्डर :अखिलेश सरकार का एक साल, अभी बहुत कुछ बाकी है....

लखनऊ. जो जंगलराज इन दिनों एक साल के अखिलेश राज की सबसे बड़ी पहचान बना हुआ है, उसके अंदेशे प्रदेशवासियों को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद ही सताने लगे थे, क्योंकि सपा कार्यकर्ता सत्ता की पदचाप सुनते ही उपद्रवी हो उठे थे। इसीलिए 15 मार्च 2012 को शपथ लेते समय अखिलेश ने लोगों को यह कह कर उन्हें आश्‍वस्त किया था कि, ‘अब तक जो हुआ, सो हुआ, आज से प्रदेश की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी मेरी।’ पर उन्हें मुंह चिढ़ाते हुए हुड़दंगियों ने थोड़ी ही देर बाद वह मंच तोड़ डाला, जिस पर शपथ-ग्रहण हुआ था। हालांकि उस वक्‍त अखि‍लेश यादव ने हुड़दंगि‍यों को सपा से नि‍काल बाहर कि‍या, पर वहीं से अखि‍लेश सरकार का भवि‍ष्‍य लोगों को साफ दि‍खाई देने लगा। अब, जबकि एक साल पूरे हो गए हैं, मंच से नि‍कला हुड़दंग ब्‍यूरोक्रेसी से लेकर राजनीति में हावी है। प्रस्‍तुत है अखि‍लेश सरकार का एक साल का लेखा जोखा- 
 
यूपी में अफसरशाही की अगर स्थिति समझनी है तो पिछले एक साल में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बयान पर ही गौर कर लीजिए। आमतौर पर उन्‍होंने कई बार सीएम अखिलेश को सार्वजनिक तौर पर हिदायत दी कि अफसर क्षेत्र के नेताओं की नहीं सुनते। इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई कीजिए। यही नहीं पार्टी के वरिष्‍ठ नेता मोहम्‍मद आजम खां तो अफसरशाही पर डंडा चलाने की बात कह चुके हैं वह अलग बात है कि बाद में मुकर गए। खुद सीएम अखिलेश भी अफसरों से परेशान दिखते हैं, वह लगातार उन्‍हें अपनी साख सुधारने की हिदायत देते रहते हैं। लेकिन तस्‍वीर का दूसरा पहलू ये है कि इसी यूपी सरकार के प्रमुख सचिव से लेकर डीएम तक या तो सीबीआई जांच में फंसे हैं या किसी घोटाले में शामिल हैं। साल बीत गया लेकिन अखिलेश सरकार ने इन पर शायद कभी 'गौर' नहीं किया।
 
वैसे अखिलेश सरकार द्वारा पीसीएस और पीपीएस अफसरों के प्रमोशन देने से इस समय ब्‍यूरोक्रेसी काफी मजबूत होती दिखाई दे रही है। लेकिन पहले अफसरों की कमी से जूझ रही सरकार के लिए अब नया संकट खड़ा होता दिख रहा है, वह है 'किस' अफसर को 'किस' पद पर बिठाया जाए। यही कारण है कि कभी डीजीपी मुख्‍यालय में दो दर्जन आईपीएस अटैच कर दिए जाते हैं तो कभी किसी विभाग में पद से ज्‍यादा अफसर तैनात कर दिए जाते है।
 
नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव के साथ तीन साल की कैद की सजा पाने वाले आईएएस राजीव कुमार जमानत पर बाहर आ गए। गौरतलब है कि नोएडा प्‍लाट आवंटन घोटाला मुलायम सरकार के ही कार्यकाल में हुआ था। सजा होने के बाद अखिलेश सरकार ने उन्‍हें प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक पद से हटाया जरूर लेकिन जैसे ही वह जमानत लेकर लौटे, उन्‍हें दोबारा उसी पद पर आसीन करा दिया।
 
सीनियर आईएएस सदाकांत इस समय समाज कल्याण विभाग के आयुक्‍त हैं। दो साल पहले वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गृह मंत्रालय में ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर कार्यरत थे। उस दौरान लेह-लद्दाख में 200 करोड़ रुपए का घोटाला उजागर हुआ। सीबीआई ने 2010 में मामले में एफआईआर दर्ज की और उसमें सदाकांत को भी आरोपी बनाया। आखिरकार केंद्र सरकार ने सदाकांत की प्रतिनियुक्ति रद करके उन्हें वापस यूपी कैडर में भेज दिया। यूपी लौटे सदाकांत तो उन्‍हें समाज कल्‍याण विभाग जैसे अहम विभाग की जिम्‍मेदारी दे दी गई।
 
उत्तर प्रदेश की आय में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आबकारी आयुक्‍त पद पर तैनात महेश गुप्ता का नाम 1998 में सूचना विभाग में कर्मचारियों की भर्ती में हुए घोटाले में उजागर हुआ। सीबीआई ने मामले की जांच के दौरान 2008 में ही महेश गुप्ता सहित अन्य अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। मायाराज में विवादित आबकारी नीति बनाने में महेश गुप्ता का ही योगदान माना जाता है। इस नीति के कारण ही पोंटी चड्ढा ने पूरे प्रदेश के शराब कारोबार पर एकछत्र राज कायम कर लिया। अखिलेश सरकार आई तो उम्‍मीद की जा रही थी कि महेश गुप्‍ता को हटाया जा सकता है लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
 
1981 में आईएएस टॉप करने वाले प्रदीप शुक्ला एनआरएचएम घोटाले में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किए गए। करीब तीन महीने जेल में रहने के बाद उन्‍हें जमानत मिली। रिहा होते ही प्रदीप शुक्‍ला ने गिरफ्तारी से पहले के अपनी तैनाती बतौर राजस्व परिषद में सदस्य पद पर ज्वांइन कर लिया। मामले में कोर्ट ने सख्ती दिखाई तो दो दिन बाद उन्हें निलंबित किया गया। प्रदीप शुक्‍ला के मामले में सीबीआई ने अखिलेश सरकार पर आरोप लगाया है कि काफी कोशिश के बाद भी यूपी सरकार ने अभियेाजन की स्‍वीकृति नहीं दी, जिसके कारण प्रदीप शुक्‍ला के खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं हो सकी। 
 
राकेश बहादुर पिछली सपा सरकार में नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर तैनात थे। 2006 में नोएडा में होटलों के लिए प्लाट आवंटन हुए। इनमें घोटाले की बात सामने आने पर बसपा सरकार ने 2007 में इन आवंटनेां को रद कर दिया। 2009 में राकेश बहादुर को मायावती सरकार ने निलंबित कर दिया। 2010 में प्रवर्तन निदेशालय ने राकेश बहादुर के खिलाफ मनी लांड्रिंग का केस दर्ज किया। राकेश बहादुर अखिलेश सरकार बनने के फौरन बाद ही नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर बिठा दिए गए। इस पर कोर्ट ने भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। आखिरकार सरकार को इन्‍हें पद से हटाना ही पड़ा।
 
मुलायम सरकार के दौरान नोएडा के सीईओ पद की जिम्मेदारी संभालने वाले संजीव सरन अखिलेश सरकार बनते ही वापस उसी पद पर पहुंच गए। 2006 में नोएडा में हुए 4000 करोड़ से अधिक के कथित भूमि घोटाले में बसपा सरकार ने इन्हें भी निलंबित कर दिया था। इनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई। मामले की जांच ईओडब्यू मेरठ को सौंपी गई। इन्‍हें अखिलेश सरकार ने दोबारा उसी पद पर बिठा दिया। अदालत ने पद से हटाने का आदेश दिया तो पिछली 16 जनवरी को इन्‍हें वेटिंग में डाला गया। यूपीएसआईडीसी घोटाले में आरोपी आईएएस अफसर के धनलक्ष्मी अखिलेश सरकार में सुलतानपुर के डीएम पद की जिम्‍मेदारी संभाल रही हैं। मुख्यमंत्री की सचिव अनीता सिंह पर पिछली मुलायम सरकार में इनके ऊपर कुछ आरोप भी लगे, इनमें सपा सरकार के कुछ करीबी नेताओं और अधिकारियों को 2005 में नियमों को दरकिनार कर गोमतीनगर के पॉश इलाके में प्लाट आवंटित करना प्रमुख है। अनीता सिंह वर्तमान में मुख्‍यमंत्री अखिलेश की सचिव हैं। जाहिर है सत्‍ता के अधिकतर फैसलों में उनका विशेष योगदान रहता है।
 
अलीगढ़ में 38वीं वाहिनी पीएसी में तैनात डीएसपी वीके शर्मा ने पिछले साल अक्‍टूबर में प्रदेश पुलिस के डीजीपी एसी शर्मा पर गंभीर आरोप लगाया कि वह ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए पैसा लेते हैं। इसके साथ ही उन्‍होंने एटा के डीएम और एसएसपी पर भी गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि एटा में तैनाती के दौरान इन लोगों ने सपा के एक कद्दावर नेता के साथ मिलकर दहेज हत्‍या के मामले में कुछ आरोपियों का नाम हटाने के लिए उन पर दबाव बनाया। गैरकानूनी काम करने से मना करने पर स्‍थानांतरण किया गया। मामले में अखिलेश सरकार ने डीजीपी के खिलाफ तो कोई कार्रवाई नहीं की हां, डीएसपी को सस्‍पेंड जरूर कर दिया। वह कोर्ट से निलंबन निरस्‍त करने का आदेश भी ले आए लेकिन फि‍र भी ज्‍वाइनिंग का इंतजार कर रहे हैं।
 
यूपी कैडर के आईएएस अफसर शशि भूषण को छेड़खानी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। आईएएस शशि भूषण के ऊपर छेड़खानी का यह आरोप गूगल इंडिया एक्जिक्यूटिव ने लगाया। आरोप है कि दिल्ली से लखनऊ आ रही लखनऊ मेल में आईएएस शशि ने उक्त महिला से छेड़खानी की।
 
लखनऊ. जो जंगलराज इन दिनों एक साल के अखिलेश राज की सबसे बड़ी पहचान बना हुआ है, उसके अंदेशे प्रदेशवासियों को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद ही सताने लगे थे, क्योंकि सपा कार्यकर्ता सत्ता की पदचाप सुनते ही उपद्रवी हो उठे थे। इसीलिए 15 मार्च 2012 को शपथ लेते समय अखिलेश ने लोगों को यह कह कर उन्हें आश्‍वस्त किया था कि, ‘अब तक जो हुआ, सो हुआ, आज से प्रदेश की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी मेरी।’ पर उन्हें मुंह चिढ़ाते हुए हुड़दंगियों ने थोड़ी ही देर बाद वह मंच तोड़ डाला, जिस पर शपथ-ग्रहण हुआ था। हालांकि उस वक्‍त अखि‍लेश यादव ने हुड़दंगि‍यों को सपा से नि‍काल बाहर कि‍या, पर वहीं से अखि‍लेश सरकार का भवि‍ष्‍य लोगों को साफ दि‍खाई देने लगा। अब, जबकि एक साल पूरे हो गए हैं, मंच से नि‍कला हुड़दंग ब्‍यूरोक्रेसी से लेकर राजनीति में हावी है। प्रस्‍तुत है अखि‍लेश सरकार का एक साल का लेखा जोखा- 
 
यूपी में अफसरशाही की अगर स्थिति समझनी है तो पिछले एक साल में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बयान पर ही गौर कर लीजिए। आमतौर पर उन्‍होंने कई बार सीएम अखिलेश को सार्वजनिक तौर पर हिदायत दी कि अफसर क्षेत्र के नेताओं की नहीं सुनते। इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई कीजिए। यही नहीं पार्टी के वरिष्‍ठ नेता मोहम्‍मद आजम खां तो अफसरशाही पर डंडा चलाने की बात कह चुके हैं वह अलग बात है कि बाद में मुकर गए। खुद सीएम अखिलेश भी अफसरों से परेशान दिखते हैं, वह लगातार उन्‍हें अपनी साख सुधारने की हिदायत देते रहते हैं। लेकिन तस्‍वीर का दूसरा पहलू ये है कि इसी यूपी सरकार के प्रमुख सचिव से लेकर डीएम तक या तो सीबीआई जांच में फंसे हैं या किसी घोटाले में शामिल हैं। साल बीत गया लेकिन अखिलेश सरकार ने इन पर शायद कभी 'गौर' नहीं किया।
 
वैसे अखिलेश सरकार द्वारा पीसीएस और पीपीएस अफसरों के प्रमोशन देने से इस समय ब्‍यूरोक्रेसी काफी मजबूत होती दिखाई दे रही है। लेकिन पहले अफसरों की कमी से जूझ रही सरकार के लिए अब नया संकट खड़ा होता दिख रहा है, वह है 'किस' अफसर को 'किस' पद पर बिठाया जाए। यही कारण है कि कभी डीजीपी मुख्‍यालय में दो दर्जन आईपीएस अटैच कर दिए जाते हैं तो कभी किसी विभाग में पद से ज्‍यादा अफसर तैनात कर दिए जाते है।
 
नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव के साथ तीन साल की कैद की सजा पाने वाले आईएएस राजीव कुमार जमानत पर बाहर आ गए। गौरतलब है कि नोएडा प्‍लाट आवंटन घोटाला मुलायम सरकार के ही कार्यकाल में हुआ था। सजा होने के बाद अखिलेश सरकार ने उन्‍हें प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक पद से हटाया जरूर लेकिन जैसे ही वह जमानत लेकर लौटे, उन्‍हें दोबारा उसी पद पर आसीन करा दिया।
 
सीनियर आईएएस सदाकांत इस समय समाज कल्याण विभाग के आयुक्‍त हैं। दो साल पहले वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गृह मंत्रालय में ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर कार्यरत थे। उस दौरान लेह-लद्दाख में 200 करोड़ रुपए का घोटाला उजागर हुआ। सीबीआई ने 2010 में मामले में एफआईआर दर्ज की और उसमें सदाकांत को भी आरोपी बनाया। आखिरकार केंद्र सरकार ने सदाकांत की प्रतिनियुक्ति रद करके उन्हें वापस यूपी कैडर में भेज दिया। यूपी लौटे सदाकांत तो उन्‍हें समाज कल्‍याण विभाग जैसे अहम विभाग की जिम्‍मेदारी दे दी गई।
 
उत्तर प्रदेश की आय में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आबकारी आयुक्‍त पद पर तैनात महेश गुप्ता का नाम 1998 में सूचना विभाग में कर्मचारियों की भर्ती में हुए घोटाले में उजागर हुआ। सीबीआई ने मामले की जांच के दौरान 2008 में ही महेश गुप्ता सहित अन्य अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। मायाराज में विवादित आबकारी नीति बनाने में महेश गुप्ता का ही योगदान माना जाता है। इस नीति के कारण ही पोंटी चड्ढा ने पूरे प्रदेश के शराब कारोबार पर एकछत्र राज कायम कर लिया। अखिलेश सरकार आई तो उम्‍मीद की जा रही थी कि महेश गुप्‍ता को हटाया जा सकता है लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
 
1981 में आईएएस टॉप करने वाले प्रदीप शुक्ला एनआरएचएम घोटाले में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किए गए। करीब तीन महीने जेल में रहने के बाद उन्‍हें जमानत मिली। रिहा होते ही प्रदीप शुक्‍ला ने गिरफ्तारी से पहले के अपनी तैनाती बतौर राजस्व परिषद में सदस्य पद पर ज्वांइन कर लिया। मामले में कोर्ट ने सख्ती दिखाई तो दो दिन बाद उन्हें निलंबित किया गया। प्रदीप शुक्‍ला के मामले में सीबीआई ने अखिलेश सरकार पर आरोप लगाया है कि काफी कोशिश के बाद भी यूपी सरकार ने अभियेाजन की स्‍वीकृति नहीं दी, जिसके कारण प्रदीप शुक्‍ला के खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं हो सकी। 
 
राकेश बहादुर पिछली सपा सरकार में नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर तैनात थे। 2006 में नोएडा में होटलों के लिए प्लाट आवंटन हुए। इनमें घोटाले की बात सामने आने पर बसपा सरकार ने 2007 में इन आवंटनेां को रद कर दिया। 2009 में राकेश बहादुर को मायावती सरकार ने निलंबित कर दिया। 2010 में प्रवर्तन निदेशालय ने राकेश बहादुर के खिलाफ मनी लांड्रिंग का केस दर्ज किया। राकेश बहादुर अखिलेश सरकार बनने के फौरन बाद ही नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर बिठा दिए गए। इस पर कोर्ट ने भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। आखिरकार सरकार को इन्‍हें पद से हटाना ही पड़ा।
 
मुलायम सरकार के दौरान नोएडा के सीईओ पद की जिम्मेदारी संभालने वाले संजीव सरन अखिलेश सरकार बनते ही वापस उसी पद पर पहुंच गए। 2006 में नोएडा में हुए 4000 करोड़ से अधिक के कथित भूमि घोटाले में बसपा सरकार ने इन्हें भी निलंबित कर दिया था। इनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई। मामले की जांच ईओडब्यू मेरठ को सौंपी गई। इन्‍हें अखिलेश सरकार ने दोबारा उसी पद पर बिठा दिया। अदालत ने पद से हटाने का आदेश दिया तो पिछली 16 जनवरी को इन्‍हें वेटिंग में डाला गया। यूपीएसआईडीसी घोटाले में आरोपी आईएएस अफसर के धनलक्ष्मी अखिलेश सरकार में सुलतानपुर के डीएम पद की जिम्‍मेदारी संभाल रही हैं। मुख्यमंत्री की सचिव अनीता सिंह पर पिछली मुलायम सरकार में इनके ऊपर कुछ आरोप भी लगे, इनमें सपा सरकार के कुछ करीबी नेताओं और अधिकारियों को 2005 में नियमों को दरकिनार कर गोमतीनगर के पॉश इलाके में प्लाट आवंटित करना प्रमुख है। अनीता सिंह वर्तमान में मुख्‍यमंत्री अखिलेश की सचिव हैं। जाहिर है सत्‍ता के अधिकतर फैसलों में उनका विशेष योगदान रहता है।
 
अलीगढ़ में 38वीं वाहिनी पीएसी में तैनात डीएसपी वीके शर्मा ने पिछले साल अक्‍टूबर में प्रदेश पुलिस के डीजीपी एसी शर्मा पर गंभीर आरोप लगाया कि वह ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए पैसा लेते हैं। इसके साथ ही उन्‍होंने एटा के डीएम और एसएसपी पर भी गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि एटा में तैनाती के दौरान इन लोगों ने सपा के एक कद्दावर नेता के साथ मिलकर दहेज हत्‍या के मामले में कुछ आरोपियों का नाम हटाने के लिए उन पर दबाव बनाया। गैरकानूनी काम करने से मना करने पर स्‍थानांतरण किया गया। मामले में अखिलेश सरकार ने डीजीपी के खिलाफ तो कोई कार्रवाई नहीं की हां, डीएसपी को सस्‍पेंड जरूर कर दिया। वह कोर्ट से निलंबन निरस्‍त करने का आदेश भी ले आए लेकिन फि‍र भी ज्‍वाइनिंग का इंतजार कर रहे हैं।
 
यूपी कैडर के आईएएस अफसर शशि भूषण को छेड़खानी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। आईएएस शशि भूषण के ऊपर छेड़खानी का यह आरोप गूगल इंडिया एक्जिक्यूटिव ने लगाया। आरोप है कि दिल्ली से लखनऊ आ रही लखनऊ मेल में आईएएस शशि ने उक्त महिला से छेड़खानी की।
 
10 हजार छात्रों को लैपटॉप मिले, बाकी सात महीने तक खड़े रहें लाइन में
 
लखनऊ. वैसे तो सीएम अखिलेश सरकार बनते ही ऐलान किया था कि जल्‍द ही छात्रों को उनके वायदे के अनुसार लैपटॉप हाथ में दे देंगे लेकिन वादा पूरा करते-करते साल निकल गया और आखिरकार अखिलेश यादव 10 हजार छात्रों को 11 मार्च को लैपटॉप देने में कामयाब हो गए। वैसे दुनिया भर की सुविधाओं के साथ अखिलेश यादव और मुलायम की तस्‍वीर लिए इस एचपी के लैपटॉप की कहानी भी बड़ी दिलचस्‍प है। सरकार की सोच और मानदंडों को पूरा करने में कंपनियों को काफी मेहनत करनी पड़ी, यही नहीं खुद सरकार को टेंडर निरस्‍त करने की निराशा से जूझना पड़ा। अब लैपटॉप की सप्‍लाई शुरू हो गई है और बताया जाता है कि सितम्‍बर तक 15 लाख छात्रों के हाथ अखिलेश सरकार लैपटॉप पहुंचा देगी। इसमें हर महीने का टार्गेट कंपनी को दिया गया है। 
 
सरकार बनने के करीब छह महीने बाद 9 सितम्‍बर को शासन ने लैपटॉप के जो मानक जारी किए, उनमें लैपटॉप की खरीद के लिए विशेषज्ञों की गठित समिति द्वारा स्पेसिफिकेशन निर्धारित किए जाने के बाद शासनादेश जारी किया। तय किया गया खरीद प्रक्रिया के लिए नामित एजेंसी यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन की ओर से निर्धारित टेंडर जारी किया जाएगा। खास बात यह कि सरकार ने लैपटॉप आपूर्ति करने से पहले केन्द्र सरकार के प्रयोगशाला और स्पेसीफिकेशन कंपनी से मानक और गुणवत्ता की जांच कराने की शर्तें भी रखी।
 
पहले टेंडर की विषमता को देखते हुए किसी भी कम्पनी ने टेंडर के लिए आवेदन ही नहीं किया। दस सितम्बर को हुई प्री ब्रिड कांफ्रेंस में कई कंपनियों ने तकनीकी आधार पर निर्धारित समय के भीतर सैम्पल लैपटॉप तैयार करने में अपनी असमर्थता जता दी, जिससे 1 अक्टूबर को टेंडर की अंतिम तिथि होने के बावजूद कोई भी टेंडर भरा नहीं गया। आखिरकार ये टेंडर प्रक्रिया रद करनी पड़ गई।
 
इसके बाद दोबारा टेंडर निकाला गया,‍ जिसमें चार कंपनियों ने लैपटॉप की आपूर्ति के लिए टेंडर डाले। तकनीकी निविदाएं डालने वाली कंपनियों में एचसीएल, एसर, ह्यूलेट पैकर्ड (एचपी) व लेनोवो रहीं। कंपनियों को 26 नवंबर को तकनीकी प्रस्तुतीकरण करना था, जिसे सिर्फ एचपी ने 10 दिन पहले पूरा किया। उसी दिन आपूर्ति करने वाले लैपटॉप का नमूना भी प्रस्तुत भी किया गया। कंपनियों की निविदाओं का परीक्षण करने के लिए निदेशक यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन की अध्यक्षता में समिति गठित की गई।
 
समिति तकनीकी निविदाओं का मूल्यांकन करने के बाद  प्रस्तुतीकरण के बाद समिति तकनीकी बिड क्वालिफाई करने वाली कंपनी एचपी के नाम को  उजागर किया। पहले वित्तीय निविदा के लिए आखिरी तारीख 1 दिसंबर तय की गई थी लेकिन प्रस्तुतीकरण न होने की वजह से ये भी लटक गई।
 
अब जब लैपटॉप बांटा जाना शुरू हो गया है, तो जाहिर सी बात है उन लाखों छात्रों के दिलों में सवाल कौंध रहा होगा कि उनके हाथ में लैपटॉप कब आएगा? जानकारी के मुताबिक 11 मार्च से 10 हजार छात्रों को लैपटॉप बांटने का काम सितम्‍बर तक 15 लाख छात्रों की अंतिम सीमा तक पहुंच जाएगा। यानी अगले सात महीने में प्रदेश भर में बेरोजगारी भत्‍ते, कन्‍या विद्याधन के चेकों की तरह जिलों में लैपटॉप बांटने का भी अभियान चलाया जाना है। सूत्रों के अनुसार एचपी कंपनी को जिम्‍मेदारी दी गई है उसके मुताबिक कंपनी को लैपटॉप की 75000 लैपटॉप की पहली खेप में दो महीने में देनी है। यानी अप्रैल तक कुल 75 हजार छात्रों को लैपटॉप मिल जाने की उम्‍मीद है। इसके बाद इसके बाद 75 हजार और लैपटॉप सप्‍लाई करने के लिए कंपनी के पास मई तक का समय दिया गया है। जून में इसके बाद खेप की रफ्तार में तेजी आएगी और कंपनी इस महीने सरकार को 3 लाख 75 हजार लैपटॉप उपलब्‍ध कराएगी। जुलाई में भी कुछ ऐसा ही होगा और 3 लाख 75 हजार लैपटॉप की सप्‍लाई आएगी। इसके बाद अगस्‍त और सितम्‍बर में 3-3 लाख लैपटॉप कंपनी देगी, जिसे सरकार छात्रों के हाथ में सौंप देगी।
 
12 महीने के ये 13 मंत्री, किसी पर अपराध तो किसी पर भ्रष्‍टाचार का आरोप
 
लखनऊ. अखिलेश सरकार की पहली वर्षगांठ आज यूपी की जनता उनके उन 13 मंत्रियों, विधायकों को याद कर रही है, जो इन 12 महीनों के समय में कभी अपराध, कभी भ्रष्‍टाचार के लिए चर्चित रहे। किसी ने खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाईं तो किसी का नाम अपहरण, पशु तस्‍करी जैसे अपराधों से जुड़ा। भ्रष्‍टाचार को लेकर खुद वरिष्‍ठ मंत्री शिवपाल यादव की जुबान फि‍सल गई, तो राजा भैया के ऊपर अब हत्‍या के मामले की जांच सीबीआई कर रही है।
 
1) प्रदेश के खाद्य एवं रसद मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के गृह जनपद प्रतापगढ़ के कुण्डा में उनके करीबी प्रधान नन्हे यादव उनके भाई सुरेश यादव की हत्या की गई। साथ ही नन्हे गुट ने विरोधी कमता पाल के घर पर आगजनी की। मौके पर पहुंचे सीओ जिया उल हक को भीड़ ने घेर कर उनकी ही पिस्तौल से मार डाला। राजा भैया पर हत्या की साजिश मामले में केस दर्ज हुआ। उन्हें मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने पड़ा। भारी दबाव के बीच सीएम अखिलेश को मामले की जांच सीबीआई को सौंपनी पड़ी।
 
2) गोण्डा में राजस्व राज्यमंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह पर  राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले में आयुष डॉक्टरों की नियुक्ति के मसले पर सीएमओ पर दबाव डालने और उनका अपहरण करने का आरोप लगा। मामले में पंडित सिंह का मंत्रिमंडल से इस्तीफा हुआ और सरकार की खूब किरकिरी हुई। यही नहीं सीएम अखिलेश को एसपी, डीएम व सीएमओ के खिलाफ भी कार्रवाई करनी पड़ी। पंडित सिंह कुछ समय बाहर रहने के बाद एक बार फि‍र सरकार में मंत्री बना दिए गए हैं। पिछले दिनों उन्‍होंने एक बार फि‍र अपना रंग दिखाते हुए डीएम को ही धमकी दे डाली। दरअसल गोण्‍डा की डीएम रोशन जैकब शहर को साफ-सुथरा करने का अभियान चला रही हैं। इसके लिए अतिक्रमण हटाया जा रहा है। यही बात पंडित सिंह को नागवार गुजरी। पंडित सिंह ने ऐलान किया है कि ये अभियान नहीं रूका तो डीएम को अंजाम भुगतना होगा। उधर डीएम ने भी ये साफ कर दिया है कि वो सत्ता के दवाब में नहीं झुकने वाली।
 
3) 10 अगस्‍त को मंत्री शिवपाल यादव को अफसरों की मीटिंग में यह कहते हुए कैमरे ने कैद कर लिया कि अगर आप कड़ी मेहनत करते हैं तो छोटी चोरी कर सकते हैं लेकिन लूटिए नहीं। 11 अगस्‍त को शिवपाल यादव ने कुंभ की तैयारियों से जुड़ी एक बैठक में कह दिया कि किसी चीज की कमी नहीं होगी चाहे वो कमीशखोरी हो या बिजली, सड़क पानी आर हैंडपम्‍प हो।
 
4) अलीगढ़ के डिबाई विधानसभा क्षेत्र के सपा विधायक भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित ने 25 फरवरी को उर्दू शिक्षकों के प्रतिनिमंडल से बदसलूकी और मारपीट की। मामले में सभापति गणेश शंकर पाण्‍डेय ने सरकार को निर्देश दिया कि घटना की उच्च स्तरीय जांच की जाए और जांच रिपोर्ट मौजूदा बजट सत्र में ही विधान परिषद के पटल पर रखी जाएगी।
 
5) समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय कार्य समिति के सदस्य केसी पाण्डेय पशु तस्करी में फंसे। उनके करीबी माने जाने वाले आशुतोष पाण्डेय का गोण्डा के एसपी नवनीत राणा ने स्टिंग आपरेशन कर डाला। केसी पाण्डेय टेप में आशुतोष पाण्डेय की पैरवी करते सुने गए और आशुतोष एसपी को घूस की पेशकश करते हुए। सरकार की फजीहत हुई। पुलिस ने उन्हें आपराधिक षडय़ंत्र के तहत नामजद किया। लेकिन सीएम अखिलेश ने स्टिंग ऑपरेशन करने वाले गोण्डा एसपी पर ही गाज गिरा दी।
 
6) लखनऊ में खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के उपाध्यक्ष नटवर गोयल जमीन पर कब्जे के विवाद में फंस गए। उन्‍होंने प्रेस फोटोग्राफर की पिटाई की और सरकार की खूब किरकिरी हुई। आखिरकार मुख्यमंत्री ने उनकी लालबत्ती छीनने का फैसला किया।
 
7) विधूना के विधायक प्रमोद गुप्ता के बेटे ने अपने लखनऊ के एमिटी कॉलेज में पूरी क्‍लास के सामने महिला टीचर पर तमाचा जड़ दिया। मामला विधानसभा और विधान परिषद में भी उठा। आखिरकार विधायक के बेटे के खिलाफ केस दर्ज हुआ और अदालत से जमानत हो गई।
 
8) प्रदेश सरकार को गंभीर शिकायते मिलने पर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष वसीम अहमद की छुट्टी करनी पड़ी। व़ह जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना अहमद बुखारी के खास थे। सरकार ने उनके ऊंचे सियासी कद के चलते उन्हें लालबत्ती से नवाजा था। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को उनके खिलाफ लगातार गंभीर शिकायतें मिल रही थीं। फजीहत होने के चलते उन्हें पद से हटाने का फैसला करना पड़ा।
 
9) इलाहाबाद में सपा विधायक विजमा यादव के बेटे के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का मामला सामने आया।
 
10) अम्‍बेडकरनगर के टांडा में हिन्‍दू जागरण मंच के नेता राम बाबू गुप्‍ता की हत्‍या के बाद वहां साम्‍प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। उनके परिवारवालों ने हत्‍या करवाने का आरोप सपा विधायक अजीमुलहक पहलवान पर लगाया।
 
11) इससे पहले पिछले साल अक्‍टूबर में मेरठ में समाजवादी पार्टी के नेता ओमकार यादव पर रंगदारी मांगने का आरोप लगा। उन्होंने एक ज्वैलरी हाउस के मालिक के एक प्लॉट पर काम रुकवाने की धमकी दी और उनसे एक करोड़ रुपये की मांग की। व्यापारी का आरोप है कि इस मामले में पुलिस ने भी उनकी कोई मदद नहीं की।
 
12) सूबे में सपा सरकार बनने के बाद स्‍वागत समारोह में सादगी बरतने की समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव की हिदायतों के बावजूद पूर्व मंत्री एवं वर्तमान विधायक शाकिर अली लखनऊ से अपने गृह जिले देवरिया पहुंचे तो उनके समर्थक स्वागत के लिए प्लेटफॉर्म पर घोड़ा लेकर पहुंचे थे। शाकिर रेलगाड़ी से जैसे ही देवरिया स्टेशन पहुंचे, वहां मौजूद समर्थकों ने नारेबाजी करते हुए उन्हें फूल-मालाओं से लादकर घोड़े पर बिठा दिया। समर्थकों का अभिवादन करते हुए शाकिर घोड़े पर सवार होकर स्टेशन के बाहर तक आए। मामले में सपा सरकार की खूब किरकिरी हुई।
 
13) वहीं बहराइच में पीडब्लूडी के कर्मचारी उस पर प्रदर्शन पर उतारू हो गए जब ठेका ना मिलने पर जिला पंचायत सदस्य गब्बर सिंह ने पीडब्लूडी इंजीनियर ए के वार्ष्णेय को जान से मारने की धमकी दे डाली। इंजीनियर और उसका पूरा परिवार इस घटना से दहशत में हैं। पीडब्लूडी कर्मचारियों का कहना है कि सत्तादारी दल से जुड़ा होने के नाते पुलिस गब्बर सिंह को बचाने की कोशिश कर रही है।
साल भर विकास का खाका खींचती रही सरकार
 
लखनऊ. पिछले एक साल में अखिलेश सरकार ने विकास की नई इबारत लिखने की कोशिश में सबसे ज्‍यादा बेरोजगारी भत्‍ते, कन्‍या विद्याधन, लैपटॉप आदि योजनाओं पर सबसे ज्‍यादा गौर किया। विकास का खाका खींचने के लिए सीएम अखिलेश ने कई योजनाएं, जैसे लखनऊ में मेट्रो प्रोजैक्‍ट, आगरा से लखनऊ सिक्‍स लेन हाइवे, जिलों में नए सब स्‍टेशन स्‍थापित करने, नए डिग्री कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज स्‍थपित करने, सुपर स्‍पेशियालिटी हॉस्पिटल स्‍थापित करने की योजनाएं पेश कीं लेकिन ये कब मूर्त रूप लेंगीं, इसके बारे में नहीं कहा जा सकता।  इस दौरान उन्‍होंने प्रदेश में नए उद्योग धंधे लगाने की आगरा में इन्‍वे्स्‍टर्स समिट आयोजित करने के साथ ही दिल्‍ली में हुए मेले में यूपी सरकार के पंडाल को बेहतर ढंग से पेश किए जाने की कोशिश की गई।
 
यही नहीं सीएम अखिलेश से लखनऊ में आए दिन कभी वर्ल्‍ड बैंक के अध्‍यक्ष से,  कभी बिल गेट्स से तो कभी अमेरिका के व्‍यापारियों से उनकी मुलाकात को काफी सुर्खियां मिलीं। लेकिन इन सबके बीच ये भी सच है कि अभी तक यूपी में किसी बड़ी कंपनी ने कोई बड़ा इन्‍वेस्‍टमेंट करने की इच्‍छा जाहिर नहीं की है। वो अलग बात है कि सरकार इस बात के दावे जरूर कर रही है कि यूपी में इन्‍वेस्‍टमेंट का बेहतर माहौल बना है।
 
बहरहाल, यूपी के विकास की राह में अखिलेश सरकार ने पिछली सरकार की कई अहम योजनाओं को या तो खत्‍म कर दिया या उन्‍हें नए ढंग से समाजवादी रंग दे दिया। सरकार बनने के कुछ महीने बाद ही मई में अखिलेश सरकार ने मायावती के एक फैसले को पलटते हुए ग्रेटर नोएडा के जेवर में ग्रीन फील्‍ड ताज इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने के फैसले को रद कर दिया। यही नहीं माया सरकार की 26 विभिन्‍न योजनाओं को खत्‍म कर दिया गया, इनके लिए बजट में तय की गई करीब 1000 करोड़ रुपए की राशि को समाजवादी पार्टी के चुनावी वायदों को पूरा करने में लगाने का फैसला किया। शहरी विकास, हाउसिंग, ग्राम्य विकास, गरीबी उन्‍मूलन, महिलाओं और लड़कियों के कल्‍याण, शिक्षा, अल्‍पसंख्‍यक कल्‍याण, समाज कल्‍याण और सिंचाई से जुड़ी ये योजनाएं भीमराव अम्‍बेडकर, कांशीराम और सावि‍त्री बाई फुले के नाम थीं।
 
अम्‍बेडकर ग्राम विकास स्‍कीम का नाम बदलकर राम मनोहर लोहिया स्‍कीम कर दिया गया। साथ ही अब इन गांवों के चुनाव की प्रक्रिया में दलित जनसंख्‍या की बजाए पिछड़े वर्ग के लोगों की जनसंख्‍या को आधार बना दिया गया। यही नहीं सरकारी ठेकों में एससी, एसटी को आरक्षण देने के माया के फैसले को भी रद कर दिया गया। इसमें अखिलेश सरकार ने सफाई दी कि 2009 में लागू की गई इस व्‍यवस्‍था के बाद से जो भी काम कराए गए, उनकी गुणवत्‍ता सही नहीं है।
 
जुलाई आई तो अखिलेश सरकार ने बसपा सरकार द्वारा बनाए गए 8 जिलों को खत्‍म कर दिया। इसमें अमेठी से बनाए गए छत्रपति शाहूजी महाराजनगर का नाम बदलकर गौरीगंज कर दिया गया। इसी तरह रमाबाईनगर को कानपुर देहात, प्रबुद्धनगर को शामली, महामायानगर को हाथरस, भीमनगर को बहजोई, पंचशीलनगर को हापुड़, कांशीरामनगर को कासगंज और जेपीनगर को फि‍र से अमरोहा कर दिया गया। 
 
बिजली क्षेत्र की बात करें तो अगर मांग और आपूर्ति में अंतर की बात की जाए तो बसपा शासनकाल में 2007 में 7,479 मेगावाट की मांग के सापेक्ष उत्तर प्रदेश 6,138 मेगावाट की ही आपूर्ति कर पा रहा था। यानी करीब 1,342 मेगावाट की कमी लगातार बनी हुई थी। अब अखिलेश शासनकाल में प्रदेश में करीब 12,000 हजार मेगावाट की मांग के सापेक्ष करीब 9,500 मेगावाट की ही आपूर्ति की जा रही है। यानी पांच सालों में मांग और आपूर्ति के बीच अंतर 1,342 मेगावाट से करीब 2,500 मेगावाट पहुंच चुका है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के शैलेंद्र दुबे बताते हैं चाहे वह बसपा की सरकार हो या सपा की, सभी प्राइवेट कंपनियों पर आश्रित होती जा रही हैं। यही कारण है सार्वजनिक क्षेत्र की कपंनियों की बजाए प्राइवेट सेक्टर से कंपनियों से करार किया जा रहा है।
 
अखिलेश सरकार ने 1000 रुपए प्रति व्यक्ति प्रति माह के हिसाब से हर तीन महीने में बेरोजगारी भत्ते का भुगतान शुरू किया। साथ ही ऐलान किया है कि इन 20 लाख से ज्यांदा बेरोजगारों को नौकरी दिलाने के लिए ऱोजगार कार्यालय जॉब फेयर आयोजित करेगा। जॉब फेयर तो शुरू नहीं हुआ, उलटे सपा सरकार ने करीब साढ़े 8 करोड़ का बेरोजागारी भत्‍ता बांटने के आयोजनों पर ही साढ़े 12 करोड़ रुपए खर्च कर डाले।
 
टीईटी शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया भी जल्द ही करने का दावा किया गया लेकिन हुआ कुछ नहीं मामला कोर्ट में लटका है। खुद सीएम अखिलेश कहते हैं कि प्रदेश में युवाओं को रोजगार दिलाना एक चुनौती है, इसके लिए वह प्रदेश में अवस्‍थापना और औद्योगिक नीति लागू कर ज्यादा से ज्यादा उद्योग धंधे प्रदेश में लाने की कोशिश कर रहे हैं, इससे प्रदेश के युवाओं को रोजगार मिलेगा। तब तक के लिए भत्ता दे रहे हैं। वहीं बालिकाओं को भी ज्यादा से ज्यादा नौकरियों तक पहुंचाने के लिए कन्या विद्याधन दिया जा रहा है, जिससे वे पढ़ाई पूरी कर नौकरियों के लिए काबिल बन सकें। इसके अलावा गरीब बालिकाओं के लिए मुफ्त मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की व्यवस्था की जा रही है।
 
2012 को सत्ता में आते ही सीएम अखिलेश यादव ने जनता दर्शन की व्यवस्था शुरू की। लेकिन जनता दर्शन की यह व्‍यवस्‍था चरमराती ही दिख रही है कभी विधानसभा सत्र के नाम पर तो कभी ज्‍यादा ठंड के नाम पर और तो और कभी सहालग के नाम पर जनता दर्शन हर महीने टलता ही रहता है। अगर अखिलेश सरकार की बात की जाए तो पिछले एक साल में 13,650 करोड़ रुपए की 280 नई योजनाएं चलाई हैं। इनमें 4617 करोड़ रुपए बेरोजगारी भत्ता, छात्रों में लैपटॉप, टैबलेट वितरण, कन्या  विद्याधन, कृषक दुघर्टना बीमा योजना 5 लाख रुपए तक करने के लिए रखे हैं।
 
इन सभी योजनाओं में लैपटॉप और टैबलेट वितरण की योजना के अलावा बाकी सभी योजनाओं पर काम शुरू हो चुका है। इसके अलावा अखिलेश सरकार ने शिक्षा के विस्तार और विकास पर 33,263 करोड़ रुपए, चिकित्साक स्‍वास्‍थ्‍य के लिए 7033 करोड़ रुपए, समाज कल्याण के लिए 14,950 करोड़ रुपए, बिजली पर 585 करोड़ रुपए, भूमि सेना योजना पर 48 करोड़ रुपए, शहरी विकास के लिए 473 करोड़ रुपए, सिंचाई के लिए 740 करोड़ रुपए रखे।           साभार.दैनिक भास्कर
 
 
 
 

बुधवार, 13 मार्च 2013

बीवी-बेटियों को बेच रहे लोग

महाराष्ट्र में सूखे ने राज्य के किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है। महाराष्ट्र के 34 जिलों में सूखे का संकट है। इसे देखते हुए ईजीओएम ने 1207 करोड़ का सूखा पैकेज देने का फैसला किया है। लेकिन इस पैकेज का कितना सही इस्तेमाल हो पाएगा, इस पर बड़ा सवाल बना हुआ है। 
दूसरी तरफ, 'बेटी बचाओ' अभियान और महिला सशक्तिकरण के तमाम नारों के बावजूद देश के बड़े इलाके में महिलाओं पर जुल्म थम नहीं रहे हैं। सूखे और उससे उपजी गरीबी ने हालात को और खतरनाक बना दिया है। आंध्र प्रदेश में सूखे के चलते जिस्मफरोशी के लिए मजबूर महिलाओं की तरह ही उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के करीब एक दर्जन जिलों को मिलाकर बनने वाले बुंदेलखंड में भी आधी आबादी अपनी जान और इज्जत को बचाने की खामोश जंग लड़ रही है। केंद्र के पैकेज और मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश की सरकारों की पहल के बावजूद न तो इस इलाके का पिछड़ापन दूर हो रहा है और न ही महिलाओं का शोषण। 
बच्चों खासकर लड़कियों का 'मामा' कहलाना पसंद करने वाले शिवराज सिंह चौहान के सूबे में मौजूद बुंदेलखंड के सागर डिवीजन के पांच जिलों-सागर, छतरपुर, टीकमगढ, पन्ना और दमोह में 2004 से लेकर मार्च, 2011 के बीच सात सालों में 2230 लड़कियां गायब हुईं। इनमें से 482 लड़कियों का आज तक कोई पता नहीं चल पाया है। मध्य प्रदेश विधानसभा में 2011 में पेश आंकड़ों के मुताबिक सागर जिले से 482, पन्ना में 330, छतरपुर में 279, टीकमगढ़ में 345, दमोह में 2004 से 794 लड़कियों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज हुईं। इनमें से टीकमगढ़ में 50, सागर में 71, पन्ना में 88, दमोह में 221 और सागर में 52 युवतियां आज भी लापता हैं। बुंदेलखंड में लड़कियों की खरीद फरोख्त करने वाले कई गिरोह आदिवासी बाहुल्य जिलों-पन्ना और दमोह में सक्रिय हैं। बुंदेलखंड की 'बेटियों' को बहलाफुसलाकर जिस्मफरोशी के अड्डों पर बेचा जा रहा है। देह व्यापार के शिकारियों के निशाने पर ज्यादातर दलित आदिवासी नाबालिग लड़कियां हैं। कुछ समय पहले छतरपुर जिले के विश्वनाथ कॉलोनी में एक सेक्स रैकेट का पर्दाफाश करने में पुलिस को कामयाबी मिली थी। इस सेक्स रैकेट का खुलासा करने में पुलिस की मदद पन्ना जिले के मझगवां की रहने वाली आदिवासी नाबालिग युवती ने की थी। इस युवती को कुछ साल पहले इस अड्डे पर महज 5 हजार रुपये में बेच दिया गया था। अदालत में बयान देते हुए इस आदिवासी युवती ने बताया था कि पिता की मौत के बाद वह अपनी आंखों से न देख पाने वाली मां के साथ रह रही थी। लेकिन तीन साल पहले उसके साथ ही पढ़ने वाली एक लड़की ने उसे सेक्स के सरगनाओं के हाथ पांच हजार रुपये में बेच दिया। युवती के मुताबिक उसे मुंबई, झांसी, खजुराहो और दिल्ली के नामी होटलों में भेजा जाता था। इस युवती की दास्तान से पता चलता है कि 'बहादुरी' की तमाम गाथाओं के गवाह बुंदेलखंड का आज का सच उसके अतीत की तुलना में बहुत डरावना और शर्मनाक है। यह सिर्फ एक आदिवासी या दलित लड़की की कहानी नहीं है। बल्कि बुंदेलखंड के कई जिलों में हाल के सालों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं। पन्ना जिले के देवेंद्रनगर, छतरपुर के बिजावर और कंचनपुर देह व्यापार के बदनाम अड्डे हैं। यहां मौका लगते ही देह व्यापार के सरगना लड़कियों को बेच देते हैं। यहीं से खजुराहो में देसी-विदेशी सैलानियों के लिए बड़े-बड़े होटलों में लड़कियों को भेजा जाता है। 
              कोई कितना भी गरीब या फिर हालात का मारा क्यों न हो वह अपनी बेटी को जिस्म बेचने के लिए कभी नहीं कहेगा। गरीब से गरीब व्यक्ति भी कभी नहीं चाहेगा कि कभी उसे अपनी बेटी से अपने जिस्म का सौदा करने को कहना पड़े। लेकिन देश का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश के रायसेन, विदिशा, राजगढ़ जिले में कुछ घुमंतू जातियां खासकर बेड़िया जाति के लोग खुलेआम देहमंडी सजाते हैं जहां उनकी बेटियां वेश्यावृत्ति करती हैं। कई गांवों में यह शर्मनाक काम खुलेआम चल रहा है। यही नहीं, इन लड़कियों को उनके पिता ही परंपरा के नाम पर इस धंधे में धकेल रहे हैं। इन विशेष गांवों में सिर्फ बेटियों से ही देह व्यापार कराया जाता है, वहीँ घर की बहुओं को सिर्फ खाना बनाने और साफ-सफाई तक सीमित रखा जाता है। बेड़िया जाति के पुरुष अपनी बेटियों को सब कुछ जानते हुए भी इस दलदल में धकेल देते हैं। इस प्रथा का सबसे बुरा पहलू यही है कि एक बाप अपनी ही बेटी को जिस्मफरोशी करने के लिए प्रेरित करता है और उसे इसका कोई पछतावा भी नहीं होता। ऐसा नहीं है कि सरकार इस ओर कुछ नहीं कर रही लेकिन यह लोग वर्षों से चली आ रही इस हैरान कर देने वाली परपंरा से पीछा छुड़ाने को तैयार ही नहीं है।
सूखे ने सुखा दिए इंसानी जज्बात 
बुंदेलखंड में जिसे कोख से जन्मा उसकी परवरिश के लिए अपने शरीर का सौदा कर रही हैं महिलाएं और जिस परिवार में ब्याही गईं उसे पालने के लिए स्टांप पेपर पर बिक रही हैं महिलाएं। बुंदेलखंड को पांच साल के सूखे ने कितना बर्बाद किया है ये सब जानते हैं, लेकिन स्टांप पेपर पर बिक रही महिलाओं की दिल दहला देने वाली हकीकत से कम ही लोग वाकिफ है। भुखमरी और गरीबी की मार झेल रहे इस इलाके के लोगों ने पहले जानवर बेचे, फिर जमीन बेची अब यहां औरतें नीलाम हो रही हैं। सूखे और कर्ज की मार से बेहाल किसान अपनी पत्नियों का सौदा कर रहे हैं। इसके एवज में किसान कुछ पैसे लेने को मजबूर हैं। इन किसानों की पत्नियों की कीमत 4,000 से लेकर 12,000 में लगाई जा रही है। जितना सुन्दर चेहरा उतना ज्यादा मूल्य। स्टांप पेपर की आड़ में जिस्म के सौदागर जमकर फायदा उठा रहे हैं। कानून से बचने के लिए कचहरी में वकीलों की मौजूदगी के सामने स्टांप पेपर पर खरीद-फरोख्त हो रही है। औरतों का सौदा करने वालों ने इसे नाम दिया है विवाह अनुबंध। एक ऐसा विवाह जिसमें न अग्नि है, न फेरे हैं, न सप्तपदी है बस 10 रुपये के कागज के टुकड़े पर शादी का एग्रीमेंट और बिक गई औरत। शादी के ऐसे ही एक एग्रीमेंट के मुताबिक पहले से ही शादीशुदा सावित्री (बदला हुआ नाम) की हरिप्रसाद नाम के शख्स से दोबारा शादी हो रही है। सावित्री की उम्र महज 23 साल है जबकि हरिप्रसाद लगभग उसकी दुगनी उम्र 40 साल का है। सावित्री के दस्तखत को देखकर यह कहना मुश्किल है कि सावित्री नाम की महिला ने स्टांप पर खुद साइन किया या फिर उससे कहा गया कि सोचे-समझे बिना कुछ भी उकेर दो। इसी स्टांप पेपर पर ये भी लिखा है कि सावित्री ने ये फैसला बिना किसी डर के किया। बुंदेलखंड के वकील बताते हैं कि 10 रुपये के स्टांप पर एक समझौता लिख दिया जाता है कि चूंकि हम वयस्क हैं और हमारी पत्नी नहीं है इसलिये हम शादी कर रहे हैं। फिर जिसने खरीदा है वही उसे बेच देता है, इस तरह एक नहीं लाखों मामले हैं यहां पर। ये भी जरूरी नहीं कि जिसने एक बार औरत खरीदी, वो उम्रभर उसे अपने साथ रखे। कुछ समय पहले मध्य प्रदेश के नेवाड़ी थाने की पुलिस ने ऐसी ही तीन औरतों को दोबारा बिकने से बचाया।
बुंदेलखंड की कविता (बदला हुआ नाम) को उसके पति ने ही सिर्फ 8 हजार रुपयों के लिए बेच दिया। सौदा पक्का करने और इस सौदे को कानूनी दर्जा दिलाने के लिए कविता का पति बाकायदा खरीदार के साथ कोर्ट भी पहुंचा लेकिन कविता वहां से भागने में कामयाब रही। 
अपनी बदहाली पर कविता ने कहा, 'पति ने हमें बेच दिया है। पहले तो अच्छी तरह रखा लेकिन जब परेशान किया तो हम मायके चले गए। फिर पंचों ने फैसला कराया और उसके साथ पहुंचा दिया। फिर उसने झूठा दिलासा दिया और यहां ले आकर बेच दिया।' कविता बुंदेलखंड की उन हजारों औरतों में से एक है जिनका सौदा खुद अपनों ने ही कर डाला।

केंद्र को कोयला घोटाले की जांच का ब्योरा न दे सीबीआई : सुप्रीम कोर्ट


नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया है कि वह कोयला घोटाले की जांच का ब्यौरा केंद्र सरकार को न दे। सीधे अदालत को रिपोर्ट करे। कोर्ट ने कोयला ब्लॉक आवंटन में नियमों की अनदेखी किए जाने पर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया। बेंच ने कहा कि शुरुआती जांच में ही कोयला ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ी नजर आ रही है। यदि अंतिम रिपोर्ट में भी इसकी पुष्टि होती है तो सभी आवंटन रद्द कर दिए जाएंगे। कोर्ट ने सीबीआई से जांच के विवरण पेश करने के लिए हलफनामा दाखिल करने को कहा है। जस्टिस आर एम लोढ़ा और अनिल आर दवे की बेंच ने यह निर्देश वकील मनोहरलाल शर्मा की याचिका पर दिया। शर्मा के साथ गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज ने भी इस मामले में याचिका दायर की है। सरकार की ओर से एटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने दलील दी कि ब्लॉक आवंटन वैध हैं। इनमें सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है। सरकार इतनी बड़ी संख्या में कोयला ब्लॉकों का आवंटन निरस्त नहीं कर सकती। 
2004 से 2009 के बीच कोयला खदानों की बंदरबांट 
-कैग की रिपोर्ट में यूपीए सरकार पर आरोप है कि 2004 से 2009 के बीच कोयला ब्लॉक के आवंटन में अनियमितताएं बरती गईं। 
-कुछ खास कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए बगैर नीलामी के ही टेंडर बेहद सस्ती कीमतों पर दिए गए। 
-कैग के मुताबिक इस घोटाले से सरकारी खजाने को करीब 1.86 लाख करोड़ का नुकसान किया गया है। 
-कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम भी उछल रहा है। वे नवंबर 2006 से मई 2009 के बीच खुद यह मंत्रालय देख रहे थे। 
कोयला नियामक के गठन पर फैसला अब तक नहीं 
कोयला क्षेत्र के लिए स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण के गठन पर मंत्री समूह की दो बैठकें हो चुकी हैं। लेकिन वह अभी इस पर विचार ही कर रहा है। इस संबंध में मंत्री समूह ने कोई फैसला नहीं किया है। कोयला राज्य मंत्री प्रतीक प्रकाशबापू ने लोकसभा में मंगलवार को यह जानकारी एक लिखित उत्तर में दी।साभार.दैनिक भास्कर