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शनिवार, 29 दिसंबर 2012

नई राह दिखाएं साधु-संत

- रामबहादुर राय

अब साधु-संत गौ रक्षा को भूल गए हैं। उन्हें गंगा रक्षा की चिंता है। उनमें से कुछ साधु-संत पिछले दिनों दिल्ली आए। जंतर-मंतर पर धरना दिया। वे अखबारों में छपे और चैनलों पर दिखाए भी गए। लोग उन्हें अखबारों और चैनलों में देख-सुनकर विस्मित हैं कि जो काम जहां राजनीतिक संगठन करते हैं, वहां अब साधु-संतों का डेरा लगा है। विस्मय इस बात पर है कि क्या उन्हीं तौर-तरीकों से गंगा की रक्षा हो पाएगी, जो राजनीतिक दल अपने लिए एक हथकंडे के रूप में अपनाते हैं।



इसमें कोई संदेह न पहले था न आज है कि गंगा का हमारे जीवन में कितना गहरा असर है। धार्मिक ग्रंथों में गंगा का जो वर्णन है, वह उसके प्रभाव को बढ़ाता है और बनाए रखता है। न जाने कब से यह परंपरा बनी हुई है। इतना तो साफ है कि गंगोत्री से गंगासागर तक दूरी चाहे जितनी हो और गंगा चाहे जहां की भी हो, उसकी एक-एक बूंद पवित्र मानी जाती है। इसी तरह गंगा के किनारे जो थोड़ा क्षण भी गुजार लेता है, वह इस रूप में स्वयं को धन्य पाता है कि गंगा के प्रवाह में वह न केवल भागीरथ को देखता है बल्कि उन पुरखों को भी देखता है, जो उसके अपने हैं। गंगा का प्रवाह ही ऐसा है।

गंगा की पवित्रता उसके प्रवाह में है। वह प्रवाह परंपरा का है और उस क्षण का है, जिस क्षण का व्यक्ति साक्षी बनता है। परंपरा में अनुभूति का अधिक महत्व होता है और साक्षी होने में उस क्षण का महत्व होता है। प्रवाह और परंपरा की यह गंगा साक्षात् माता स्वरूप है। यही वह भावना है जो गंगा से हर जन की जुड़ी हुई है। पहले भी गंगा पर संकट के बादल मंडराए हैं, लेकिन उन्हें हमारे महापुरुषों ने अपने बुद्धि बल से हल कर लिया। एक संकट उस समय पैदा हुआ, जब नहर बनाने के लिए अंग्रेजों ने गंगा के प्रवाह को रोकने और उसका रास्ता बदलने के कुचक्र रचे। तब पंडित मदन मोहन मालवीय ने देश में प्रचंड जनमत जगाया। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को झुका दिया। उसे अपना इरादा बदलना पड़ा। लेकिन मदन मोहन मालवीय भविष्यद्रष्टा भी थे। उन्होंने भविष्य को भांप लिया था और देख लिया था कि गोरे अंग्रेजों को तो उन्होंने झुका दिया, लेकिन यही काम ‘काले अंग्रेजों’ के साथ साधना बहुत कठिन होगा। इस दुनिया से जाते-जाते उन्होंने अपने आस-पास के लोगों को चेताया था। वह चेतावनी गंगा महासभा के लोगों को याद है। अफसोस यह है कि मालवीय जी की बनाई हुई गंगा महासभा में न गंगा बची है, न महासभा। वह निष्प्राण है। बताइए, क्या मुर्दा किसी ताकत से लड़ सकता है?

गंगा पर संकट कोई अचानक नहीं आया है। इस सृष्टि में कोई भी चीज अचानक नहीं होती। उसके होने में लंबे कारण होते हैं। वह किसी घटना का एक क्रम होता है। गंगा पर भी आया हुआ संकट ऐसा ही है। इसमें व्यक्तियों, संस्थाओं और सरकारों पर निशान लगा देने मात्र से इतना ही संतोष हो सकता है कि दोषी को पहचान लिया गया है। इसका दूसरा पहलू ज्यादा महत्वपूर्ण है कि जो व्यवस्था है, वही इसके मूल में है जो संकट मंडरा रहा है। उस व्यवस्था को जानने और समझने से संकट का स्वरूप सामने आ सकता है। कहना यह है कि जब तक रोग का सही निदान न हो, तब तक औषधि कौन सी काम करेगी, इसका निर्धारण नहीं हो सकता।

पिछले दो-तीन सालों से जिस तरह की गतिविधियां गंगा के बारे में चलाई जा रही हैं, वे आशा नहीं जगातीं। यह बात अलग है कि उन गतिविधियों को संचालित करने वाले कोई एैरे-गैरे लोग नहीं हैं। साफ है कि वे बहुत माने-जाने लोग हैं। उनकी प्रतिष्ठा है। कई तो ऐसे हैं जो न केवल प्रतिष्ठित हैं, बल्कि पदस्थापित भी हैं। ऐसे लोगों के प्रयास से गंगा को बचाने का जो भी काम चलेगा, उसे सफल होना चाहिए। यही आशा की जाती है। जिन्हें मैं जानता हूं, उन लोगों की ही अगर एक सूची बनाएं तो उनकी संख्या सौ से अधिक हो जाएगी और वे लोग कोई साधारण किस्म के नहीं हैं, अपने क्षेत्र के बड़े व्यक्ति हैं। जब मेरे परिचितों में से इतने लोग गंगा बचाने में लगे हैं तो सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पूरे देश में इनकी संख्या बहुत बड़ी होगी। वह वास्तविक भी है। लेकिन दिखता यह है कि ये सारे प्रयास उसी तरह के हैं, जैसे कोई रेत से सुगंधित तेल निकालने का प्रयास करता हो। क्या कभी रेत से तेल निकल सकता है? अगर तेल ही नहीं निकलेगा तो सुगंधित होना तो बहुत दूर की बात है।

इसका एक अर्थ यह निकाला जा सकता है कि अब कोई गंगा को बचा नहीं सकता। जल्दबाजी में जो यह अर्थ खोजेगा, उसे ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता, लेकिन यह भी नहीं कह सकते और न मान सकते हैं कि गंगा को बचाया नहीं जा सकता। अगर गंगा को नहीं बचाया जा सकता तो क्या भारत नाम का देश बचेगा? भारत सिर्फ कोई भूगोल नहीं है, यह वह देश है जिसमें भूगोल उसका हिस्सा है, लेकिन वही सब कुछ नहीं है। फिर क्या है? इसे जानने और समझने के बहुत सारे रास्ते हैं। बहुत सारी पहचाने हैं। उनमें से एक प्रमुख पहचान गंगा है तो दूसरी गौ है। गौ और गंगा अभिन्न हैं। पहले गौ पर संकट आया और हमने उसको अपनी नियति मान लिया तो उसी का एक परिणाम आया है, गंगा पर संकट के रूप में।

गौ पर संकट अंग्रेजों के कारण आया। अंग्रेजों की फौज जैसे-जैसे बढ़ती गई, वैसे-वैसे गौ पर संकट भी बढ़ता गया। आजादी के बाद यह संकट पहले ही दिन से दूर हो सकता था। लेकिन आखिरी हिंदुस्तानी वायसराय ने इस प्रथा को बनाए रखा। आप जानते हैं कि वह कौन था? वे और कोई नहीं, पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। अंग्रेजों से गौ रक्षा के सवाल पर इस देश के लोगों ने करीब अस्सी साल लड़ाईयां लड़ीं। आजादी की लड़ाई में यह मुद्दा भी शामिल था। इसीलिए महात्मा गांधी ने जिनको पहला सत्याग्रही बनाया, उस विनोबा भावे ने अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में यह सवाल बड़ी संजीदगी से उठाया। जवाहर लाल नेहरू तो नहीं थे, पर उनकी बेटी से वे उम्मीद करते थे कि वे गौ वंश की रक्षा के लिए न केवल प्रधानमंत्री के रूप में, बल्कि एक मां होने के नाते भी कोई कदम उठाएंगी। उन्हीं के शासन में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने गौ रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी और आमरण अनशन पर बैठ गए। इससे देशभर के साधु और संतों ने बीड़ा उठाया। वे संकल्पबद्ध होकर दिल्ली आए। उन्हें गौ रक्षा का आश्वासन तो नहीं मिला, जो मिला वह गोली-बारूद का प्रसाद था। बहुत से साधु मारे गए और ज्यादा घायल हुए। तब से गौ रक्षा का सवाल पृष्ठभूमि में चला गया है।

अब साधु-संत गौ रक्षा को भूल गए हैं। उन्हें गंगा रक्षा की चिंता है। उनमें से कुछ साधु-संत पिछले दिनों दिल्ली आए। जंतर-मंतर पर धरना दिया। वे अखबारों में छपे और चैनलों पर दिखाए भी गए। लोग उन्हें अखबारों और चैनलों में देख-सुनकर विस्मित हैं कि जो काम जहां राजनीतिक संगठन करते हैं, वहां अब साधु-संतों का डेरा लगा है। विस्मय इस बात पर है कि क्या उन्हीं तौर-तरीकों से गंगा की रक्षा हो पाएगी, जो राजनीतिक दल अपने लिए एक हथकंडे के रूप में अपनाते हैं। इससे यह संदेह स्वभाविक रूप से पैदा होता है कि कहीं यह साधु-संतों का ऐसा हथकंडा तो नहीं है, जिसे उन्हें दस जनपथ ने पकड़ा दिया है? इस संदेह के कई आधार हैं। पहला कि साधु-सतों के मंच पर कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह की उपस्थिति अकारण नहीं हो सकती। दूसरा कि शंकराचार्य की दो-दो पीठों पर जो महामूर्ति विराजमान हैं वे स्वामी स्वरूपानंद हंै। वे जहां बैठ जाते हैं वहां से उठते ही नहीं हैं। यह बात अलग है कि वे जंतर-मंतर पर बैठने के लिए नहीं आए थे, उठने के लिए ही आए थे। इस रूप में उद्देश्य पूरा हो गया है। वे लोगों की नजरों में उठ गए हैं और माने जा रहे हैं कि गंगा रक्षा की मशाल वे थामे रहेंगे। यह हो जाए तो चमत्कार ही होगा। क्योंकि जो व्यक्ति एक पीठ को छोड़ने का लालच संवरण नहीं कर पा रहा है, क्या वह सत्ता में बैठे लोगों का मामूली प्रस्ताव भी ठुकरा सकेगा? गंगा रक्षा अभियान की इस तरह दो कमजोरियां सामने आ गई हैं। पहली कमजोरी से लोग खिन्न थे। अब दूसरी भी उनकी मनोदशा को गिराने का कारण बन रही है। एक सज्जन, जिनका नाम बड़ा ऊंचा था वे डा. जी.डी. अग्रवाल हैं, जो अब सानंद स्वामी हो गए हैं। उन्हें आमरण अनशन का झोंका आता है। जब इच्छा होती है तो आमरण अनशन पर बैठ जाते हैं और थोड़ी सी गुहार कर देने के बाद सरकार से मामूली आश्वासन पा कर अनशन तोड़ देते हैं। उनकी साख घट रही है। अब उन्हीं जैसे दूसरे महानुभाव स्वामी स्वरूपानंद सामने आ गए हैं। गंगा को बचाना तो है, पर पहले ऐसे महारथियों से ही गंगा को बचाना होगा। द

शहीद भगत सिंह का विवाह गीत

कवि ‘ताहिर’ ने लोकगीत जैसी अपनी इस रचना में यह रूपक बांधा था कि भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन को ब्याहने जा रहा है, भारत के 35 करोड़ लोग बाराती हैं और मातमी बाजे बज रहे हैं। गीत बड़ा ही मार्मिक था, जिसे सुनकर मंच पर बैठे भगत सिंह के पिता रोने लगे। पंडित नेहरू और श्रीमती कमला नेहरू की आंखें भी भीग गईं। श्रोताओं का भी बुरा हाल था। लगता था मानो उनके किसी सगे सम्बन्धी की मृत्यु हो गई है। लोग जार-जार रो रहे थे।



23 मार्च, 1931 को सरदार भगत सिंह को फांसी दी गई थी। उसके लगभग एक महीना बाद की बात है, पश्चिमी पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) के झंग नामक स्थान पर एक बड़ा भारी शहीद स्मृति सम्मेलन हुआ। उसमें भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह, पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनकी पत्नी कमला नेहरू भी सम्मिलित हुए। शोक संतप्त लोगों की अथाह भीड़ थी। मंच पर मियांवाली, सरगोधा और लायलपुर (वर्तमान फैसलाबाद) क्षेत्र के एक प्रसिद्ध पंजाबी कवि राम लभाया ‘ताहिर’ ने शहीद भगत सिंह की स्मृति में एक ऐसा शोकगीत गाया, जो छंद और शैली में ‘घोड़ी’ यानि पंजाब का एक विवाह-गीत था। कवि ‘ताहिर’ ने लोकगीत जैसी अपनी इस रचना में यह रूपक बांधा था कि भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन को ब्याहने जा रहा है, भारत के 35 करोड़ लोग बाराती हैं और मातमी बाजे बज रहे हैं। गीत बड़ा ही मार्मिक था, जिसे सुनकर मंच पर बैठे भगत सिंह के पिता रोने लगे। पंडित नेहरू और श्रीमती कमला नेहरू की आंखें भी भीग गईं। श्रोताओं का भी बुरा हाल था। लगता था मानो उनके किसी सगे सम्बन्धी की मृत्यु हो गई है। लोग जार-जार रो रहे थे।

इस घोड़ी ने पंजाब में ऐसी धूम मचाई कि कवि राम लभाया ‘ताहिर’ से प्रायः हर स्वराज्य सम्मेलन में इसे ही सुनाने की फरमाइश की जाती। घोड़ी घर-घर गूंजने लगी। मेरे परिवार में भी पहुंची और मुझे अक्सर यह अपनी बुआ और मां के दर्द भरे स्वर में सुनाई पड़ने लगी। शैशवावस्था में सुनी उस घोड़ी ने बड़े होने पर मेरे मन में इसके रचयिता से मिलने की लालसा पैदा की, लेकिन मुझे किसी से उनका अता-पता न मिला। किसी को यह भी ज्ञात नहीं था कि ‘ताहिर’ जीवित भी हैं या नहीं। मेरी बुआ और मां की बहुत पहले मृत्यु हो चुकी थी। मैंने अनेक लोगों से पूछा कि कवि न सही, उनकी यह रचना ही किसी को याद हो, लेकिन सब भूल चुके थे। ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले’ गाने वाले देश में स्वतन्त्रता के बाद शहीदों और सुराजी कवियों की जैसी उपेक्षा हुई है, यह उसका एक और प्रमाण था। तभी सौभाग्य से मेरी राम लभाया ‘ताहिर’ जी से भेंट हो गई। तब वे सौ वर्ष के हो रहे थे, लेकिन स्वस्थ और निरोग लगते थे। वे मेरे एक निकट के रिश्तेदार के मित्र निकले, जिन्होंने उन्हें घर पर खाने के लिए आमन्त्रित किया था। संयोग से मैं वहां उपस्थित था। मेरे मन की मुराद पूरी हुई और मैंने ‘ताहिर’ जी से आग्रह किया कि वे अपने स्वर में मुझे भगत सिंह की घोड़ी सुनायें। ‘ताहिर’ जी ने मेरी श्रद्धा और लगन देखकर वह घोड़ी सस्वर सुनाई, जिसे मैंने तत्काल रिकार्ड कर लिया। सौ वर्ष की आयु में भी ‘ताहिर’ जी का कंठ सुरीला था और घोड़ी उन्हें याद थी। वे अपने झंग-सरगोधा वाले पंजाबी उच्चारण के साथ पूरी तन्मयता से घोड़ी सुनाते रहे और मेजबान परिवार मन्त्रमुग्ध-सा बैठा सुनता रहा। मैं भाव-विभोर था। ‘ताहिर’ जी ने झंग में आयोजित उस शहीद स्मृति सम्मेलन के बारे में भी विस्तार से बताया।

वे शायद उस घोड़ी को रिकार्ड कराने को ही जीवित थे, क्योंकि उसके कुछ हफ्रतों बाद मुझे समाचार मिला कि उनका देहान्त हो गया। शहीदों की और राम लभाया ‘ताहिर’ की वह अमूल्य धरोहर पूरे देश की है, इसलिए मैं उसे देश को समर्पित कर रहा हूं।

इस घोड़ी में कवि ‘ताहिर’ ने पंजाबी विवाह से सम्बन्धित सारी रस्मों को सांग रूपक में पिरोया है। जब दूल्हा सजने लगता है, तो उसकी माता और अन्य महिलाएं सस्वर गाती हैं-

आओ नी भैणो रल-मिल गाविये घोड़ियां,

जंज तां होई ए तिआर वे हां

मौत कुड़ी नूं परनावन चल्लिआ

भगत सिंघ सरदार वे हां

आओ बहिनों, मिलकर घोड़ी के गीत गायें। बारात तैयार खड़ी है। सरदार भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन से विवाह करने जा रहा है। दूल्हे के सिर पर देखो कैसा विचित्र मुकुट है-

फांसी दी टोपी वाला मुकट बणा के

सेहरा तां बद्धा झालरदार वे हां

उसने काली थैली-नुमा टोपी का मुकुट धारण किया है, जिसे फांसी के समय सिर और मुंह पर पहना जाता है और (बालों की लटों वाला) उसका झालरदार सेहरा है।

भारत दी माता उत्तों छंदा चा कीता

पाणी तां पीता उत्तों वार वे हां

दूल्हे की माता स्वयं भारत माता है, जिसने बेटे की नजर उतारने के लिए उसके सिर पर से पानी को न्योछावर करके खुद पी लिया है। माता बलैयां ले रही है कि बेटा सलामत रहे। पंजाब में शादी के समय घड़ोली भरने की एक रस्म होती है, जब भाभियां घड़े लेकर पास के कुएं से पानी लाती हैं और देवर को नहलाती हैं। फिर दूल्हे की कलाई पर लाल रंग का मौली-सूत्र ;कलावाद्ध बांधा जाता है। भगत सिंह के लिए भी ये दोनों रस्में हुईं-

हंजुआं दे पाणी नाल भरके घड़ोली,

लहू दी रखी ए मौली तार वे हां

आंसुओं से घड़ोली भरने की रस्म अदा हुई और मौली थी खून का सम्बन्ध-सूत्र। दूल्हे के हाथों में मेहंदी लगाई जाती है और उसकी कलाई पर गान्ना अर्थात गंडा बांधा जाता है, जिसे विवाह होने के बाद ही खोला जाता है। भगत सिंह की मेहंदी और गान्ना किस तरह के थे-

खूंनी मेहंदी चा तैनूं लाई फिरंगीआं,

हथकड़ियां दा गांन्ना वी तिआर वे हां

फिरंगियों ने तुझे खूनी मेहंदी लगाई है और हथकड़ियों का गंडा बांधा है। पंजाब में दूल्हा स्नान करने के बाद पटरे पर से उछलकर आगे रखी घड़े के ढक्कन जैसी मिट्टी की छूंनियों पर इस तरह छलांग लगाता है कि वे सबकी-सब टूट जाती हैं। सबका टूटना जरूरी और शुभ माना जाता है। इसे खारे पर चढ़ने की रस्म कहते हैं। भगत सिंह फांसी के तख्ते से खारे पर चढ़ा है और पालथी मारकर बैठ गया है-

फांसी दे तख्त नूं खारा बणा के

बैठा तां चैंकड़ी मार वे हां

अब रस्म होगी घुड़चढ़ी की। घोड़ी की लगाम को बहिनों ने विशेष रूप से सजाया है। उन्होंने परम्परागत ढंग से दूल्हे को लगाम थमाने की रस्म अदा की, जिसके बाद वे भाई से नेग मांगेंगी। विवाहोपरान्त भाई को बहिनों के अधिकार का आदर करने के साथ-साथ उनकी भावनाओं का हमेशा मान रखना होगा-

वाग पकड़ाई वे तेथों भैणां ने मंगनी,

भैणां दा रक्खीं वीरा भार वे हां

खारे पर चढ़ने की रस्म के बाद बाजे बजने लगे-

मातमी वाजे वजदे बूहे धरत दे,

मारू दा राग उचार वे हां

ये बाजे आम नहीं, मातमी बाजे हैं, जो धरती के द्वार पर मारू राग बजा रहे हैं। धर्मनिष्ठ बाबुल गांधी ने लग्न और मुहूर्त का पूरा विचार करके विवाह सम्बन्धी शुभ कार्य आरम्भ किये हैं-

बाबुल गांधी धरमी काज रचाया,

लगन मुहूरत विचार वे हां

भगत सिंह के समान हरी किशन भी मौत से शादी कर रहा है। उसे ‘ताहिर’ ने भगत सिंह के साढ़ू की संज्ञा दी है और कहा है कि दोनों एक साथ लड़की वालों के घर पधारे हैं-

हरी किशन वी तेरा बणिआ ए सांढू,

ढुक्के तुसीं तां इक्के वार वे हां

लेकिन सहबाले कौन हैं? ये हैं राजगुरु और सुखदेव, जिन्हें भगत सिंह के साथ ही फांसी पर लटकाया गया था। इन सहबालों के बीच दूल्हा भगत सिंह कैसा शोभायमान हो रहा है-

राजगुरू ते सुखदेव सहबालड़े,

तुरिआ ए तूं विचकार वे हां

बारात भी छोटी-मोटी नहीं है, भारत के 35 करोड़ नागरिक बाराती हैं, जिनमें कोई पैदल चल रहा है और कोई वाहन पर सवार है। बारातियों ने काली पोशाकें धारण कर रखी हैं, जिनके साथ जाने के लिए कवि ‘ताहिर’ भी पूरा उत्साह दिखा रहे हैं-

पैंत्ती करोड़ तेरे जांजी वे लाड़िआ

पैदल ते कोई असवार वे हां

कालियां पुशाकां पाके जंज है तुर पई,

‘ताहिर’ वी होए ने तिआर वे हां।

राम लभाया ‘ताहिर’ भी सचमुच तैयार थे, मौत के रिश्तेदारों से ‘मिलनी’ करने के लिए। तभी तो इस गीत को सुनाने के कुछ ही हफ्रतों बाद सन 1988 में उनका देहान्त हो गया।