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रविवार, 23 जनवरी 2011

भारत और india में फर्क


-विजय आनन्द
बुद्ध और महावीर का भारत, अशोक , चन्द्रगुप्त का भारत, सूर और तुलसी का भारत, महाराणा प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, महात्मा गांधी, रविन्द्रनाथ टैगोर, सरदार पटेल का प्यारा ‘भारत’ इंडिया बन कर लोगों को भरमा रहा है। कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला यह आर्यावर्त भारत के नाम से जाना जाता रहा है। लोग आते रहे, जाते रहे, राजवंश बदलते रहे, किन्तु आर्यावर्त भारत का नाम नहीं बदला।
हमारे देश में कई उतार-चढ़ाव आये, पर भारत-भारत ही बना रहा। तुगलकों और मुगलों के शासनकाल में भी यह भूभाग भारतवर्ष के नाम से रोशन रहा। ‘भारतवर्ष’ नाम ही अपने आप में महिमापूर्ण एवं गौरवशाली है। भारत अर्थात भक्तिभाव में लीन, (भा-भक्ति, रत-लीन) हमारी मूल भावना भी शुभ एवं पवित्र रही है- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वेभवन्तु सुखिन:, सर्वेसन्तु निरामया:। सर्वे भ्रद्राणि पश्यन्तु, माकश्चित् दु:खभाग् भवेत।’ अर्थात सभी प्रसन्न रहें, सभी निरोग रहें और सबका भला हो, शुभ हो, कोई भी दुख का भागी, व्याधिग्रस्त और अभावग्रस्त न हो।मूलत: भारत आर्यावर्त है, और इसकी मिलीजुली संस्कृति निर्विवाद रूप से हजारों वर्ष पुरानी है। सभी भारतवासी आर्यपुत्र हैं, फिर चाहे वे किसी भी धर्म के हों।
दुर्भाग्यवश भारतवर्ष पर जब ब्रिटेन का कब्जा हुआ तो यहां पर सब कुछ पश्चिमी रंग-ढंग का हो गया। अंग्रेजों ने ‘भारत’ को इंडिया कहना शुरु कर दिया। जबकि भारत को भारत कहने में उच्चारण संबंधी कोई कठिनाई नहीं थी। आज विडम्बना यह है कि हम बडे गर्व से अंग्रेजी संस्कृति को अपनाए हुए हैं। देश में अब भी बहुत कुछ अंग्रेजी ढर्रे पर ही चल रहा है, बिना जांचे-परखे कि यह हमारे देश की परिस्थिति के अनुकूल है या नहीं। भारतवर्ष का नाम इंडिया (INDIA) करना अनावश्यक था। रोमन में BHARAT बिना किसी कठिनाई के लिखा और पढ़ा जा सकता है, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के नैतिक मूल्यों, गरिमा, आन-बान और शान को देखकर द्वेषवश इसका मूल नाम तिरस्कृत किया गया। शब्दकोश में (indi) वाले शब्दों पर गौर करें तो अधिकतर शब्द नकारात्मक प्रवृत्ति और दयनीय अवस्था को दर्शाते हैं। ऐसा निम्न शब्दों से सहज अनुमान लगाया जा सकता है:
INDICT – इंडिक्ट- अभियोग लगाना
INDIFFERENT- इंडिपफरेंट- उदासीन
INDIGENCE- इंडिजेंस- गरीबी
INDIGENT- इंडिजेंट- गरीब, असहाय
INDIGETION -इंडाइजेशन- अपच
INDIGNITY -इंडिग्निटी- तिरस्कार
INDISCERNIBLE - इंडिसर्निबल- धुंधला
INDISCREET -इंडिस्क्रीट- नासमझीभरा
INDISCRIMINATELY - इंडिस्क्रिमनेटली-अविवेकपूर्ण
INDISPOSED -इंडिस्पोज्ड- अस्वस्थ
INDISPOSITION -इंडिस्पोजिशन- अस्वस्थता
INDISTINCT - इंडिस्टिंक्ट- धुंधला
INDIGNANT - इंडिग्नेंट – रोषपूर्ण
उपरोक्त शब्दों में प्रथम चार अक्षर INDI हैं और अंत में बस A लगाकर इंडिया शब्द बन गया। ‘इंडिया’ शब्द कहने में ही बड़ा अटपटा लगता है। संसार के लगभग सभी देशों के नाम रोमन में ही हैं, जो मूल नाम हैं, जैसे: जापान (JAPAN), अमेरिका (AMERICA), फ्रांस (FRANCE), पाकिस्तान(PAKISTAN), नेपाल(NEPAL) वहीं भारत का नाम बदलकर इंडिया किया गया, और हम सभी भारतवासी बिना किसी विरोध के खुशी से यही नाम अपनाए हुए हैं- इंडिया की बजाय BHARAT कहना-सुनना ज्यादा कर्णप्रिय लगता है। ‘भारत’ कहने से दिल में श्रद्धा और अदब का भाव उत्पन्न होता है। शायद इसीलिए पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने कहा था ‘मेरा भारत महान’। भारत शब्द ही इस देश की प्राचीन परंपरा, संस्कृति और शुभ भावनाओं के अनुकूल है।
आज समय की जरूरत है कि हम सब भारतवासी अपने देश का नाम पुन: विश्व में ‘भारत’ के रुप में स्थापित एवं प्रतिष्ठित करें। हम सब की निर्विवाद रुप से यही प्राथमिकता होनी चाहिये। इसके लिए घर-घर अलख जगानी होगी और जन जागरण अभियान चलाने होंगे। मीडिया की इसमें सशक्त एवं प्रभावशाली भूमिका हो सकती है। संसद में इस आशय का प्रस्ताव एकमत से ध्वनित एवं पारित होना चाहिए। संसार के प्रत्येक देश में इंडिया की जगह ‘भारतवर्ष’ नाम दर्ज हो, जिससे ‘भारतवर्ष’ की प्राचीन परमपरा और संस्कृति की भीनी-भीनी खुशबू महकती रहे।
”जियें तो सदा उसी के लिए, यही अभियान रहे, यही हर्ष,
निछावर करदें हम सर्वस्व उसी पर, हमारा प्यारा भारतवर्ष”

पुस्तक समीक्षा : राष्ट्रवादी कविता



-हेमा पाण्डेय
कवि लक्ष्मी नारायण ‘भाला’ चूंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं इसलिए उनके इस कविता संग्रह ‘भारत में भारत हो’ में राष्ट्रवाद नजर आये तो किसी को अचरज कैसा। भाला की काव्य शैली कि यह विशेषता है कि बिम्ब उकेरने में उन्हें सटीक शब्द की शायद ही खोज-बीन करनी पड़ती है।
प्रस्तुत कविता संग्रह में उन्होंने विभिन्न विषयों को कलमबद्ध किया है। कहीं वो भारतमाता का गुणगान करते हुए दिखते हैं तो कहीं वो देश के युवा को आंदोलित करते हुए नजर आते हैं। इस संग्रह की कविताओं की यह खासियत है कि ये कविता कम और गीत ज्यादा लगती हैं। पाठक इन्हें लोकल ट्रेन की तरह रुक रुक कर नहीं पढ़ता बल्कि राजधानी या शताब्दी एक्सप्रेस की तरह गति के साथ पढ़ता ही चला जाता है। इस उदाहरण से बात सिद्ध हो जाएगी-
‘छोटे छोटे हाथ जोड़कर
अपना शीश झुकाते हैं।
तुतली बोली में भालत मां
तेले गीत गाते हैं।’
ऐसा नहीं है कि लक्ष्मी नारायण भाला ने केवल वैसी ही कविताएं लिखी हैं जो उनके सार्वजनिक जीवन को व्यक्त करती हैं। इस संग्रह में पाठकों को वो कविताएं भी मिलेंगी जिनसे कवि के व्यक्तिगत जीवन की झलक मिलती है। जैसे ‘अनपढ़ा पृष्ठ’ शीर्षक की कविता की ये पंक्तियां-
जीवन की खुली किताब को/ पढ़ते पढ़ाते/ एक पृष्ठ पर/ रुक जाती हैं आंखें/ उस धरातल पर/ जो कहीं सपाट है, कहीं लचीला/ कहीं मुलायम तो कहीं पथरीला।
राष्ट्रवादी लोगों के लिए यह कविता संग्रह अपने पुस्तकालय में संग्रह करने लायक है।
पुस्तक : भारत में भारत हो
कवि : लक्ष्मीनारायण ‘भाला’
प्रकाशक : स्वदेशी प्रेस, शाहदरा, दिल्ली
मूल्य : 150 रुपये
पृष्ठ : 132

जब हिन्दू घटा - तो देश बटा |


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