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बुधवार, 12 दिसंबर 2012

आर्यों में जाति व्यवस्था


प्रत्येक श्रेष्ठ और सुसभ्य मनुष्य आर्य है |

अपने आचरण, वाणी और कर्म में वैदिक सिद्धांतों का पालन करने वाले, शिष्ट, स्नेही, कभी पाप कार्य न करनेवाले, सत्य की उन्नति और प्रचार करनेवाले, आतंरिक और बाह्य शुचिता इत्यादि गुणों को सदैव धारण करनेवाले आर्य कहलाते हैं |

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र यह चार वर्ण वास्तव में व्यक्ति को नहीं बल्कि गुणों को प्रदर्शित करते हैं. प्रत्येक मनुष्य में ये चारों गुण (बुद्धि, बल, प्रबंधन, और श्रम) सदा रहते हैं. आसानी के लिए जैसे आज पढ़ाने वाले को अध्यापक, रक्षा करने वाले को सैनिक, व्यवसाय करने वाले को व्यवसायी आदि कहते हैं वैसे ही पहले उन्हें क्रमशः ब्रह्मण, क्षत्रिय या वैश्य कहा गया और इनसे अलग अन्य काम करने वालों को शूद्र. अतः यह वर्ण व्यवस्था जन्म- आधारित नहीं है|

आजकल प्रचलित कुलनाम ( surname) लगाने के रिवाज से इन वर्णों का कोई लेना-देना नहीं है | हमारे प्राचीन धर्मग्रन्थ रामायण, महाभारत या अन्य ग्रंथों में भी इस तरह से प्रथम नाम- मध्य नाम- कुलनाम लगाने का कोई चलन नहीं पाया जाता है और न ही आर्य शब्द किसी प्रकार की वंशावली को दर्शाता है|

निस्संदेह, परिवार तथा उसकी पृष्टभूमि का किसी व्यक्ति को संस्कारवान बनाने में महत्वपूर्ण स्थान है परंतु इससे कोई अज्ञात कुल का मनुष्य आर्य नहीं हो सकता यह तात्पर्य नहीं है | हमारे पतन का एक प्रमुख कारण है मिथ्या जन्मना जाति व्यवस्था जिसे हम आज मूर्खता पूर्वक अपनाये बैठे हैं और जिसके चलते हमने अपने समाज के एक बड़े हिस्से को अपने से अलग कर रखा है – उन्हें शूद्र या अछूत का दर्जा देकर – महज इसलिए कि हमें उनका मूल पता नहीं है | यह अत्यंत खेदजनक है |

आर्य शब्द किसी गोत्र से भी सरोकार नहीं रखता | गोत्र का वर्गीकरण नजदीकी संबंधों में विवाह से बचने के लिए किया गया था | प्रचलित कुलनामों का शायद ही किसी गोत्र से सम्बन्ध भी हो |

आर्य शब्द श्रेष्टता का द्योतक है | और किसी की श्रेष्ठता को जांचने में पारिवारिक पृष्ठभूमि कोई मापदंड हो ही नहीं सकता क्योंकि किसी चिकित्सक का बेटा केवल इसी लिए चिकित्सक नहीं कहलाया जा सकता क्योंकि उसका पिता चिकित्सक है, वहीँ दूसरी ओर कोई अनाथ बच्चा भी यदि पढ़ जाए तो चिकित्सक हो सकता है. ठीक इसी तरह किसी का यह कहना कि शूद्र ब्राह्मण नहीं बन सकता – सर्वथा गलत है |

ब्राह्मण का अर्थ है ज्ञान संपन्न व्यक्ति और जो शिक्षा या प्रशिक्षण के अभाव में ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बनाने की योग्यता न रखता हो – वह शूद्र है | परंतु शूद्र भी अपने प्रयत्न से ज्ञान और प्रशिक्षण प्राप्त करके वर्ण बदल सकता है | ब्राह्मण वर्ण को भी प्राप्त कर सकता है |

द्विज – अर्थात् जिसने दो बार जन्म लिया हो | जन्म से तो सभी शूद्र समझे गए हैं | ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्णों को द्विज कहते हैं क्योंकि विद्या प्राप्ति के उपरांत योग्यता हासिल करके वे समाज के कल्याण में सहयोग प्रदान करते हैं | इस तरह से इनका दूसरा जन्म ‘ विद्या जन्म’ होता है | केवल माता-पिता से जन्म प्राप्त करनेवाले और विद्याप्राप्ति में असफ़ल व्यक्ति इस दूसरे जन्म ‘ विद्या जन्म ‘ से वंचित रह जाते हैं – वे शूद्र हैं |

अतः यदि ब्राह्मण पुत्र भी अशिक्षित है तो वह शूद्र है और शूद्र भी अपने निश्चय से ज्ञान, विद्या और संस्कार प्राप्त करके ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बन सकता है | इस में माता- पिता द्वारा प्राप्त जन्म का कोई संबंध नहीं है |



आइए, हम सब सत्य ग्राही बनें, मिथ्या जातिवाद की जकड़ से मुक्त होकर एकात्म और सशक्त समाज तथा राष्ट्र का निर्माण करें |

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक 2011

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद' का प्रस्तावित हिन्दू विरोधी काला कानून श्रीमती सोनिया गाँधी की अध्यक्षता में बनाई गई "राष्ट्रीय सलाहकार समिति" द्वारा तैयार किया गया प्रस्तावित "सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011" यदि संसद द्वारा पारित कर दिया गया तो मुसलिम, ईसाई आदि अल्पसंख्यक समूहों को हिन्दुओं के प्रति घृणा फ़ैलाने, हिन्दुओं को प्रताड़ित करने और हिन्दू महिलाओं से बलात्कार करने के लिए प्रोत्साहन मिल जाएगा. इस प्रस्तावित कानून का मंतव्य ये है कि यदि बहुसंख्यक वर्ग अर्थात हिन्दू किसी अल्पसंख्यक समूह के प्रति घृणा फैलाये या हिंसा करे या यौन उत्पीड़न करे तो हिन्दुओं को दण्डित करने का प्रावधान है. किन्तु मुसलिम, ईसाई आदि अल्पसंख्यक समूहों द्वारा हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाई जाए या हिंसा की जाँच की जाए या बलात्कार आदि यौन शोषण किया जाए तो उन अल्पसंख्यकों को किसी प्रकार का दंड देने का कोई प्रावधान नहीं है. यदि कोई अल्पसंख्यक उपरोक्त अपराधों के लिए किसी बहुसंख्यक व्यक्ति या संगठन के विरुद्ध शिकायत करता है तो उसकी जांच किए बिना ही उस व्यक्ति एवं संगठन को अपराधी मानकर उसका संज्ञान लिया जाएगा. इस अपराध की असत्यता सिद्ध करना अपराधी का दायित्व होगा. शिकायत करता की पहचान गुप्त रखी जाएगी. इस विधेयक में 'समूह' की परिभाषा में केवल धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक वर्ग ही है, बहुसंख्यक वर्ग के लिए समूह शब्द का प्रयोग नहीं है और केवल समूह के विरुद्ध घृणा, हिंसा आदि किया गया अपराध ही अपराध माना जाएगा. विधेयक में ये मान लिए गया है कि सांप्रदायिक हिंसा केवल बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा ही पैदा की जाती है और अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य कभी ऐसा कर ही नहीं सकते. अतः बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के खिलाफ किए गये सांप्रदायिक अपराध तो दंडनीय हैं परन्तु अल्पसंख्यक समूहों द्वारा बहुसंख्याकों के खिलाफ किए गये ऐसे अपराध कतई दंडनीय नहीं माने गये हैं. अतः अल्पसंख्यक समुदय का कोई भी सदस्य इस कानून के तहत बहुसंख्यक समुदाय के विरुद्ध किए गये किसी अपराध के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, केवल बहुसंख्यक समुदाय का सदस्य ही ऐसे अपराध कर सकता है और इसीलिए इस कानून का मंतव्य यह है कि केवल बहुसंख्यक समुद्र का सदस्य ही ऐसे अपराध कर सकते हैं, अतः उन्हें ही दोषी मानकर दंडित किया जाना चाहिए. किसी अल्पसंख्यक ने रोजगार या किराये पर घर मांग लिया तो बिना योग्यता या अनुकूलता का विचार किए आप यदि हा नहीं कहेंगे तो आप अपराधी होंगे. पुलिस व प्रशासन अल्पसंख्यकों का कवच बन जाएगी. कहीं भी अल्पसंख्यकों के विरुद्ध उपरोक्त कोई भी अपराध होता है तो प्रशासन की भी समान जिम्मेदारी होगी. इस प्रकार प्रशासन अपने को बचाने के लिए निर्दोष हिन्दुओं को प्रताड़ित करेगा परन्तु यदि हिन्दुओं के प्रति उपरोक्त अपराध होता है तो प्रशासन को परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी. इस विधेयक के अनुसार एक सात सदस्यीय राष्ट्रीय प्राधिकरण बनेगा जिसमें कम से कम चार (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सहित) सदस्य 'समूह' अर्थात अल्पसंख्यक समुदाय के होंगे जिससे यह निश्चित है कि बहुसंख्यक समुद्र के सदस्य अल्पमत होंगे. इस विधेयक में धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव क्यों किया गया ? अपराध तो अपराध है चाहे वह किसी भी वर्ग के व्यक्ति ने किया है. सांप्रदायिक अपराध बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नहीं होते. वास्तव में ये विधेयक इस्लामिक राज्य स्थापित करने की और एक खतरनाक कदम है. भारत में वरन सम्पूर्ण विश्व में किसी देश के मूल निवासियों के लिए इस प्रकार का काला कानून शायद ही कभी किसी ने देखा होगा. यदि ये विधेयक पास हो जाता है तो भारत REPUBLIC OF ISLAMIC INDIA हो जायेगा. ऐसे विधेयक की क्या आवश्यकता है जो धर्म व जाति के आधार पर भेदभाव करके संविधान के पंथ निरपेक्ष स्वरुप को और राष्ट्र की एकता और अखंडता को खतरे में डालकर आतंकवादियों व अलगाववादियों का क़ानूनी हथियार बन जाए. इस विधेयक को तैयार करने वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सोनिया जी ने चुने हुए ऐसे लोग लिए हैं जिनका हिंदुत्व विरोधी भाव सर्वज्ञात है. इस परिषद को विधेयक तैयार करने का अधिकार किसने दिया जब इस परिषद की संविधान व कानून में कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में इसकी वैधानिकता क्या है ? श्रीमती सोनिया गाँधी कांग्रेस से बड़ी हो सकती हैं परन्तु संविधान व देश से बड़ी नहीं. PREVENTION OF COMMUNAL AND TARGETED VIOLENCE (ACCESS TO JUSTICE AND REPRATION) BILL, 2011 सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक, 2011 यूपीए सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय सलाहकार समिति (http://nac.nic.in/) ने इस महीने सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011 को चर्चा और सुझावों के लिए आम जनता के सामने रखा था. ये विधेयक यूपीए सरकार द्वारा 2005 में बनाया गया था. तब से लेकर अब तक इसके मसौदे में काफी बदलाव आ चुका है. विधेयक द्वारा बेशक कुछ अच्छा होने की बात कही जा रही हो लेकिन इसके पीछे की मंशा एक समुदाय विशेष को खुश करना है जिसका इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में किया जा सके और एक धर्म विशेष के लोगों को प्रताड़ित करना है. इस विधेयक के पास होने के बाद अर्थात कानून बनाने के बाद बहुसंख्यकों अर्थात हिन्दुओं को सिर्फ इसलिए सजा मिलेगी क्योंकि वो बहुसंख्यक हैं यानि हिन्दू हैं. विधेयक में यह स्पष्ट कहा गया है कि हिंसा, बलात्कार या घृणा सम्बन्धी प्रचार तभी अपराध मना जाएगा जब वो अल्पसंख्यकों के साथ किया गया हो. यदि किसी अल्पसंख्यक लड़की या महिला के साथ कुछ गलत किया जाता है तो वो अपराध होगा लेकिन यदि वैसे ही किसी बहुसंख्यक महिला के साथ किया जाता है तो वो कतई अपराध नहीं है. वहां पर विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है. हिंसा और घृणा का प्रचार के मामले में भी इसी तरह अपराधी निर्धारित किया जाएगा. इस प्रकार लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना पर चोट करके ये विधेयक बनाया गया है. संविधान में जगह-जगह समानता की बात की गई है लेकिन इस विधेयक का तो आधार असमानता है. विधेयक में धर्म और भासाही आधार पर असमानता को तरजीह दी गई है. विधेयक में दिए गये सभी प्रावधान साफ़-साफ़ एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की ओर इशारा करते हैं. विधेयक में ये बात स्पष्ट तौर पर मान ली गई है कि केवल बहुसंख्यक वर्ग द्वारा ही हिंसा फैलाई जा सकती है/ अल्पसंख्यक तो हिंसा कर ही नहीं सकते और सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अल्पसंख्यक हैं. विधेयक में ये भी प्रावधान किया गया है कि सांप्रदायिक हिंसा के दौरान पूरी सरकारी मशीनरी अल्पसंख्यकों की खिदमत में लग जाए और बहुसंख्यकों वर्ग के अधिक से अधिक लोगों को दंड दिलाने का प्रयास करे. अतः अगर कहीं दंगा होता है तो पुलिस या अन्य सरकारी मशीनरी इस बात की जाँच नहीं करेगी कि दंगा किसने किया या उसके कारण क्या थे बल्कि उनका काम ये देखना होगा कि दंगे में बहुसंख्यक लोग कौन-कौन शामिल थे. सांप्रदायिक हिंसा के दौरान बेशक पीड़ित बहुसंख्यक समाज हो लेकिन विधेयक केवल अल्पसंख्यकों को ही पीड़ित होने का प्रमाण पत्र प्रदान करता है, अतः बहुसंख्यक यानि हिन्दू पीड़ित हो ही नहीं सकते. इस प्रकार विधेयक एक वर्ग को ही हमेशा पीड़ित होने की गारंटी प्रदान करता है चाहे 50 अल्पसंख्यकों ने मिलकर 5 बहुसंख्यकों को मारा हो. विधेयक में सजा देने का जो प्रावधान किया गया है वो भी आश्चर्यजनक है और न्याय की मूल धरना के विपरीत है. सजा देने के लिए जो प्रक्रिया अपने जाएगी उसमें धारा 161 के तहत बायां रिकॉर्ड करने की बजाय 164 के तहत बायां दर्ज किए जायेंगे अर्थात सीधे अदालत के सामने बयान होंगे. साथ ही यदि किसी व्यक्ति पर घृणा के प्रचार सम्बन्धी आरोप लगाया जाता है तो उसे तब तक दोषी मना जाएगा जब तक कि वो निर्दोष सिद्ध नहीं हो जाता. जबकि न्याय के अनुसार कोई व्यक्ति तब तक दोषी या अपराधी नहीं मना जाता जब तक कि उस पर दोष सिद्ध न हो जाए. इस मामले में आरोप ही सबूत का काम करेगा यानि यदि किसी अल्पसंख्यक ने किसी बहुसंख्यक पर आरोप मात्रा भी लगा दिया तो वो दोषी मान लिया जाएगा. विधेयक के द्वारा सकरी मशीनरी, पुलिस, सशस्त्र बल लोकसेवकों आदि को भी एक वर्ग विशेष के हित में कार्य करने का दबाव बनाया जा सकता है या एक वर्ग विशेष द्वारा उनके ब्लैकमेलिंग की पूरी-पूरी सम्भावना बनी रहेगी. विधेयक के खंड 12 के अनुसार कोई सरकारी कर्मचारी यदि किसी समूह विशेष के व्यक्ति को पीड़ा पहुंचता है या मानसिक अथवा शारीरिक चोट पहुंचता है तो उसे यातना दिए जाने के अपराध में दण्डित किया जा सकता है. खंड 13 के अनुसार कोई सरकारी व्यक्ति इस विधेयक में उल्लिखित अपराधों के सम्बन्ध में अपनी ड्यूटी निभाने में ढिलाई बरतता है तो वो दंड का भागी होगा. खंड 14 में उन सरकारी व्यक्तियों को दंड का प्रावधान है जो सशस्त्र बालों पर नियंत्रण रखते हैं और अपनी कमान के लोगों पर कारगर ढंग से अपनी ड्यूटी निभाने हेतु नियंत्रण रखने में असफल रहते हैं. इसी प्रकार इस विधेयक के द्वारा लोकसेवकों पर बिना किसी सरकारी अनुमति के मुकदमा चलाया जा सकता है. ऐसे में स्पष्ट है कि लोकसेवक पर एक वर्ग विशेष के हित में कार्य करने के लिए व्यापक दबाव रहेगा. विधेयक में सांप्रदायिक सौहार्द , न्याय और क्षतिपूर्ति के लिए एक राष्ट्रीय प्राधिकरण गठित किया जाएगा. इस सात सदस्यीय प्राधिकरण में भी धर्म और भाषाई आधार पर जमकर भेदभाव किया जाएगा. 7 सदस्यों में से कम से कम 4 सदस्य , जिसमें दो वरिष्ठतम पद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी शामिल हैं, अल्पसंख्यक होने चाहिए. राज्यों पर भी इसी आधार पर राज्य प्राधिकरण गठित किया जाएगा. सरकारों को इस प्राधिकरण को पुलिस और अन्य दूसरी जांच एजेंसियों उपलब्ध करानी होंगी. प्राधिकरण के पास किसी शिकायत की जाँच करने, किसी ईमारत में घुसने, छापा मारने, खोजबीन करने का अधिकार होगा. प्राधिकरण सशस्त्र बालों पर भी नियंत्रण रख सकेगा और केंद्र एवं राज्य सरकारों को परामर्श जारी कर सकेगा. अतः कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की सुपर कैबिनेट ने एक ऐसा बिल तैयार किया है जिसके बाद बहुसंख्यक यानि हिन्दू अपांग हो जायेंगे. पुलिस , सशस्त्र बल आदि पंगु हो जायेंगे. अपराधी और पीड़ित किसी दंगे से पहले ही घोषित हो जाएगा. इस विधेयक को पूरा पढने के लिए इस लिंक पर (http://nac.nic.in/pdf/pctvb_amended.pdf) क्लिक करें. राष्ट्रीय सलाहकार समिति की वेबसाइट (http://nac.nic.in/) पर भी इस विधेयक को देखा जा सकता है.

रविवार, 9 दिसंबर 2012

चार वेद -चार वाक्य


लेखक- पं. देवनारायण भारद्वाज
ब्रह्म की विद्या 'ब्रह्म' अर्थात्‌ वेद ही है। चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद इनमें चार विषय क्रमशह्न ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विज्ञान हैं। यहां एक-एक वेद से एक-एक वाक्य प्रस्तुत किया जा रहा है-
1. मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्‌ (ऋग्वेद 10.53.6)-ऋग्वेद तृण से लेकर परमब्रह्म तक का ज्ञान कराता है। उसके ज्ञान का मूलभूत सारतत्व यही है कि हे मनुष्य तू स्वयं सच्च मनुष्य बन तथा दिव्य गुणयुक्त सन्तानों को जन्म दे अर्थात्‌ सुयोम्य मानवों के निर्माण में सतत प्रयत्नशील रह। मनुष्य, मनुष्य तभी बन सकता है, जब उसमें पशुताओं का प्रवेश न हो। आकार, रूप, रंग से कोई प्राणी मनुष्य दिखाई देता है, किन्तु उसके अन्दर भेड़िया, श्वान, उल्लू गृद्ध आदि आकर अपना डेरा जमा लेते हैं। ऋग्वेद हमें वह सब ज्ञान प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति एक प्रबुद्ध मानव रहता है, वह न पशु और न दानव बनने पाता है।
2. आयुर्यज्ञेन कल्पताम्‌ (यजुर्वेद 18.29)- तांबे का कोई भी तार प्रकाश नहीं कर सकता है, किन्तु जब उसमें विद्युत का प्रवाह होने लगता है तो उससे प्रकाश, गति, उर्जा ओर ध्वनि सभी प्राप्त होने लगते हैं। देखने में तार पहले जैसा ही लगता है। इसी प्रकार देखने में सभी मनुष्य एक से लगते हैं, किन्तु जिनमें यज्ञरूपी विद्युत का प्रवाह हो जाता है, वही दिव्य हो जाते हैं। पंच महायज्ञ की बात तो पृथक ही है। सामान्यतया यज्ञ से तीन कर्मों का बोध प्राप्त होता है-देवपूजा, संगतिकरण और दान। सभी सच्च्े जड़-चेतन देवताओं के प्रति पूजा-भाव रखते हुए समाज में समन्वय-संगति बनाये रखने के लिए सर्वसुलभ संपदाओं को सुविधानुसार दान करना और कराना, यही सब कार्य यज्ञ कहलाते हैं। यही कर्म मनुष्य को महामानव बना देते हैं। आहार, निद्रा, भय व मैथुन तो हर पशु तथा मानव की आवश्यकता है। पशु केवल इन्हीं के लिए जीता है। किन्तु मनुष्य इनसे ऊपर उठता है। इनको भी धर्म के कर्म अर्थात्‌ यज्ञ का रूप प्रदान करता हुआ जीता भी है और बलिदान भी हो जाता है। अगर हमने किसी को प्रेम नहीं दिया, किसी की सेवा नहीं की, किसी की पीठ नहीं थपथपाई, किसी को सहारा नहीं दिया, किसी को सान्त्वना नहीं दी, तो हमारा जीवन व्यर्थ है, निरर्थक है, एक व्यथा है। अयोग्य हैं हम। केवल अपने लिए जी रहे हैं, यह तो पशु का जीवन है। यही पशु प्रवृत्ति है कि केवल अपना ही ध्यान रखे । वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
3. सदावृधः सखा (सामवेद 169-682) - इस यज्ञ भावना, कामना एवं कर्मणा को हम सामवेद के इस उपासना परक मन्त्र से प्राप्त कर सकते हैं। हम सदैव उन व्यक्तियों को अपना मित्र बनायें, जो अपने क्षेत्र में बढे हुए हैं, वृद्ध हैं। उनकी सदसंगति से, उनके वचन व उनके अनुकरण से पढे-बेपढे सभी को सद्ज्ञान-सद्कर्म की प्रेरणा प्राप्त होती रहेगी। उनके समीप बने रहने से मानव में यज्ञ की विद्युत का प्रवाह संचार करता रहेगा, जो इस लोक में तो उपयोगी होगा ही, परलोक में भी 'सदावृधः' जो आदि से ही सर्व वृद्धिपूर्ण परमब्रह्‌मा है, उसका भी सखा बना देगा, समान ख्याति का अधिकारी बना देगा। बड़ों की समीपता व उनका सम्मान सदैव आयु, विद्या, यश एवं बल का स्त्रोत होता है। इससे कोई वंचित न हो, अपितु सब सिंचित हों। यही वेद का मधुर सामगान है।
4. माता भूमि पुत्रोहम्‌ पृथिव्याः (अथर्ववेद 12.1.12)- ज्ञान, कर्म, उपासना इन अवयवों के समन्वित रूप से निर्मित रसायन ही अथर्ववेद का विज्ञान है। पश्चिम प्रभावित विज्ञान अपने आविष्कारों से अति विचित्र यन्त्र-उपकरणों का निर्माण कर सकता है। कम्प्यूटर, दूरदर्शन,दूरभाष, इण्टरनेट और न जाने क्या क्या। इन सबसे भौतिक सुख समृद्धि का विस्तार तो होता दिखाई देता है, किन्तु आन्तरिक शान्ति तिरोहित हो जाती है। आविष्कार तो अत्यन्त विस्यमकारक अदभुत लगते हैं, किन्तु इन सबका प्रारम्भ प्रीतिकर, किन्तु परिणाम प्राणहर सिद्ध होता है। आधुनिक भोगवादी विज्ञान के चमत्कार चीत्कार में नित्य परिणत होते देखे जाते हैं। इनमें सर्वाधिक स्थूल पृथ्वी है, जो सम्पूर्ण प्रकृति का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है। वेद के अनुसार यह हमारी सृजन-पालन व आधार देने वाली माता है, साथ ही हम इसके पुत्र हैं। इसके साथ हमारा व्यवहार माता-पुत्र की भांति होना चाहिए। माता यदि जन्म देकर सन्तान का पालन पोषण करती है, तो सन्तान भी माता का सम्मान और उसकी सेवा में अपने जीवन की बाजी लगाने को प्रस्तुत रहती है। आज की भांति सागर, धरातल, पर्वत, आकाश में पाये जाने वाले पदार्थ यथा रत्न, राशि, जल, वृक्ष-वनस्पति, पत्थर, वायु सभी का भरपूर दोहन करना ही मानव का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। दोहन भी ऐसा कि इन प्राकृतिक पदार्थों का समूल विनाश होता चला जाये तथा पर्यावरण भयंकर रूप से प्रदूषित हो जाए प्रतिदिन सोने का एक अण्डा देने वाली मुर्गी से सन्तुष्ट न होकर एक बार में ही मुर्गी के पेट को फाड़कर सोने के सारे अण्डे एक साथ निकालने वालों को सोना तो मिलता ही नहीं, मुर्गी से भी हाथ धोना पड़ता है।
भूमि की भांति मानव की अन्य मातायें भी हैं। उनमें से एक माता गाय भी है। उसके पोषणकारी स्वर्णिम दुग्ध से जब जी न भरा तो मानव ने उसके मांस को ही खाना प्रारम्भ कर दिया। कृत्रिम विषैले दूध से मानव सन्तान इधर रोग ग्रस्त होती है, उधर हजारों वधशालाओं में गौओं की हत्या करके गोमांस को भारत से निर्यात किया जाता है। दैनिक जागरण (23.07.2000) के अनुसार दिल्ली के भोजन गृहों में गोमांस परोसे जाने के विरोध में जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन किया गया, वह भी मुस्लिम समुदाय के जागरूक व्यक्तियों के द्वारा। अमर उजाला दिनांक (24.07.2000) के अनुसार अमेरिका में शेर के मांस को परोसे जाने पर लोगों द्वारा आपत्ति की गई। यह तो समझ में आता है कि गाय को अंगूर, अन्न, मेवा खिलाकर अधिक गुणवत्ता पूर्ण दुग्ध प्राप्त किया जाए, किन्तु यह समझ में नहीं आता है कि शाकाहारी पशु गाय के अधिक मांस को प्राप्त करने के लिए उसे धोखे से चारे में मांस मिला कर खिला दिया जाये। इस अस्वाभाविक क्रियाकलाप से जब 'मैडकाव' बीमारी से मनुष्य प्रभावित हुए, तो बड़ी संख्या में उन गायों को मार कर अपनी जान बचायी। इतना भोगते हुए भी वनस्पतियों की स्वाभाविक प्रोटीन से अतृप्त मानव इनके जनन गुण सूत्र (जीन्स) में जन्तुओं की प्रोटीन प्रविष्ट करके न जाने और कौन सी असाध्य व्याधि बुलाना चाहता है। यह है कभी न पूरी होने वाली मनुष्य की हत्यारी हवश !
अथर्ववेद इस हवश पर नियन्त्रण करके 'वरदा वेदमाता' के ऐसे विज्ञान की प्रेरणा देता है, जिससे मानव को जीते जी आयु, प्राणश्क्ति, प्रजा, पशु, कीर्ति एवं ब्रह्मवर्चस्व तो मिलें ही, मरने के बाद ब्रह्मलोक का दिव्य आनन्द भी मिले। ऋग्वेद के ज्ञान के पदों से धर्म का बोध होता है। यजुर्वेद के कर्म सृजित अर्थ से मिलकर पद से पदार्थ बन जाते हैं। सामवेद की सात्विक कामनाओं से यह पदार्थ जगहितार्थ समर्पित हो जाते हैं। यही समर्पण अथर्ववेद के विज्ञान द्वारा मानव को मोक्ष की ओर अग्रसर कर देता है। इस प्रकार मानव ''धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष'' रूपी पुरूषार्थ चतुष्टय के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विज्ञान-चार वेदों के ये प्रधान चार विषय हैं, किन्तु सामान्य रूप से चारों वेदों के प्रत्येक मन्त्र में इन विषयों का अनुपम सामंजस्य रहता है। बिना किसी भेदभाव के मनुष्य मात्र स्वसामर्थ्यानुसार ''वेद का पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना'' परमधर्म का अनुगमन कर अपने जीवन को देदीप्यमान कर सकता है तथा वेद की 'मनुर्भव' भावना का जीवन्त स्वरूप बन सकता है।

नारियों की चाल-ढाल



नारियों की चाल-ढाल
स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती
ओ3म्‌ अधः पश्यस्व मोपरि सन्तरां पादकौ हर।
मा ते कशप्लकौ दृशन्‌ स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ।। (ऋग्वेद 8.33.19)
शब्दार्थ- हे नारि! (अधः पश्यस्व) नीचे देख (मा उपरि) ऊपर मत देख। (पादकौ सन्तरां हर) दोनों पैरों को ठीक प्रकार से एकत्र करके रख। (ते कशप्लकौ) तेरे कशप्लक अर्थात्‌ दोनों स्तन, पीठ और पेट, नितम्ब, दोनों जांघें और दोनों पिण्डलियॉं (मा दृशन्‌) दिखाई न दें। यह सब कुछ किसलिए? (हि) क्योंकि (स्त्री) स्त्री (ब्रह्मा) ब्रह्मा, निर्माणकर्त्री (बभूविथ) हुई है।
भावार्थ- मन्त्र में नारी के शील का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया गया है। प्रत्येक स्त्री को इन गुणों को अपने जीवन में धारण करना चाहिए।
1. स्त्रियों को अपनी दृष्टि सदा नीचे रखनी चाहिए, ऊपर नहीं। नीचे दृष्टि रखना लज्जा और शालीनता का चिह्न है। ऊपर देखना निर्लज्जता और अशालीनता का द्योतक है।
2. स्त्रियों को चलते समय दोनों पैरों को मिलाकर बड़ी सावधानी से चलना चाहिए। इठलाते हुए, मटकते हुए, हाव-भाव का प्रदर्शन करते हुए, चंचलता और चपलता से नहीं चलना चाहिए।
3. नारियों को वस्त्र इस प्रकार धारण करने चाहिएं कि उनके स्तन, पेट, पीठ, जंघाएँ, पिण्डलियॉं आदि दिखाई न दें। अपने अंगों का प्रदर्शन करना विलासिता और लम्पटता का द्योतक है।
4. नारी के लिए इतना बन्धन क्यों? ऐसी कठोर साधना किसलिए? इसलिए कि नारी ब्रह्मा है, वह जीवन निर्मात्री और सृजनकर्त्री है। यदि नारी ही बिगड़ गई तो सृष्टि भी बिगड़ जाएगी।

चार वेद -चार वाक्य


लेखक- पं. देवनारायण भारद्वाज
ब्रह्म की विद्या 'ब्रह्म' अर्थात्‌ वेद ही है। चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद इनमें चार विषय क्रमशह्न ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विज्ञान हैं। यहां एक-एक वेद से एक-एक वाक्य प्रस्तुत किया जा रहा है-
1. मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्‌ (ऋग्वेद 10.53.6)-ऋग्वेद तृण से लेकर परमब्रह्म तक का ज्ञान कराता है। उसके ज्ञान का मूलभूत सारतत्व यही है कि हे मनुष्य तू स्वयं सच्च मनुष्य बन तथा दिव्य गुणयुक्त सन्तानों को जन्म दे अर्थात्‌ सुयोम्य मानवों के निर्माण में सतत प्रयत्नशील रह। मनुष्य, मनुष्य तभी बन सकता है, जब उसमें पशुताओं का प्रवेश न हो। आकार, रूप, रंग से कोई प्राणी मनुष्य दिखाई देता है, किन्तु उसके अन्दर भेड़िया, श्वान, उल्लू गृद्ध आदि आकर अपना डेरा जमा लेते हैं। ऋग्वेद हमें वह सब ज्ञान प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति एक प्रबुद्ध मानव रहता है, वह न पशु और न दानव बनने पाता है।
2. आयुर्यज्ञेन कल्पताम्‌ (यजुर्वेद 18.29)- तांबे का कोई भी तार प्रकाश नहीं कर सकता है, किन्तु जब उसमें विद्युत का प्रवाह होने लगता है तो उससे प्रकाश, गति, उर्जा ओर ध्वनि सभी प्राप्त होने लगते हैं। देखने में तार पहले जैसा ही लगता है। इसी प्रकार देखने में सभी मनुष्य एक से लगते हैं, किन्तु जिनमें यज्ञरूपी विद्युत का प्रवाह हो जाता है, वही दिव्य हो जाते हैं। पंच महायज्ञ की बात तो पृथक ही है। सामान्यतया यज्ञ से तीन कर्मों का बोध प्राप्त होता है-देवपूजा, संगतिकरण और दान। सभी सच्च्े जड़-चेतन देवताओं के प्रति पूजा-भाव रखते हुए समाज में समन्वय-संगति बनाये रखने के लिए सर्वसुलभ संपदाओं को सुविधानुसार दान करना और कराना, यही सब कार्य यज्ञ कहलाते हैं। यही कर्म मनुष्य को महामानव बना देते हैं। आहार, निद्रा, भय व मैथुन तो हर पशु तथा मानव की आवश्यकता है। पशु केवल इन्हीं के लिए जीता है। किन्तु मनुष्य इनसे ऊपर उठता है। इनको भी धर्म के कर्म अर्थात्‌ यज्ञ का रूप प्रदान करता हुआ जीता भी है और बलिदान भी हो जाता है। अगर हमने किसी को प्रेम नहीं दिया, किसी की सेवा नहीं की, किसी की पीठ नहीं थपथपाई, किसी को सहारा नहीं दिया, किसी को सान्त्वना नहीं दी, तो हमारा जीवन व्यर्थ है, निरर्थक है, एक व्यथा है। अयोग्य हैं हम। केवल अपने लिए जी रहे हैं, यह तो पशु का जीवन है। यही पशु प्रवृत्ति है कि केवल अपना ही ध्यान रखे । वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
3. सदावृधः सखा (सामवेद 169-682) - इस यज्ञ भावना, कामना एवं कर्मणा को हम सामवेद के इस उपासना परक मन्त्र से प्राप्त कर सकते हैं। हम सदैव उन व्यक्तियों को अपना मित्र बनायें, जो अपने क्षेत्र में बढे हुए हैं, वृद्ध हैं। उनकी सदसंगति से, उनके वचन व उनके अनुकरण से पढे-बेपढे सभी को सद्ज्ञान-सद्कर्म की प्रेरणा प्राप्त होती रहेगी। उनके समीप बने रहने से मानव में यज्ञ की विद्युत का प्रवाह संचार करता रहेगा, जो इस लोक में तो उपयोगी होगा ही, परलोक में भी 'सदावृधः' जो आदि से ही सर्व वृद्धिपूर्ण परमब्रह्‌मा है, उसका भी सखा बना देगा, समान ख्याति का अधिकारी बना देगा। बड़ों की समीपता व उनका सम्मान सदैव आयु, विद्या, यश एवं बल का स्त्रोत होता है। इससे कोई वंचित न हो, अपितु सब सिंचित हों। यही वेद का मधुर सामगान है।
4. माता भूमि पुत्रोहम्‌ पृथिव्याः (अथर्ववेद 12.1.12)- ज्ञान, कर्म, उपासना इन अवयवों के समन्वित रूप से निर्मित रसायन ही अथर्ववेद का विज्ञान है। पश्चिम प्रभावित विज्ञान अपने आविष्कारों से अति विचित्र यन्त्र-उपकरणों का निर्माण कर सकता है। कम्प्यूटर, दूरदर्शन,दूरभाष, इण्टरनेट और न जाने क्या क्या। इन सबसे भौतिक सुख समृद्धि का विस्तार तो होता दिखाई देता है, किन्तु आन्तरिक शान्ति तिरोहित हो जाती है। आविष्कार तो अत्यन्त विस्यमकारक अदभुत लगते हैं, किन्तु इन सबका प्रारम्भ प्रीतिकर, किन्तु परिणाम प्राणहर सिद्ध होता है। आधुनिक भोगवादी विज्ञान के चमत्कार चीत्कार में नित्य परिणत होते देखे जाते हैं। इनमें सर्वाधिक स्थूल पृथ्वी है, जो सम्पूर्ण प्रकृति का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है। वेद के अनुसार यह हमारी सृजन-पालन व आधार देने वाली माता है, साथ ही हम इसके पुत्र हैं। इसके साथ हमारा व्यवहार माता-पुत्र की भांति होना चाहिए। माता यदि जन्म देकर सन्तान का पालन पोषण करती है, तो सन्तान भी माता का सम्मान और उसकी सेवा में अपने जीवन की बाजी लगाने को प्रस्तुत रहती है। आज की भांति सागर, धरातल, पर्वत, आकाश में पाये जाने वाले पदार्थ यथा रत्न, राशि, जल, वृक्ष-वनस्पति, पत्थर, वायु सभी का भरपूर दोहन करना ही मानव का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। दोहन भी ऐसा कि इन प्राकृतिक पदार्थों का समूल विनाश होता चला जाये तथा पर्यावरण भयंकर रूप से प्रदूषित हो जाए प्रतिदिन सोने का एक अण्डा देने वाली मुर्गी से सन्तुष्ट न होकर एक बार में ही मुर्गी के पेट को फाड़कर सोने के सारे अण्डे एक साथ निकालने वालों को सोना तो मिलता ही नहीं, मुर्गी से भी हाथ धोना पड़ता है।
भूमि की भांति मानव की अन्य मातायें भी हैं। उनमें से एक माता गाय भी है। उसके पोषणकारी स्वर्णिम दुग्ध से जब जी न भरा तो मानव ने उसके मांस को ही खाना प्रारम्भ कर दिया। कृत्रिम विषैले दूध से मानव सन्तान इधर रोग ग्रस्त होती है, उधर हजारों वधशालाओं में गौओं की हत्या करके गोमांस को भारत से निर्यात किया जाता है। दैनिक जागरण (23.07.2000) के अनुसार दिल्ली के भोजन गृहों में गोमांस परोसे जाने के विरोध में जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन किया गया, वह भी मुस्लिम समुदाय के जागरूक व्यक्तियों के द्वारा। अमर उजाला दिनांक (24.07.2000) के अनुसार अमेरिका में शेर के मांस को परोसे जाने पर लोगों द्वारा आपत्ति की गई। यह तो समझ में आता है कि गाय को अंगूर, अन्न, मेवा खिलाकर अधिक गुणवत्ता पूर्ण दुग्ध प्राप्त किया जाए, किन्तु यह समझ में नहीं आता है कि शाकाहारी पशु गाय के अधिक मांस को प्राप्त करने के लिए उसे धोखे से चारे में मांस मिला कर खिला दिया जाये। इस अस्वाभाविक क्रियाकलाप से जब 'मैडकाव' बीमारी से मनुष्य प्रभावित हुए, तो बड़ी संख्या में उन गायों को मार कर अपनी जान बचायी। इतना भोगते हुए भी वनस्पतियों की स्वाभाविक प्रोटीन से अतृप्त मानव इनके जनन गुण सूत्र (जीन्स) में जन्तुओं की प्रोटीन प्रविष्ट करके न जाने और कौन सी असाध्य व्याधि बुलाना चाहता है। यह है कभी न पूरी होने वाली मनुष्य की हत्यारी हवश !
अथर्ववेद इस हवश पर नियन्त्रण करके 'वरदा वेदमाता' के ऐसे विज्ञान की प्रेरणा देता है, जिससे मानव को जीते जी आयु, प्राणश्क्ति, प्रजा, पशु, कीर्ति एवं ब्रह्मवर्चस्व तो मिलें ही, मरने के बाद ब्रह्मलोक का दिव्य आनन्द भी मिले। ऋग्वेद के ज्ञान के पदों से धर्म का बोध होता है। यजुर्वेद के कर्म सृजित अर्थ से मिलकर पद से पदार्थ बन जाते हैं। सामवेद की सात्विक कामनाओं से यह पदार्थ जगहितार्थ समर्पित हो जाते हैं। यही समर्पण अथर्ववेद के विज्ञान द्वारा मानव को मोक्ष की ओर अग्रसर कर देता है। इस प्रकार मानव ''धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष'' रूपी पुरूषार्थ चतुष्टय के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विज्ञान-चार वेदों के ये प्रधान चार विषय हैं, किन्तु सामान्य रूप से चारों वेदों के प्रत्येक मन्त्र में इन विषयों का अनुपम सामंजस्य रहता है। बिना किसी भेदभाव के मनुष्य मात्र स्वसामर्थ्यानुसार ''वेद का पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना'' परमधर्म का अनुगमन कर अपने जीवन को देदीप्यमान कर सकता है तथा वेद की 'मनुर्भव' भावना का जीवन्त स्वरूप बन सकता है।