रणनीतिक मामलों की प्रमुख वेबसाइट स्ट्रेटफोर ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में चीन के सम्बन्ध में कुछ चौंकाने वाले तथ्यों का रहस्योद्घाटन किया है। इस वेबसाइट के अनुसार चीन में जैसे जैसे वर्ष 2012 में नेतृत्व की पीढी के बदलाव का समय निकट आ रहा है उसी अनुपात में चीन में सेना और सरकार के मध्य विरोधाभास और आन्तरिक तनाव के चिन्ह भी दिखने आरम्भ हो गये हैं।
वेबसाइट ने पिछले दिनों चीन की यात्रा पर गये अमेरिकी रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स की यात्रा के दौरान चीन द्वारा जे 20 की आधुनिक लडाकू विमान के परीक्षण की जानकारी चीनी राष्ट्रपति हू जिंटाओ को नहीं थी इससे सम्बन्धित गेट्स के प्रश्न पर चीन के राष्ट्रपति हू जिन्टाओ बुरी तरह चौंक गये जिसके आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस परीक्षण के लिये राबर्ट गेट्स की यात्रा के समय का चयन करते समय चीन की सेना ने सरकार से अनुमति या विचार विमर्श नहीं किया था।
वेबसाइट के अनुसार चीन के नेता माओ और देंग स्वयं सैनिक भी थे इस कारण सैन्य नीतियों और प्राथमिकताओं पर उनकी पकड थी परन्तु आज का नेतृत्व सेना के प्रशिक्षण से नहीं गुजरा है इस कारण चीन की सेना उनकी इस अनुभवहीनता का लाभ उठाकर विदेश नीति और अन्य नीतियों में अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल हो रही है। वर्ष 2012 के बाद इस प्रक्रिया में और तीव्रता आ सकती है।
स्ट्रेटफोर के अनुमान के अनुसार चीन की अर्थव्यवस्था का बुलबुला बहुत शीघ्र ही फूटने वाला है और इसकी स्थिति भी जापान, दक्षिण कोरिया , थाइलैंड और अन्य एशिया के उन देशों की भाँति हो सकती है जो तेजी से विकास दर और आर्थिक विकास के बाद संकट के दौर से गुजरे। अनुमान के अनुसार चीन में इस स्थिति में प्रांतीय विभाजन और आंतरिक टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसके साथ ही पिछले एक दशक में चीन में सेना के बढते हस्तक्षेप से इसकी सामरिक मह्त्वाकाँक्षा को लेकर अनेक देश इससे सतर्क होने लगे हैं। इस कारण चीन की सेना अब अपनी सामुद्रिक और वायुमार्ग की सैन्य क्षमता अन्य देशों से कई गुना अधिक करने में जुटी है।
वेबसाइट के ताजा अनुमान के अनुसार एक ओर चीन की आर्थिक स्थिति के अधिकतम बिंदु पर पहुँच जाने के बाद आने वाले ठहराव और उससे निपटने का संकट, पिछले कुछ वर्षों में इसके सैन्य प्रदर्शन को लेकर विश्व के अन्य देशों में बढी चिंता तथा चीन की सेना की स्वयं की मह्त्वाकाँक्षा को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाले दिनों में चीन की विदेश और आंतरिक नीतियों में सेना की भूमिका और भी अधिक बढने वाली है। इस दृष्टि से वर्ष 2012 के बाद चीन की नीतियों की दिशा क्या होती है इस पर दृष्टि रखना आवश्यक होगा विशेषकर भारत के लिये।
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शुक्रवार, 21 जनवरी 2011
गुरुवार, 20 जनवरी 2011
हिन्दू आंतकवाद: सच्चाई या दुष्प्रचार

इन दिनों अनेक विषय चर्चा में हैं उनमें से एक चर्चा यह कुछ हिंदूवादी संगठनों के सदस्यों की उग्रवादी घटनाओं में लिप्तता भी है। इस पूरी चर्चा के दो भाग हैं। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने अनेक हिंदूवादी संगठनों पर कुछ गम्भीर आरोप लगाये और इन घटनाओं के आधार पर हिंदू आतंकवाद शब्दावली ही प्रचलित कर दी। बाद में इसकी आलोचना होने के बाद इसे कुछ दक्षिणपन्थी सदस्यों का आतंकवाद कहा गया। देश के कुछ हिंदूवादी संगठनों के के बारे में लगे आरोपों को लेकर देश का प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा इस पूरे विषय में जिस प्रकार इन संगठनों के सदस्यों को क्लीन चिट दे रहा है उसे क्या आप उचित मानते हैं?
यदि आरोपों की जाँच के क्रम में किसी को क्लीन चिट देने का अर्थ जाँच की पूरी प्रकिया को ही बेमानी करार देने जैसा है। यदि कल को ये आरोप सही पाये गये तो इस राजनीतिक दल की छवि पर क्या प्रभाव होगा? यदि यह मान भी लिया जाये कि कुछ हिंदुओं ने उग्रवादी घटनाओं को अंजाम दिया है तो भी क्या राज्य का यह दायित्व नहीं बनता कि वह हर प्रकार के उग्रवाद की जाँच करे ऐसे में एक राजनीति दल होकर किसी को जाँच की रिपोर्ट आने से पहले क्लीन चिट देना कहाँ तक उचित है?
जब कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद शब्दावली से अपने हाथ खींच लिये हैं तो क्या अब कुछ हिंदू सदस्यों की उग्रवादी गतिविधियों में संलिप्तता की निष्पक्ष जाँच होने देनी चाहिये और हिंदू उत्पीडन या किसी संगठन के प्रति दुर्भावना का कार्ड किसी को नहीं खेलना चाहिये।
चर्चा का दूसरा भाग यह है कि शांति और सहिष्णुता के लिये जाने जाने वाले हिंदू ने किस कारण अपने हाथों में हथियार उठा लिये? कृपया इस चर्चा में अपने विचार व्यक्त करें। (sabhaar lokmanch.com)
यदि आरोपों की जाँच के क्रम में किसी को क्लीन चिट देने का अर्थ जाँच की पूरी प्रकिया को ही बेमानी करार देने जैसा है। यदि कल को ये आरोप सही पाये गये तो इस राजनीतिक दल की छवि पर क्या प्रभाव होगा? यदि यह मान भी लिया जाये कि कुछ हिंदुओं ने उग्रवादी घटनाओं को अंजाम दिया है तो भी क्या राज्य का यह दायित्व नहीं बनता कि वह हर प्रकार के उग्रवाद की जाँच करे ऐसे में एक राजनीति दल होकर किसी को जाँच की रिपोर्ट आने से पहले क्लीन चिट देना कहाँ तक उचित है?
जब कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद शब्दावली से अपने हाथ खींच लिये हैं तो क्या अब कुछ हिंदू सदस्यों की उग्रवादी गतिविधियों में संलिप्तता की निष्पक्ष जाँच होने देनी चाहिये और हिंदू उत्पीडन या किसी संगठन के प्रति दुर्भावना का कार्ड किसी को नहीं खेलना चाहिये।
चर्चा का दूसरा भाग यह है कि शांति और सहिष्णुता के लिये जाने जाने वाले हिंदू ने किस कारण अपने हाथों में हथियार उठा लिये? कृपया इस चर्चा में अपने विचार व्यक्त करें। (sabhaar lokmanch.com)
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