यह ब्लॉग खोजें

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

आस्था की आड़ में जेएनयू का जेहाद


एक है जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय ! मैं वहां नहीं पढ़ा इसकी कसक हमेशा थी लेकिन अब नहीं है। अब तक हमें पता था कि ये लीक से अलग हटकर सोचने वाले युवाओं का बौद्धिक तीर्थस्थल है अब मै ये कह सकता हूँ ये हिन्दुस्तान में तालिबानियों की एक पूरी जमात पैदा कर रहा है। एक ऐसी जमात जिसने ब्राह्मणवाद के विरोध की आड़ में हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों के खिलाफ जेहाद छेड़ रखा है अगर ये सब सिर्फ धार्मिक वितंडावाद और धर्मजनित शोषण उत्पीडन और गैर बराबरी के खिलाफ होता तो निस्संदेह इसका स्वागत किया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा न करके आल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंस फोरम (एआइबीएसएफ) और यूनाईटेड दलित स्‍टूडेंटस फोरम (यूडीएसएफ) जैसे तथाकथित छात्र संगठनों ने न सिर्फ हिन्दू देवी देवताओं का अपमान शुरू कर दिया बल्कि हिंदी और हिन्दुस्तान के घोर विरोधी मैकाले की जयंती भी मनाई।
इस विरोध में दलितों पिछड़ों के ये तथाकथित विचारक ये भूल गए कि आज देश में सवर्णों और एलिटों की धार्मिक आस्था तो पूरी तरह से उपभोग और मध्यमवर्गीय कुंठा में विलीन हो गयी है ,ये धर्म का इस्तेमाल भी फैशन की तरह करते है ,असली आस्था और आस्थाओं से जुडी जीवन शैली तो हमारे गाँवों, देहातों में दलितों, आदिवासियों -गिरिजनों ने अपना रखी है। अभी शायद एक सप्ताह भी नहीं हुए, उड़ीसा में आदिवासियों ने अपने हाथों से अपनी झोपडियों में आग लगा दिया है, वजह ये थी कि पुलिस के जवान माओवादियों की तलाश में उनके घरों में घुस आये थे। इस दौरान जूते पहनकर वो उनके रसोईघर में भी चले गए जहाँ वो आमतौर पर अपने देवी-देवताओं की तस्वीरें रखते हैं, इसलिए उन्होंने पुलिस के घर में घुसने के बाद पवित्रता के लिए घर को भी जलाने में कोई संकोच नहीं किया।

शर्मनाक स्थिति ये है कि आज देश में दलितवाद के पुरोधाओं और दलितों के तथाकथित मसीहाओं ने दलितों, आदिवासियों को देखा ही नहीं है, उनके विचार युद्ध भी उन दलितों -पिछडों के लिए होते हैं जिसके पेट भरे हुए हैं। ये विचारक या तो इस दम पर सत्ता हासिल करना चाहते हैं या खुद को जबरिया बुद्धिजीवी मनवाने पर तुले हुए हैं। हम इसे धोखाधड़ी कहते हैं। शायद बात अजीबोगरीब लगे लेकिन ये सच है कि वो लोग जो जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में महिसाषुर की जयंती मना रहे हैं अगर किसी बैगा या धरकार आदिवासी के घर जाकर उनको अपने उद्देश्यों के बारे में बताएं तो वो अगले ही पल घर में रखी कुल्हाड़ी से उनकी गर्दन अलग कर देगा। वो भी इसे वध कहना कहते हैं। धर्म से जुड़े मिथकों से दलितों-आदिवासियों ने अपने अपने किस्से गढ़ लिए हैं, जो कहीं भी किसी भी किताब में पढ़ने को नहीं मिलते। जिरही, अमिला जैसे दुर्गा के नाम आपको किसी भी हिंदू धर्म के ग्रंथों में नहीं मिलेंगे। वो उन्हें अपनी खेती किसानी और अपनी संस्थाओं से जोड़ कर देखता हैं। मजे की बात ये है कि आदिवासियों को हिन्दू धर्म से कोई मतलब नहीं है। मध्य प्रदेश पूर्वी उत्तर प्रदेश और छतीसगढ़ की कई जनजातियाँ तो जानती ही नहीं उनका धर्म क्या है। हाँ उनके आस्था के प्रतीक वही हैं जो हिन्दुओं के है ,लेकिन उनकी पूजा शैली भी बिलकुल भिन्न है। वो नवरात्र में महिसाषुर के नाम पर अमिला देवी के मंदिर पर हजारों पशुओं की बलि चढ़ा देगा और उन्हें खायेगा भी ,जबकि कोई भी हिन्दू धर्म का अनुयायी नवरात्र में मांस को हाँथ तक नहीं लगाएगा। आप और हम मिथकों को नए तरीकों से परिभाषित कर अपनी अपनी कुंठाओं को शांत कर सकते हैं ,वो उन्हें परिभाषित हरगिज नहीं करेगा ,क्यूंकि उसे लगता है कि वो इन्ही की बदौलत वो सरकार ,सवर्णवादी समाज और प्रकृति से लड़ सकता है। हमारे कहने का मतलब ये हरगिज नहीं है कि मिथकों को परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए ,लेकिन मिथक दूसरे मिथक को ही जन्म देंगे, ये सच है।

शायद हममे से कुछ लोगों ने ने इतिहासकार डॉ युगेश्वर को पढ़ा हो उन्होंने कई किताबें लिखी है जिनमे एक किताब है “रावण एक जीवन ” उनकी ये किताब पढ़ते वक्त मुमकिन है आपकी आस्था रावण में हो जाए ,इतिहास से जुड़े पात्रों का चुनाव हमेंव्यक्तिगत तौर पर करना है ,लेकिन इसे किसी समूह पर कैसे अध्यारोपित किया जा सकता है ?फेसबुक और ब्लागिंग के इस शानदार युग में जब विचारों का बेरोक टोक आदान प्रदान संभव है ,शहरी एलिट वर्ग को ये स्वतंत्रता बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। ये कुछ ऐसा है कि बढ़िया पकवान को अति खाना और शर्मनाक तरीके से उलटी कर देना। उन्हे यूँ लगता है कि इन माध्यमों का उपयोग करके वो किसी भी व्यक्ति या समुदाय पर पूरी ताकत से हमला बोल सकते हैं ,नतीजा ये है कि ये हमले वेब से निकलकर विश्वविद्यालाओं के गलियारों तक पहुँच चुके हैं। एक ऐसे समय में जब सत्ता ने विश्वविद्यालयों के लोकतंत्र को अपने पैरों से रौंद डाला हैं। छात्र संघ चुनावों को ख़त्म करके छात्रों से विरोध का एक आखिरी हथियार भी छिन्न लिया गया हो ,जहाँ नहीं तहां छात्र लतियाए जा रहे हों ,लठीयाये जा रहे हों ,मेस में दलित छात्रों का सबके साथ भोजन करना अभी तक वर्जित हो ,इस तरह की कोई भी कोशिश बेहद खेदपूर्ण है। आस्था और अनास्था हमें खुद तय करनी है ,लेकिन किसी भी व्यक्ति या वर्ग की आस्था को अवैज्ञानिक और अतार्किक आधार पर चोट पहुंचाने का अधिकार किसी को नहीं है। याद रखें ये वही जेएनयु है जहाँ अश्लील एम्एम्एस बनाने कों भी एक किस्म की बुद्धिजीविता माना जाता है ,ये वही जेएनयु है जहाँ के छात्र ,किताबों और जनांदोलनों की राह छोड़कर गांजे और चरस के अँधेरे में गुम हैं। ये वही विश्वविद्यालय है जो दुनिया भर के लाखों छात्रों का निर्माण करने वाले काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के कुलगीत का अपमान करता है। अतिवादिता हमेशा खतरनाक होती है ,मुमकिन हैआगे देवी देवताओं के चित्र जलाये जाएँ,केम्पस जंग के मैदान में तब्दील हो जाए और कुछ ब्लाग्स और वेबसाइट्स इसे भुनाए भी। जो भी हो ये तय है महिषासुर और मैकाले कों पूजने वाले इस विश्वविद्यालय ने अब वो अधिकार खो दिया है, जिससे वो देश भर के छात्रों और छात्र आन्दोलनों का नेतृत्व कर सके।
प्रस्तुतकर्ता रामदास सोनी

ब्रह्मचर्य और गृहस्थ जीवन में धर्म, अर्थ और काम का महत्व

हिंदू आश्रम व्यवस्था को जानें
*धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
*ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।
*धर्म से मोक्ष और अर्थ से काम साध्य माना गया है।


ब्रह्मचर्य और गृहस्थ जीवन में धर्म, अर्थ और काम का महत्व है। वानप्रस्थ और संन्यास में धर्म प्रचार तथा मोक्ष का महत्व माना गया है।
प्राचीन भारत में ऋषि-मुनि वन में कुटी बनाकर रहते थे। जहाँ वे ध्यान और तपस्या करते थे। उक्त जगह पर समाज के लोग अपने बालकों को वेदाध्यन के अलावा अन्य विद्याएँ सीखने के लिए भेजते थे। धीरे-धीरे यह आश्रम संन्यासियों, त्यागियों, विरक्तों धार्मिक यात्रियों और अन्य लोगों के लिए शरण स्थली बनता गया।
यहीं पर तर्क-वितर्क और दर्शन की अनेकों धारणाएँ विकसित हुई। सत्य की खोज, राज्य के मसले और अन्य समस्याओं के समाधान का यह प्रमुख केंद्र बन गया। कुछ लोग यहाँ सांसारिक झंझटों से बचकर शांतिपूर्वक रहकर गुरु की वाणी सुनते थे। इसे ही ब्रह्मचर्य और संन्यास आश्रम कहा जाने लगा।
ब्रह्मचर्य आश्रम को ही मठ या गुरुकुल कहा जाता है। ये आधुनिक शिक्षा के साथ धार्मिक शिक्षा के केंद्र होते हैं। यह आश्रय स्थली भी है। पुष्ट शरीर, बलिष्ठ मन, संस्कृत बुद्धि एवं प्रबुद्ध प्रज्ञा लेकर ही विद्यार्थी ग्रहस्थ जीवन में प्रवेश करता है। विवाह कर वह सामाजिक कर्तव्य निभाता है। संतानोत्पत्ति कर पितृऋण चुकता करता है। यही पितृ यज्ञ भी है।
ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम में रहकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की शिक्षा लेते हुए व्यक्ति को 50 वर्ष की उम्र के बाद वानप्रस्थ आश्रम में रहकर धर्म और ध्यान का कार्य करते हुए मोक्ष की अभिलाषा रखना चाहिए अर्थात उसे मुमुक्ष हो जाना चाहिए। ऐसा वैदज्ञ कहते हैं।
आश्रमों की अपनी व्यवस्था होती है। इसके नियम होते हैं। आश्रम शिक्षा, धर्म और ध्यान व तपस्या के केंद्र हैं। राज्य और समाज आश्रमों के अधीन होता है। सभी को आश्रमों के अधीन माना जाता है। मंदिर में पुरोहित और आश्रमों में आचार्यगण होते हैं। आचार्य की अपनी जिम्मेदारी होती है कि वे किस तरह समाज में धर्म कायम रखें। राज्य के निरंकुश होने पर अंकुश लगाएँ। किस तरह विद्यार्थियों को शिक्षा दें, किस तरह वे आश्रम के संन्यासियों को वेदाध्ययन कराएँ और मुक्ति की शिक्षा दें। संन्यासी ही धर्म की रीढ़ हैं।
राज्य, समाज, मंदिर और आश्रम को धर्म संघ के अधीन माना गया है। आचार्यों के संगठन को ही संघ कहा जाता है। संघ की अपनी नीति और उसके अपने नियम होते हैं। जो संन्यासी आश्रम से जुड़ा हुआ नहीं है उसे संन्यासी नहीं माना जाता। संन्यासियों का मंदिर से कोई वास्ता नहीं होता।
आश्रम चार हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। आश्रम ही हिंदू समाज की जीवन व्यवस्था है। आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति की उम्र 100 वर्ष मानकर उसे चार भागों में बाँटा गया है।
उम्र के प्रथम 25 वर्ष में शरीर, मन और बुद्धि के विकास को निर्धारित किया गया है। दूसरा गृहस्थ आश्रम है जो 25 से 50 वर्ष की आयु के लिए निर्धारित है जिसमें शिक्षा के बाद विवाह कर पति-पत्नी धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हैं। उक्त उम्र में व्यवसाय या कार्य को करते हुए अर्थ और काम का सुख भोगते हैं।
50 से 75 तक की आयु से गृहस्थ भार से मुक्त होकर जनसेवा, धर्मसेवा, विद्यादान और ध्यान का विधान है। इसे वानप्रस्थ कहा गया है। फिर धीरे-धीरे इससे भी मुक्त होकर व्यक्ति संन्यास आश्रम में प्रवेश कर संन्यासियों के ही साथ रहता है।
प्रस्तुतकर्ता रामदास सोनी

बांग्लादेशी घुसपैठ से असम के इस्लामीकरण की आवाज उठाई जा रही है

अगर एक तरफ असम में बांग्लादेशी घुसपैठ से असम के इस्लामीकरण की आवाज उठाई जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश में हिन्दू आबादी तेजी से कम हो रही है. बांग्लादेश में 2001 से 2011 के बीच तेज गिरावट दर्ज की गई है. 2001 में बांग्लादेश की जनगणना के अनुसार वहां 1.68 करोड़ हिन्दू थे जो 2011 में घटकर 1.23 करोड़ रह गये हैं. बांग्लादेश में अब कम से कम 15 जिले ऐसे हैं जहां हिन्दू आबादी नदारद हो गई है.

2011 की गई जगनणना की जो रिपोर्ट सामने आई है उसके मुताबिक 2001 की जगनणना में बांग्लादेश में कुल आबादी के 9.2 प्रतिशत हिन्दू थे लेकिन 2011 में उनकी संख्या बढ़ने की बजाय घटकर बांग्लादेश की कुल आबादी के 8.5 प्रतिशत रह गई है. 2001 में बांग्लादेश की हिन्दू आबादी 1.68 करोड़ थी. हिन्दू जन्मदर के आधार पर जो आंकलन किया गया था उसके मुताबिक 2011 में बांग्लादेश में हिन्दू आबादी 1.82 करोड़ होनी चाहिए थी लेकिन जो नतीजे निकले हैं वे चौंकानेवाले हैं. बांग्लादेश में हिन्दू आबादी बढ़ने की बजाय तेजी से घटी है और अब बांग्लादेश में हिन्दू आबादी घटकर 1.23 करोड़ रह गई है. यानी एक दशक के भीतर करीब साठ लाख हिन्दू कम हो गये. हालांकि इसी अवधि के दौरान ईसाई, बौद्ध और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के वृद्धिदर में कोई कमी नहीं दर्ज की गई है. बांग्लादेश में 90.4 प्रतिशत मुस्लिम हैं बाकी नौ प्रतिशत में अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक हैं.
बांग्लादेश में हिन्दूओं की इस घटती संख्या के पीछे बांग्लादेश में चरमपंथी मुस्लिम संगठन हैं जो इस्लाम के नाम पर मुस्लिमों के बीच काम करते हैं और बड़े पैमाने पर हिन्दुओं के खिलाफ अभियानों को मदद करते हैं. बांग्लादेश में इससे संबंधित जो रपटें प्रकाशित हुई हैं वे बताती हैं कि बांग्लादेश में हिन्दुओं का जबर्दस्त उत्पीड़न हो रहा है. केवल हिंसक वारदातों के जरिए ही उनकी जर जमीन उनसे हासिल नहीं की जा रही है बल्कि इस्लामिक देशों से आर्थिक मदद हासिल करके काम करनेवाले गैर सरकारी मुस्लिम संगठन बड़े पैमाने पर धर्मांतरण को भी अंजाम दे रहे हैं. एक अनुमान है कि बांग्लादेश में ऐसे करीब तीन सौ गैर सरकारी संगठन सक्रिय हैं जो हिन्दुओं को धर्मांतरित कर रहे हैं जिसके कारण हिन्दू आबादी में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है.
लेकिन बांग्लादेश में हिन्दुओं का ध्रर्मांतरण ही उनके लिए एकमात्र समस्या नहीं है. बांग्लादेश के नेशनल हिन्दू ग्रैण्ड एलायंस के महासचिव गोविन्द चन्द्र प्रमाणिक के हवाले से बांग्लादेश के अखबार वीकली ब्लिट्ज कहता है कि बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर हिन्दू लड़कियों का अपहरण करके उनका जबरन मुस्लिमों के साथ विवाह कर दिया जाता है. विरोध करने पर उनके साथ गैंगरेप तक की घटनाएं अंजाम दी जाती हैं. एनेमी प्रापर्टी एक्ट के प्रावधानों के तहत वहां हिन्दुओं की जर जमीन बड़े पैमाने पर मुस्लिम आबादी ने कब्जा कर लिया है जिसके कारण हिन्दू पलायन पर मजबूर हो रहे हैं. इसके अलावा मुस्लिम बहुल इलाकों में हिन्दुओं का उत्पीड़न के कारण भी वहां हिन्दू आबादी में तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है.
 उम्मीद की जा रही थी कि शेख हसीना की सरकार आने के बाद बांग्लादेश के हालात में कुछ बदलाव नजर आयेंगे लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं आये हैं. प्रमाणिक एक उदाहरण से बताते हैं कि शेख हसीना की सरकार में भी हिन्दुओं के उत्पीड़न में कोई कमी नहीं आई है. उनका कहना है कि बांग्लादेश के गोपालगंज जिले में 2001 की जनगणना के अनुसार हिन्दू आबादी 3 लाख 71 हजार थी. बांग्लादेश में गोपालगंज हिन्दू बहुल जिला था और ऐसा समझा जाता था कि हिन्दू वोटबैंक की लालच में यहां हिन्दुओं को कोई नुकसान नहीं होगा. लेकिन 2011 की जनगणना रिपोर्ट बताती है कि गोपालगंज में हिन्दुओं की संख्या घटकर पचास हजार से भी नीचे चली गई है. प्रणाणिक कहते हैं कि इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं के लिए अब कोई स्वर्ग नहीं बचा है. बांग्लादेश में शेख हसीना की पार्टी बांग्लादेश अवामी लीग को हिन्दू अपनी पार्टी समझते थे और उन्हें उम्मीद थी कि लीग की सरकार आयेगी तो हिन्दुओं की रक्षा हो सकेगी लेकिन लीग की सरकार आने के बाद भी हिन्दुओं के उत्पीड़न में कोई कमी नहीं आई. ---रामदास सोनी

181 pariwaron ke 442 logon ne sweekara hindu dharm