वे भुखे जो अन्न उगावें,
वे नंगे जो वस्त्र बनावें,
वे बेघर जो महल चुनावें,
मानव का निर्माण अरूचिकर,
प्रलय बादलो बरसो-बरसो
यह धरती समतल हो जाये
उमड़-घुमड़ कर बादल आये
कवि चिरंजीवी की यह पंक्तियां आज आजादी के 65 वर्षो बाद भी चरितार्थ होती नजर आती हैं। गत दो माह से अपनी गन्ना उपज का मूल्य मांग रहे किसानों को अपना घर छोड़कर इस कड़कड़ाती ठण्ड में जीटी रोड स्थित लधौआ चीनी मिल पर आंदोलन करना पड़ रहा है। किन्तु एक ओर किसानों की मसीहा बनने वाली उ.प्र. सरकार के कान में जूं नहीं रेंग रही है तो वहीं दूसरी ओर अपवादों को छोड़ दें तो अवसरवादी मीडिया भी इस पर ध्यान देना उचित नहीं समझती। वैसे भी जब इस मिल का उद्घाटन पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान मुख्यमंत्री के संरक्षक मुलायम सिंह यादव के कर कमलों से हुआ था। लोंगों का तो यह भी कहना है कि मिल मालिक और उ.प्र. सरकार के सम्बन्ध काफी मधुर हैं।
हाथों मंे जहर की शीशियां और दिलों में स्वार्थी राजनीति के प्रति आक्रोश लिए किसान अपने परिवारों के साथ लम्बे समय तक भूख हड़ताल और प्रदर्शन कर थका हुआ महसूस करने लगे हैं। किन्तु उनके दर्द को समझना तो दूर कोई सुनने तक को भी तैयार नहीं लगता। उनके घरों में भी फांके रहने की स्थिति आ गई है। लेकिन विकास के दावे करने वाली सरकारों को कोई फर्क नहीं पड़ता। यह भूख अगर नक्सलवाद या अन्य प्रकार के विद्रोह का रूप लेती तो गरीबी मिटाने का दम भरने वाले गरीबों को मिटाने की षड्यंत्र बानाने लगते हैं।
यदि शीघ्र ही इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो आंदोलन सड़कों अथवा रेल मार्ग को अवरुद्ध कर जन-जीवन अस्त-व्यस्त करने की ओर भी बढ़ सकता है। अपने ही पैसे को भीख की तरह मांग रहे किसानों की परिस्थितियों को समझा जाना चाहिए वरना आंदोलन का स्वरूप विकृत भी हो सकता है
