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शनिवार, 29 दिसंबर 2012

नई राह दिखाएं साधु-संत

- रामबहादुर राय

अब साधु-संत गौ रक्षा को भूल गए हैं। उन्हें गंगा रक्षा की चिंता है। उनमें से कुछ साधु-संत पिछले दिनों दिल्ली आए। जंतर-मंतर पर धरना दिया। वे अखबारों में छपे और चैनलों पर दिखाए भी गए। लोग उन्हें अखबारों और चैनलों में देख-सुनकर विस्मित हैं कि जो काम जहां राजनीतिक संगठन करते हैं, वहां अब साधु-संतों का डेरा लगा है। विस्मय इस बात पर है कि क्या उन्हीं तौर-तरीकों से गंगा की रक्षा हो पाएगी, जो राजनीतिक दल अपने लिए एक हथकंडे के रूप में अपनाते हैं।



इसमें कोई संदेह न पहले था न आज है कि गंगा का हमारे जीवन में कितना गहरा असर है। धार्मिक ग्रंथों में गंगा का जो वर्णन है, वह उसके प्रभाव को बढ़ाता है और बनाए रखता है। न जाने कब से यह परंपरा बनी हुई है। इतना तो साफ है कि गंगोत्री से गंगासागर तक दूरी चाहे जितनी हो और गंगा चाहे जहां की भी हो, उसकी एक-एक बूंद पवित्र मानी जाती है। इसी तरह गंगा के किनारे जो थोड़ा क्षण भी गुजार लेता है, वह इस रूप में स्वयं को धन्य पाता है कि गंगा के प्रवाह में वह न केवल भागीरथ को देखता है बल्कि उन पुरखों को भी देखता है, जो उसके अपने हैं। गंगा का प्रवाह ही ऐसा है।

गंगा की पवित्रता उसके प्रवाह में है। वह प्रवाह परंपरा का है और उस क्षण का है, जिस क्षण का व्यक्ति साक्षी बनता है। परंपरा में अनुभूति का अधिक महत्व होता है और साक्षी होने में उस क्षण का महत्व होता है। प्रवाह और परंपरा की यह गंगा साक्षात् माता स्वरूप है। यही वह भावना है जो गंगा से हर जन की जुड़ी हुई है। पहले भी गंगा पर संकट के बादल मंडराए हैं, लेकिन उन्हें हमारे महापुरुषों ने अपने बुद्धि बल से हल कर लिया। एक संकट उस समय पैदा हुआ, जब नहर बनाने के लिए अंग्रेजों ने गंगा के प्रवाह को रोकने और उसका रास्ता बदलने के कुचक्र रचे। तब पंडित मदन मोहन मालवीय ने देश में प्रचंड जनमत जगाया। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को झुका दिया। उसे अपना इरादा बदलना पड़ा। लेकिन मदन मोहन मालवीय भविष्यद्रष्टा भी थे। उन्होंने भविष्य को भांप लिया था और देख लिया था कि गोरे अंग्रेजों को तो उन्होंने झुका दिया, लेकिन यही काम ‘काले अंग्रेजों’ के साथ साधना बहुत कठिन होगा। इस दुनिया से जाते-जाते उन्होंने अपने आस-पास के लोगों को चेताया था। वह चेतावनी गंगा महासभा के लोगों को याद है। अफसोस यह है कि मालवीय जी की बनाई हुई गंगा महासभा में न गंगा बची है, न महासभा। वह निष्प्राण है। बताइए, क्या मुर्दा किसी ताकत से लड़ सकता है?

गंगा पर संकट कोई अचानक नहीं आया है। इस सृष्टि में कोई भी चीज अचानक नहीं होती। उसके होने में लंबे कारण होते हैं। वह किसी घटना का एक क्रम होता है। गंगा पर भी आया हुआ संकट ऐसा ही है। इसमें व्यक्तियों, संस्थाओं और सरकारों पर निशान लगा देने मात्र से इतना ही संतोष हो सकता है कि दोषी को पहचान लिया गया है। इसका दूसरा पहलू ज्यादा महत्वपूर्ण है कि जो व्यवस्था है, वही इसके मूल में है जो संकट मंडरा रहा है। उस व्यवस्था को जानने और समझने से संकट का स्वरूप सामने आ सकता है। कहना यह है कि जब तक रोग का सही निदान न हो, तब तक औषधि कौन सी काम करेगी, इसका निर्धारण नहीं हो सकता।

पिछले दो-तीन सालों से जिस तरह की गतिविधियां गंगा के बारे में चलाई जा रही हैं, वे आशा नहीं जगातीं। यह बात अलग है कि उन गतिविधियों को संचालित करने वाले कोई एैरे-गैरे लोग नहीं हैं। साफ है कि वे बहुत माने-जाने लोग हैं। उनकी प्रतिष्ठा है। कई तो ऐसे हैं जो न केवल प्रतिष्ठित हैं, बल्कि पदस्थापित भी हैं। ऐसे लोगों के प्रयास से गंगा को बचाने का जो भी काम चलेगा, उसे सफल होना चाहिए। यही आशा की जाती है। जिन्हें मैं जानता हूं, उन लोगों की ही अगर एक सूची बनाएं तो उनकी संख्या सौ से अधिक हो जाएगी और वे लोग कोई साधारण किस्म के नहीं हैं, अपने क्षेत्र के बड़े व्यक्ति हैं। जब मेरे परिचितों में से इतने लोग गंगा बचाने में लगे हैं तो सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पूरे देश में इनकी संख्या बहुत बड़ी होगी। वह वास्तविक भी है। लेकिन दिखता यह है कि ये सारे प्रयास उसी तरह के हैं, जैसे कोई रेत से सुगंधित तेल निकालने का प्रयास करता हो। क्या कभी रेत से तेल निकल सकता है? अगर तेल ही नहीं निकलेगा तो सुगंधित होना तो बहुत दूर की बात है।

इसका एक अर्थ यह निकाला जा सकता है कि अब कोई गंगा को बचा नहीं सकता। जल्दबाजी में जो यह अर्थ खोजेगा, उसे ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता, लेकिन यह भी नहीं कह सकते और न मान सकते हैं कि गंगा को बचाया नहीं जा सकता। अगर गंगा को नहीं बचाया जा सकता तो क्या भारत नाम का देश बचेगा? भारत सिर्फ कोई भूगोल नहीं है, यह वह देश है जिसमें भूगोल उसका हिस्सा है, लेकिन वही सब कुछ नहीं है। फिर क्या है? इसे जानने और समझने के बहुत सारे रास्ते हैं। बहुत सारी पहचाने हैं। उनमें से एक प्रमुख पहचान गंगा है तो दूसरी गौ है। गौ और गंगा अभिन्न हैं। पहले गौ पर संकट आया और हमने उसको अपनी नियति मान लिया तो उसी का एक परिणाम आया है, गंगा पर संकट के रूप में।

गौ पर संकट अंग्रेजों के कारण आया। अंग्रेजों की फौज जैसे-जैसे बढ़ती गई, वैसे-वैसे गौ पर संकट भी बढ़ता गया। आजादी के बाद यह संकट पहले ही दिन से दूर हो सकता था। लेकिन आखिरी हिंदुस्तानी वायसराय ने इस प्रथा को बनाए रखा। आप जानते हैं कि वह कौन था? वे और कोई नहीं, पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। अंग्रेजों से गौ रक्षा के सवाल पर इस देश के लोगों ने करीब अस्सी साल लड़ाईयां लड़ीं। आजादी की लड़ाई में यह मुद्दा भी शामिल था। इसीलिए महात्मा गांधी ने जिनको पहला सत्याग्रही बनाया, उस विनोबा भावे ने अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में यह सवाल बड़ी संजीदगी से उठाया। जवाहर लाल नेहरू तो नहीं थे, पर उनकी बेटी से वे उम्मीद करते थे कि वे गौ वंश की रक्षा के लिए न केवल प्रधानमंत्री के रूप में, बल्कि एक मां होने के नाते भी कोई कदम उठाएंगी। उन्हीं के शासन में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने गौ रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी और आमरण अनशन पर बैठ गए। इससे देशभर के साधु और संतों ने बीड़ा उठाया। वे संकल्पबद्ध होकर दिल्ली आए। उन्हें गौ रक्षा का आश्वासन तो नहीं मिला, जो मिला वह गोली-बारूद का प्रसाद था। बहुत से साधु मारे गए और ज्यादा घायल हुए। तब से गौ रक्षा का सवाल पृष्ठभूमि में चला गया है।

अब साधु-संत गौ रक्षा को भूल गए हैं। उन्हें गंगा रक्षा की चिंता है। उनमें से कुछ साधु-संत पिछले दिनों दिल्ली आए। जंतर-मंतर पर धरना दिया। वे अखबारों में छपे और चैनलों पर दिखाए भी गए। लोग उन्हें अखबारों और चैनलों में देख-सुनकर विस्मित हैं कि जो काम जहां राजनीतिक संगठन करते हैं, वहां अब साधु-संतों का डेरा लगा है। विस्मय इस बात पर है कि क्या उन्हीं तौर-तरीकों से गंगा की रक्षा हो पाएगी, जो राजनीतिक दल अपने लिए एक हथकंडे के रूप में अपनाते हैं। इससे यह संदेह स्वभाविक रूप से पैदा होता है कि कहीं यह साधु-संतों का ऐसा हथकंडा तो नहीं है, जिसे उन्हें दस जनपथ ने पकड़ा दिया है? इस संदेह के कई आधार हैं। पहला कि साधु-सतों के मंच पर कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह की उपस्थिति अकारण नहीं हो सकती। दूसरा कि शंकराचार्य की दो-दो पीठों पर जो महामूर्ति विराजमान हैं वे स्वामी स्वरूपानंद हंै। वे जहां बैठ जाते हैं वहां से उठते ही नहीं हैं। यह बात अलग है कि वे जंतर-मंतर पर बैठने के लिए नहीं आए थे, उठने के लिए ही आए थे। इस रूप में उद्देश्य पूरा हो गया है। वे लोगों की नजरों में उठ गए हैं और माने जा रहे हैं कि गंगा रक्षा की मशाल वे थामे रहेंगे। यह हो जाए तो चमत्कार ही होगा। क्योंकि जो व्यक्ति एक पीठ को छोड़ने का लालच संवरण नहीं कर पा रहा है, क्या वह सत्ता में बैठे लोगों का मामूली प्रस्ताव भी ठुकरा सकेगा? गंगा रक्षा अभियान की इस तरह दो कमजोरियां सामने आ गई हैं। पहली कमजोरी से लोग खिन्न थे। अब दूसरी भी उनकी मनोदशा को गिराने का कारण बन रही है। एक सज्जन, जिनका नाम बड़ा ऊंचा था वे डा. जी.डी. अग्रवाल हैं, जो अब सानंद स्वामी हो गए हैं। उन्हें आमरण अनशन का झोंका आता है। जब इच्छा होती है तो आमरण अनशन पर बैठ जाते हैं और थोड़ी सी गुहार कर देने के बाद सरकार से मामूली आश्वासन पा कर अनशन तोड़ देते हैं। उनकी साख घट रही है। अब उन्हीं जैसे दूसरे महानुभाव स्वामी स्वरूपानंद सामने आ गए हैं। गंगा को बचाना तो है, पर पहले ऐसे महारथियों से ही गंगा को बचाना होगा। द

शहीद भगत सिंह का विवाह गीत

कवि ‘ताहिर’ ने लोकगीत जैसी अपनी इस रचना में यह रूपक बांधा था कि भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन को ब्याहने जा रहा है, भारत के 35 करोड़ लोग बाराती हैं और मातमी बाजे बज रहे हैं। गीत बड़ा ही मार्मिक था, जिसे सुनकर मंच पर बैठे भगत सिंह के पिता रोने लगे। पंडित नेहरू और श्रीमती कमला नेहरू की आंखें भी भीग गईं। श्रोताओं का भी बुरा हाल था। लगता था मानो उनके किसी सगे सम्बन्धी की मृत्यु हो गई है। लोग जार-जार रो रहे थे।



23 मार्च, 1931 को सरदार भगत सिंह को फांसी दी गई थी। उसके लगभग एक महीना बाद की बात है, पश्चिमी पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) के झंग नामक स्थान पर एक बड़ा भारी शहीद स्मृति सम्मेलन हुआ। उसमें भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह, पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनकी पत्नी कमला नेहरू भी सम्मिलित हुए। शोक संतप्त लोगों की अथाह भीड़ थी। मंच पर मियांवाली, सरगोधा और लायलपुर (वर्तमान फैसलाबाद) क्षेत्र के एक प्रसिद्ध पंजाबी कवि राम लभाया ‘ताहिर’ ने शहीद भगत सिंह की स्मृति में एक ऐसा शोकगीत गाया, जो छंद और शैली में ‘घोड़ी’ यानि पंजाब का एक विवाह-गीत था। कवि ‘ताहिर’ ने लोकगीत जैसी अपनी इस रचना में यह रूपक बांधा था कि भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन को ब्याहने जा रहा है, भारत के 35 करोड़ लोग बाराती हैं और मातमी बाजे बज रहे हैं। गीत बड़ा ही मार्मिक था, जिसे सुनकर मंच पर बैठे भगत सिंह के पिता रोने लगे। पंडित नेहरू और श्रीमती कमला नेहरू की आंखें भी भीग गईं। श्रोताओं का भी बुरा हाल था। लगता था मानो उनके किसी सगे सम्बन्धी की मृत्यु हो गई है। लोग जार-जार रो रहे थे।

इस घोड़ी ने पंजाब में ऐसी धूम मचाई कि कवि राम लभाया ‘ताहिर’ से प्रायः हर स्वराज्य सम्मेलन में इसे ही सुनाने की फरमाइश की जाती। घोड़ी घर-घर गूंजने लगी। मेरे परिवार में भी पहुंची और मुझे अक्सर यह अपनी बुआ और मां के दर्द भरे स्वर में सुनाई पड़ने लगी। शैशवावस्था में सुनी उस घोड़ी ने बड़े होने पर मेरे मन में इसके रचयिता से मिलने की लालसा पैदा की, लेकिन मुझे किसी से उनका अता-पता न मिला। किसी को यह भी ज्ञात नहीं था कि ‘ताहिर’ जीवित भी हैं या नहीं। मेरी बुआ और मां की बहुत पहले मृत्यु हो चुकी थी। मैंने अनेक लोगों से पूछा कि कवि न सही, उनकी यह रचना ही किसी को याद हो, लेकिन सब भूल चुके थे। ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले’ गाने वाले देश में स्वतन्त्रता के बाद शहीदों और सुराजी कवियों की जैसी उपेक्षा हुई है, यह उसका एक और प्रमाण था। तभी सौभाग्य से मेरी राम लभाया ‘ताहिर’ जी से भेंट हो गई। तब वे सौ वर्ष के हो रहे थे, लेकिन स्वस्थ और निरोग लगते थे। वे मेरे एक निकट के रिश्तेदार के मित्र निकले, जिन्होंने उन्हें घर पर खाने के लिए आमन्त्रित किया था। संयोग से मैं वहां उपस्थित था। मेरे मन की मुराद पूरी हुई और मैंने ‘ताहिर’ जी से आग्रह किया कि वे अपने स्वर में मुझे भगत सिंह की घोड़ी सुनायें। ‘ताहिर’ जी ने मेरी श्रद्धा और लगन देखकर वह घोड़ी सस्वर सुनाई, जिसे मैंने तत्काल रिकार्ड कर लिया। सौ वर्ष की आयु में भी ‘ताहिर’ जी का कंठ सुरीला था और घोड़ी उन्हें याद थी। वे अपने झंग-सरगोधा वाले पंजाबी उच्चारण के साथ पूरी तन्मयता से घोड़ी सुनाते रहे और मेजबान परिवार मन्त्रमुग्ध-सा बैठा सुनता रहा। मैं भाव-विभोर था। ‘ताहिर’ जी ने झंग में आयोजित उस शहीद स्मृति सम्मेलन के बारे में भी विस्तार से बताया।

वे शायद उस घोड़ी को रिकार्ड कराने को ही जीवित थे, क्योंकि उसके कुछ हफ्रतों बाद मुझे समाचार मिला कि उनका देहान्त हो गया। शहीदों की और राम लभाया ‘ताहिर’ की वह अमूल्य धरोहर पूरे देश की है, इसलिए मैं उसे देश को समर्पित कर रहा हूं।

इस घोड़ी में कवि ‘ताहिर’ ने पंजाबी विवाह से सम्बन्धित सारी रस्मों को सांग रूपक में पिरोया है। जब दूल्हा सजने लगता है, तो उसकी माता और अन्य महिलाएं सस्वर गाती हैं-

आओ नी भैणो रल-मिल गाविये घोड़ियां,

जंज तां होई ए तिआर वे हां

मौत कुड़ी नूं परनावन चल्लिआ

भगत सिंघ सरदार वे हां

आओ बहिनों, मिलकर घोड़ी के गीत गायें। बारात तैयार खड़ी है। सरदार भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन से विवाह करने जा रहा है। दूल्हे के सिर पर देखो कैसा विचित्र मुकुट है-

फांसी दी टोपी वाला मुकट बणा के

सेहरा तां बद्धा झालरदार वे हां

उसने काली थैली-नुमा टोपी का मुकुट धारण किया है, जिसे फांसी के समय सिर और मुंह पर पहना जाता है और (बालों की लटों वाला) उसका झालरदार सेहरा है।

भारत दी माता उत्तों छंदा चा कीता

पाणी तां पीता उत्तों वार वे हां

दूल्हे की माता स्वयं भारत माता है, जिसने बेटे की नजर उतारने के लिए उसके सिर पर से पानी को न्योछावर करके खुद पी लिया है। माता बलैयां ले रही है कि बेटा सलामत रहे। पंजाब में शादी के समय घड़ोली भरने की एक रस्म होती है, जब भाभियां घड़े लेकर पास के कुएं से पानी लाती हैं और देवर को नहलाती हैं। फिर दूल्हे की कलाई पर लाल रंग का मौली-सूत्र ;कलावाद्ध बांधा जाता है। भगत सिंह के लिए भी ये दोनों रस्में हुईं-

हंजुआं दे पाणी नाल भरके घड़ोली,

लहू दी रखी ए मौली तार वे हां

आंसुओं से घड़ोली भरने की रस्म अदा हुई और मौली थी खून का सम्बन्ध-सूत्र। दूल्हे के हाथों में मेहंदी लगाई जाती है और उसकी कलाई पर गान्ना अर्थात गंडा बांधा जाता है, जिसे विवाह होने के बाद ही खोला जाता है। भगत सिंह की मेहंदी और गान्ना किस तरह के थे-

खूंनी मेहंदी चा तैनूं लाई फिरंगीआं,

हथकड़ियां दा गांन्ना वी तिआर वे हां

फिरंगियों ने तुझे खूनी मेहंदी लगाई है और हथकड़ियों का गंडा बांधा है। पंजाब में दूल्हा स्नान करने के बाद पटरे पर से उछलकर आगे रखी घड़े के ढक्कन जैसी मिट्टी की छूंनियों पर इस तरह छलांग लगाता है कि वे सबकी-सब टूट जाती हैं। सबका टूटना जरूरी और शुभ माना जाता है। इसे खारे पर चढ़ने की रस्म कहते हैं। भगत सिंह फांसी के तख्ते से खारे पर चढ़ा है और पालथी मारकर बैठ गया है-

फांसी दे तख्त नूं खारा बणा के

बैठा तां चैंकड़ी मार वे हां

अब रस्म होगी घुड़चढ़ी की। घोड़ी की लगाम को बहिनों ने विशेष रूप से सजाया है। उन्होंने परम्परागत ढंग से दूल्हे को लगाम थमाने की रस्म अदा की, जिसके बाद वे भाई से नेग मांगेंगी। विवाहोपरान्त भाई को बहिनों के अधिकार का आदर करने के साथ-साथ उनकी भावनाओं का हमेशा मान रखना होगा-

वाग पकड़ाई वे तेथों भैणां ने मंगनी,

भैणां दा रक्खीं वीरा भार वे हां

खारे पर चढ़ने की रस्म के बाद बाजे बजने लगे-

मातमी वाजे वजदे बूहे धरत दे,

मारू दा राग उचार वे हां

ये बाजे आम नहीं, मातमी बाजे हैं, जो धरती के द्वार पर मारू राग बजा रहे हैं। धर्मनिष्ठ बाबुल गांधी ने लग्न और मुहूर्त का पूरा विचार करके विवाह सम्बन्धी शुभ कार्य आरम्भ किये हैं-

बाबुल गांधी धरमी काज रचाया,

लगन मुहूरत विचार वे हां

भगत सिंह के समान हरी किशन भी मौत से शादी कर रहा है। उसे ‘ताहिर’ ने भगत सिंह के साढ़ू की संज्ञा दी है और कहा है कि दोनों एक साथ लड़की वालों के घर पधारे हैं-

हरी किशन वी तेरा बणिआ ए सांढू,

ढुक्के तुसीं तां इक्के वार वे हां

लेकिन सहबाले कौन हैं? ये हैं राजगुरु और सुखदेव, जिन्हें भगत सिंह के साथ ही फांसी पर लटकाया गया था। इन सहबालों के बीच दूल्हा भगत सिंह कैसा शोभायमान हो रहा है-

राजगुरू ते सुखदेव सहबालड़े,

तुरिआ ए तूं विचकार वे हां

बारात भी छोटी-मोटी नहीं है, भारत के 35 करोड़ नागरिक बाराती हैं, जिनमें कोई पैदल चल रहा है और कोई वाहन पर सवार है। बारातियों ने काली पोशाकें धारण कर रखी हैं, जिनके साथ जाने के लिए कवि ‘ताहिर’ भी पूरा उत्साह दिखा रहे हैं-

पैंत्ती करोड़ तेरे जांजी वे लाड़िआ

पैदल ते कोई असवार वे हां

कालियां पुशाकां पाके जंज है तुर पई,

‘ताहिर’ वी होए ने तिआर वे हां।

राम लभाया ‘ताहिर’ भी सचमुच तैयार थे, मौत के रिश्तेदारों से ‘मिलनी’ करने के लिए। तभी तो इस गीत को सुनाने के कुछ ही हफ्रतों बाद सन 1988 में उनका देहान्त हो गया।

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

वेदों में नारी


वेद नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय, उच्च स्थान प्रदान करते हैं| वेदों में स्त्रियों की शिक्षा- दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का जो सुन्दर वर्णन पाया जाता है, वैसा संसार के अन्य किसी धर्मग्रंथ में नहीं है| वेद उन्हें घर की सम्राज्ञी कहते हैं और देश की शासक, पृथ्वी की सम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते हैं|

वेदों में स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ समान पूजनीय| वेदों में नारी को ज्ञान देने वाली, सुख – समृद्धि लाने वाली, विशेष तेज वाली, देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा- जो सबको जगाती है इत्यादि अनेक आदर सूचक नाम दिए गए हैं|

वेदों में स्त्रियों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है – उसे सदा विजयिनी कहा गया है और उन के हर काम में सहयोग और प्रोत्साहन की बात कही गई है| वैदिक काल में नारी अध्यन- अध्यापन से लेकर रणक्षेत्र में भी जाती थी| जैसे कैकयी महाराज दशरथ के साथ युद्ध में गई थी| कन्या को अपना पति स्वयं चुनने का अधिकार देकर वेद पुरुष से एक कदम आगे ही रखते हैं|

अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं – अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि |

तथापि, जिन्होनें वेदों के दर्शन भी नहीं किए, ऐसे कुछ रीढ़ की हड्डी विहीन बुद्धिवादियों ने इस देश की सभ्यता, संस्कृति को नष्ट – भ्रष्ट करने का जो अभियान चला रखा है – उसके तहत वेदों में नारी की अवमानना का ढ़ोल पीटते रहते हैं |

आइए, वेदों में नारी के स्वरुप की झलक इन मंत्रों में देखें -

अथर्ववेद ११.५.१८

ब्रह्मचर्य सूक्त के इस मंत्र में कन्याओं के लिए भी ब्रह्मचर्य और विद्या ग्रहण करने के बाद ही विवाह करने के लिए कहा गया है | यह सूक्त लड़कों के समान ही कन्याओं की शिक्षा को भी विशेष महत्त्व देता है |

कन्याएं ब्रह्मचर्य के सेवन से पूर्ण विदुषी और युवती होकर ही विवाह करें |

अथर्ववेद १४.१.६

माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धीमत्ता और विद्याबल का उपहार दें | वे उसे ज्ञान का दहेज़ दें |

जब कन्याएं बाहरी उपकरणों को छोड़ कर, भीतरी विद्या बल से चैतन्य स्वभाव और पदार्थों को दिव्य दृष्टि से देखने वाली और आकाश और भूमि से सुवर्ण आदि प्राप्त करने – कराने वाली हो तब सुयोग्य पति से विवाह करे |

अथर्ववेद १४.१.२०

हे पत्नी ! हमें ज्ञान का उपदेश कर |

वधू अपनी विद्वत्ता और शुभ गुणों से पति के घर में सब को प्रसन्न कर दे |

अथर्ववेद ७.४६.३

पति को संपत्ति कमाने के तरीके बता |

संतानों को पालने वाली, निश्चित ज्ञान वाली, सह्त्रों स्तुति वाली और चारों ओर प्रभाव डालने वाली स्त्री, तुम ऐश्वर्य पाती हो | हे सुयोग्य पति की पत्नी, अपने पति को संपत्ति के लिए आगे बढ़ाओ |

अथर्ववेद ७.४७.१

हे स्त्री ! तुम सभी कर्मों को जानती हो |

हे स्त्री ! तुम हमें ऐश्वर्य और समृद्धि दो |

अथर्ववेद ७.४७.२

तुम सब कुछ जानने वाली हमें धन – धान्य से समर्थ कर दो |

हे स्त्री ! तुम हमारे धन और समृद्धि को बढ़ाओ |

अथर्ववेद ७.४८.२

तुम हमें बुद्धि से धन दो |

विदुषी, सम्माननीय, विचारशील, प्रसन्नचित्त पत्नी संपत्ति की रक्षा और वृद्धि करती है और घर में सुख़ लाती है |

अथर्ववेद १४.१.६४

हे स्त्री ! तुम हमारे घर की प्रत्येक दिशा में ब्रह्म अर्थात् वैदिक ज्ञान का प्रयोग करो |

हे वधू ! विद्वानों के घर में पहुंच कर कल्याणकारिणी और सुखदायिनी होकर तुम विराजमान हो |

अथर्ववेद २.३६.५

हे वधू ! तुम ऐश्वर्य की नौका पर चढ़ो और अपने पति को जो कि तुमने स्वयं पसंद किया है, संसार – सागर के पार पहुंचा दो |

हे वधू ! ऐश्वर्य कि अटूट नाव पर चढ़ और अपने पति को सफ़लता के तट पर ले चल |

अथर्ववेद १.१४.३

हे वर ! यह वधू तुम्हारे कुल की रक्षा करने वाली है |

हे वर ! यह कन्या तुम्हारे कुल की रक्षा करने वाली है | यह बहुत काल तक तुम्हारे घर में निवास करे और बुद्धिमत्ता के बीज बोये |

अथर्ववेद २.३६.३

यह वधू पति के घर जा कर रानी बने और वहां प्रकाशित हो |

अथर्ववेद ११.१.१७

ये स्त्रियां शुद्ध, पवित्र और यज्ञीय ( यज्ञ समान पूजनीय ) हैं, ये प्रजा, पशु और अन्न देतीं हैं |

यह स्त्रियां शुद्ध स्वभाव वाली, पवित्र आचरण वाली, पूजनीय, सेवा योग्य, शुभ चरित्र वाली और विद्वत्तापूर्ण हैं | यह समाज को प्रजा, पशु और सुख़ पहुँचाती हैं |

अथर्ववेद १२.१.२५

हे मातृभूमि ! कन्याओं में जो तेज होता है, वह हमें दो |

स्त्रियों में जो सेवनीय ऐश्वर्य और कांति है, हे भूमि ! उस के साथ हमें भी मिला |

अथर्ववेद १२.२.३१

स्त्रियां कभी दुख से रोयें नहीं, इन्हें निरोग रखा जाए और रत्न, आभूषण इत्यादि पहनने को दिए जाएं |

अथर्ववेद १४.१.२०

हे वधू ! तुम पति के घर में जा कर गृहपत्नी और सब को वश में रखने वाली बनों |

अथर्ववेद १४.१.५०

हे पत्नी ! अपने सौभाग्य के लिए मैं तेरा हाथ पकड़ता हूं |

अथर्ववेद १४.२ .२६

हे वधू ! तुम कल्याण करने वाली हो और घरों को उद्देश्य तक पहुंचाने वाली हो |

अथर्ववेद १४.२.७१

हे पत्नी ! मैं ज्ञानवान हूं तू भी ज्ञानवती है, मैं सामवेद हूं तो तू ऋग्वेद है |

अथर्ववेद १४.२.७४

यह वधू विराट अर्थात् चमकने वाली है, इस ने सब को जीत लिया है |

यह वधू बड़े ऐश्वर्य वाली और पुरुषार्थिनी हो |

अथर्ववेद ७.३८.४ और १२.३.५२

सभा और समिति में जा कर स्त्रियां भाग लें और अपने विचार प्रकट करें |

ऋग्वेद १०.८५.७

माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धिमत्ता और विद्याबल उपहार में दें | माता- पिता को चाहिए कि वे अपनी कन्या को दहेज़ भी दें तो वह ज्ञान का दहेज़ हो |

ऋग्वेद ३.३१.१

पुत्रों की ही भांति पुत्री भी अपने पिता की संपत्ति में समान रूप से उत्तराधिकारी है |

ऋग्वेद १० .१ .५९

एक गृहपत्नी प्रात : काल उठते ही अपने उद् गार कहती है -

” यह सूर्य उदय हुआ है, इस के साथ ही मेरा सौभाग्य भी ऊँचा चढ़ निकला है | मैं अपने घर और समाज की ध्वजा हूं , उस की मस्तक हूं | मैं भारी व्यख्यात्री हूं | मेरे पुत्र शत्रु -विजयी हैं | मेरी पुत्री संसार में चमकती है | मैं स्वयं दुश्मनों को जीतने वाली हूं | मेरे पति का असीम यश है | मैंने वह त्याग किया है जिससे इन्द्र (सम्राट ) विजय पता है | मुझेभी विजय मिली है | मैंने अपने शत्रु नि:शेष कर दिए हैं | ”

वह सूर्य ऊपर आ गया है और मेरा सौभाग्य भी ऊँचा हो गया है | मैं जानती हूं , अपने प्रतिस्पर्धियों को जीतकर मैंने पति के प्रेम को फ़िर से पा लिया है |

मैं प्रतीक हूं , मैं शिर हूं , मैं सबसे प्रमुख हूं और अब मैं कहती हूं कि मेरी इच्छा के अनुसार ही मेरा पति आचरण करे | प्रतिस्पर्धी मेरा कोई नहीं है |

मेरे पुत्र मेरे शत्रुओं को नष्ट करने वाले हैं , मेरी पुत्री रानी है , मैं विजयशील हूं | मेरे और मेरे पति के प्रेम की व्यापक प्रसिद्धि है |

ओ प्रबुद्ध ! मैंने उस अर्ध्य को अर्पण किया है , जो सबसे अधिक उदाहरणीय है और इस तरह मैं सबसे अधिक प्रसिद्ध और सामर्थ्यवान हो गई हूं | मैंने स्वयं को अपने प्रतिस्पर्धियों से मुक्त कर लिया है |

मैं प्रतिस्पर्धियों से मुक्त हो कर, अब प्रतिस्पर्धियों की विध्वंसक हूं और विजेता हूं | मैंने दूसरों का वैभव ऐसे हर लिया है जैसे की वह न टिक पाने वाले कमजोर बांध हों | मैंने मेरे प्रतिस्पर्धियों पर विजय प्राप्त कर ली है | जिससे मैं इस नायक और उस की प्रजा पर यथेष्ट शासन चला सकती हूं |

इस मंत्र की ऋषिका और देवता दोनों हो शची हैं | शची इन्द्राणी है, शची स्वयं में राज्य की सम्राज्ञी है ( जैसे कि कोई महिला प्रधानमंत्री या राष्ट्राध्यक्ष हो ) | उस के पुत्र – पुत्री भी राज्य के लिए समर्पित हैं |

ऋग्वेद १.१६४.४१

ऐसे निर्मल मन वाली स्त्री जिसका मन एक पारदर्शी स्फटिक जैसे परिशुद्ध जल की तरह हो वह एक वेद, दो वेद या चार वेद , आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद , अर्थवेद इत्यादि के साथ ही छ : वेदांगों – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद : को प्राप्त करे और इस वैविध्यपूर्ण ज्ञान को अन्यों को भी दे |

हे स्त्री पुरुषों ! जो एक वेद का अभ्यास करने वाली वा दो वेद जिसने अभ्यास किए वा चार वेदों की पढ़ने वाली वा चार वेद और चार उपवेदों की शिक्षा से युक्त वा चार वेद, चार उपवेद और व्याकरण आदि शिक्षा युक्त, अतिशय कर के विद्याओं में प्रसिद्ध होती और असंख्यात अक्षरों वाली होती हुई सब से उत्तम, आकाश के समान व्याप्त निश्चल परमात्मा के निमित्त प्रयत्न करती है और गौ स्वर्ण युक्त विदुषी स्त्रियों को शब्द कराती अर्थात् जल के समान निर्मल वचनों को छांटती अर्थात् अविद्यादी दोषों को अलग करती हुई वह संसार के लिए अत्यंत सुख करने वाली होती है |

ऋग्वेद १०.८५.४६

स्त्री को परिवार और पत्नी की महत्वपूर्ण भूमिका में चित्रित किया गया है | इसी तरह, वेद स्त्री की सामाजिक, प्रशासकीय और राष्ट्र की सम्राज्ञी के रूप का वर्णन भी करते हैं |

ऋग्वेद के कई सूक्त उषा का देवता के रूप में वर्णन करते हैं और इस उषा को एक आदर्श स्त्री के रूप में माना गया है | कृपया पं श्रीपाद दामोदर सातवलेकर द्वारा लिखित ” उषा देवता “, ऋग्वेद का सुबोध भाष्य देखें |

सारांश (पृ १२१ – १४७ ) -

१. स्त्रियां वीर हों | ( पृ १२२, १२८)

२. स्त्रियां सुविज्ञ हों | ( पृ १२२)

३. स्त्रियां यशस्वी हों | (पृ १२३)

४. स्त्रियां रथ पर सवारी करें | ( पृ १२३)

५. स्त्रियां विदुषी हों | ( पृ १२३)

६. स्त्रियां संपदा शाली और धनाढ्य हों | ( पृ १२५)

७.स्त्रियां बुद्धिमती और ज्ञानवती हों | ( पृ १२६)

८. स्त्रियां परिवार ,समाज की रक्षक हों और सेना में जाएं | (पृ १३४, १३६ )

९. स्त्रियां तेजोमयी हों | ( पृ १३७)

१०.स्त्रियां धन-धान्य और वैभव देने वाली हों | ( पृ १४१-१४६)

यजुर्वेद २०.९

स्त्री और पुरुष दोनों को शासक चुने जाने का समान अधिकार है |

यजुर्वेद १७.४५

स्त्रियों की भी सेना हो | स्त्रियों को युद्ध में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें |

यजुर्वेद १०.२६

शासकों की स्त्रियां अन्यों को राजनीति की शिक्षा दें | जैसे राजा, लोगों का न्याय करते हैं वैसे ही रानी भी न्याय करने वाली हों |



संदर्भ सूची :
मेरा धर्म, प्रियव्रत वेदवाचस्पति, प्रकाशन मंदिर , गुरुकुल कांगड़ी विश्विद्यालय , हरिद्वार
Book: Rgveda Samhita, Vol XIII, Swami Satya Prakash Saraswati & Satyakam Vidyalankar,Ved Pratishthana, New Delhi
“उषा देवता ” ऋग्वेद का सुबोध भाष्य, पं श्री पाद दामोदर सातवलेकर, स्वाध्याय मंडल, औंध
अथर्ववेद-हिंदी भाष्य भाग १ – २, क्षेमकरणदास त्रिवेदी, सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली
अथर्ववेद का सुबोध भाष्य ( अध्याय ७ -१०) श्रीपाद दामोदर सातवलेकर
ऋग्वेद भाष्यम, भाग III , स्वामी दयानंद सरस्वती , वैदिक यन्त्रालय
वागंभृणीय, डा. प्रियंवदा वेदभार

मनुस्मृति और शूद्र


भारत में आज अनेक संकट छाये हुए हैं – भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कट्टरवाद, धर्मांतरण, नैतिक अध : पतन, अशिक्षा, चरमरायी हुई स्वास्थ्य व्यवस्था, सफ़ाई की समस्या वगैरह – वगैरह | पर इन सभी से ज्यादा भयावह है – जन्मना जातिवाद और लिंग भेद | क्योंकि यह दो मूलभूत समस्याएँ ही बाकी समस्याओं को पनपने में मदद करती हैं | यह दो प्रश्न ही हमारे भूत और वर्तमान की समस्त आपदाओं का मुख्य कारण हैं | इन को मूल से ही नष्ट नहीं किया तो हमारा उज्जवल भविष्य सिर्फ़ एक सपना बनकर रह जाएगा क्योंकि एक समृद्ध और समर्थ समाज का अस्तित्व जाति प्रथा और लिंग भेद के साथ नहीं हो सकता |

यह भी गौर किया जाना चाहिए कि जाति भेद और लिंग भेद केवल हिन्दू समाज की ही समस्याएँ नहीं हैं किन्तु यह दोनों सांस्कृतिक समस्याएँ हैं | लिंग भेद सदियों से वैश्विक समस्या रही है और जाति भेद दक्षिण एशिया में पनपी हुई, सभी धर्मों और समाजों को छूती हुई समस्या है | चूँकि हिन्दुत्व सबसे प्राचीन संस्कृति और सभी धर्मों का आदिस्रोत है, इसी पर व्यवस्था को भ्रष्ट करने का आक्षेप मढ़ा जाता है | यदि इन दो कुप्रथाओं को हम ढोते रहते हैं तो समाज इतना दुर्बल हो जाएगा कि विभिन्न सम्प्रदायों और फिरकों में बिखरता रहेगा जिससे देश कमजोर होगा और टूटेगा |

अपनी कमजोरी और विकृतियों के बारे में हमने इतिहास से कोई शिक्षा नहीं ली है | आज की तारीख़ में भी कुछ शिक्षित और बुद्धिवादी कहे जाने वाले लोग इन दो कुप्रथाओं का समर्थन करते हैं – यह आश्चर्य की बात है | जन्म से ही ऊँचेपन का भाव इतना हावी है कि वह किसी समझदार को भी पागल बना दे | इस वैचारिक संक्रमण से ग्रस्त कुछ लोग आज हिन्दुत्व के विद्वानों और नेतागणों में भी गिने जा रहे हैं | अनजान बनकर यह लोग इन कुप्रथाओं का समर्थन करने के लिए प्राचीन शास्त्रों का हवाला देते हैं जिस में समाज व्यवस्था देनेवाली प्राचीनतम मनुस्मृति को सबसे अधिक केंद्र बनाया जाता है | वेदों को भी इस कुटिलता में फंसाया गया, जिसका खंडन हम http://agniveer.com/series/caste-series/ में कर चुके हैं |

मनुस्मृति जो सृष्टि में नीति और धर्म ( कानून) का निर्धारण करने वाला सबसे पहला ग्रंथ माना गया है उस को घोर जाति प्रथा को बढ़ावा देने वाला भी बताया जा रहा है |आज स्थिति यह है कि मनुस्मृति वैदिक संस्कृति की सबसे अधिक विवादित पुस्तकों में है | पूरा का पूरा दलित आन्दोलन ‘ मनुवाद ‘ के विरोध पर ही खड़ा हुआ है |

मनु जाति प्रथा के समर्थकों के नायक हैं तो दलित नेताओं ने उन्हें खलनायक के सांचे में ढाल रखा है | पिछड़े तबकों के प्रति प्यार का दिखावा कर स्वार्थ की रोटियां सेकने के लिए ही अग्निवेश और मायावती जैसे बहुत से लोगों द्वारा मनुस्मृति जलाई जाती रही है | अपनी विकृत भावनाओं को पूरा करने के लिए नीची जातियों पर अत्याचार करने वाले, एक सींग वाले विद्वान राक्षस के रूप में भी मनु को चित्रित किया गया है | हिन्दुत्व और वेदों को गालियां देने वाले कथित सुधारवादियों के लिए तो मनुस्मृति एक पसंदीदा साधन बन गया है| विधर्मी वायरस पीढ़ियों से हिन्दुओं के धर्मांतरण में इससे फ़ायदा उठाते आए हैं जो आज भी जारी है | ध्यान देने वाली बात यह है कि मनु की निंदा करने वाले इन लोगों ने मनुस्मृति को कभी गंभीरता से पढ़ा भी है कि नहीं |

दूसरी ओर जातीय घमंड में चूर और उच्चता में अकड़े हुए लोगों के लिए मनुस्मृति एक ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जो उन्हें एक विशिष्ट वर्ग में नहीं जन्में लोगों के प्रति सही व्यवहार नहीं करने का अधिकार और अनुमति देता है| ऐसे लोग मनुस्मृति से कुछ एक गलत और भ्रष्ट श्लोकों का हवाला देकर जातिप्रथा को उचित बताते हैं पर स्वयं की अनुकूलता और स्वार्थ के लिए यह भूलते हैं कि वह जो कह रहे हैं उसे के बिलकुल विपरीत अनेक श्लोक हैं |

इन दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष ने आज भारत में निचले स्तर की राजनीति को जन्म दिया है |भारतवर्ष पर लगातार पिछले हजार वर्षों से होते आ रहे आक्रमणों के लिए भी यही जिम्मेदार है| सदियों तक नरपिशाच,गोहत्यारे और पापियों से यह पावन धरती शासित रही| यह अतार्किक जातिप्रथा ही १९४७ में हमारे देश के बंटवारे का प्रमुख कारण रही है| कभी विश्वगुरु और चक्रवर्ती सम्राटों का यह देश था | आज भी हम में असीम क्षमता और बुद्धि धन है फ़िर भी हम समृद्धि और सामर्थ्य की ओर अपने देश को नहीं ले जा पाए और निर्बल और निराधार खड़े हैं – इस का प्रमुख कारण यह मलिन जाति प्रथा है| इसलिए मनुस्मृति की सही परिपेक्ष्य में जाँच – परख़ अत्यंत आवश्यक हो जाती है |
मनुस्मृति पर लगाये जाने वाले तीन मुख्य आक्षेप :

१. मनु ने जन्म के आधार पर जातिप्रथा का निर्माण किया |

२. मनु ने शूद्रों के लिए कठोर दंड का विधान किया और ऊँची जाति खासकर ब्राह्मणों के लिए विशेष प्रावधान रखे |

३. मनु नारी का विरोधी था और उनका तिरस्कार करता था | उसने स्त्रियों के लिए पुरुषों से कम अधिकार का विधान किया |

आइये अब मनुस्मृति के साक्ष्यों पर ही हम इन आक्षेपों की समीक्षा करें | इस लेख में हम पहले आरोप – मनु द्वारा जन्म आधारित जाति प्रथा के निर्माण पर विचार करेंगे |

पाठकों से निवेदन है कि वे http://agniveer.com/series/caste-series/को पढ़ें ताकि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के सही अर्थों को समझ सकें |
मनुस्मृति और जाति व्यवस्था :

मनुस्मृति उस काल की है जब जन्मना जाति व्यवस्था के विचार का भी कोई अस्तित्व नहीं था | अत: मनुस्मृति जन्मना समाज व्यवस्था का कहीं भी समर्थन नहीं करती | महर्षि मनु ने मनुष्य के गुण- कर्म – स्वभाव पर आधारित समाज व्यवस्था की रचना कर के वेदों में परमात्मा द्वारा दिए गए आदेश का ही पालन किया है (देखें – ऋग्वेद-१०.१०.११-१२, यजुर्वेद-३१.१०-११, अथर्ववेद-१९.६.५-६) |

यह वर्ण व्यवस्था है | वर्ण शब्द “वृञ” धातु से बनता है जिसका मतलब है चयन या चुनना और सामान्यत: प्रयुक्त शब्द वरण भी यही अर्थ रखता है | जैसे वर अर्थात् कन्या द्वारा चुना गया पति, जिससे पता चलता है कि वैदिक व्यवस्था कन्या को अपना पति चुनने का पूर्ण अधिकार देती है |

मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था को ही बताया गया है और जाति व्यवस्था को नहीं इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में कहीं भी जाति या गोत्र शब्द ही नहीं है बल्कि वहां चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है | यदि जाति या गोत्र का इतना ही महत्त्व होता तो मनु इसका उल्लेख अवश्य करते कि कौनसी जाति ब्राह्मणों से संबंधित है, कौनसी क्षत्रियों से, कौनसी वैश्यों और शूद्रों से |

इस का मतलब हुआ कि स्वयं को जन्म से ब्राह्मण या उच्च जाति का मानने वालों के पास इसका कोई प्रमाण नहीं है | ज्यादा से ज्यादा वे इतना बता सकते हैं कि कुछ पीढ़ियों पहले से उनके पूर्वज स्वयं को ऊँची जाति का कहलाते आए हैं | ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि सभ्यता के आरंभ से ही यह लोग ऊँची जाति के थे | जब वह यह साबित नहीं कर सकते तो उनको यह कहने का क्या अधिकार है कि आज जिन्हें जन्मना शूद्र माना जाता है, वह कुछ पीढ़ियों पहले ब्राह्मण नहीं थे ? और स्वयं जो अपने को ऊँची जाति का कहते हैं वे कुछ पीढ़ियों पहले शूद्र नहीं थे ?

मनुस्मृति ३.१०९ में साफ़ कहा है कि अपने गोत्र या कुल की दुहाई देकर भोजन करने वाले को स्वयं का उगलकर खाने वाला माना जाए | अतः मनुस्मृति के अनुसार जो जन्मना ब्राह्मण या ऊँची जाति वाले अपने गोत्र या वंश का हवाला देकर स्वयं को बड़ा कहते हैं और मान-सम्मान की अपेक्षा रखते हैं उन्हें तिरस्कृत किया जाना चाहिए |

मनुस्मृति २. १३६: धनी होना, बांधव होना, आयु में बड़े होना, श्रेष्ठ कर्म का होना और विद्वत्ता यह पाँच सम्मान के उत्तरोत्तर मानदंड हैं | इन में कहीं भी कुल, जाति, गोत्र या वंश को सम्मान का मानदंड नहीं माना गया है |
वर्णों में परिवर्तन :

मनुस्मृति १०.६५: ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है | इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं |

मनुस्मृति ९.३३५: शरीर और मन से शुद्ध- पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्रह्म जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है |

मनुस्मृति के अनेक श्लोक कहते हैं कि उच्च वर्ण का व्यक्ति भी यदि श्रेष्ट कर्म नहीं करता, तो शूद्र (अशिक्षित) बन जाता है |

उदाहरण-

२.१०३: जो मनुष्य नित्य प्रात: और सांय ईश्वर आराधना नहीं करता उसको शूद्र समझना चाहिए |

२.१७२: जब तक व्यक्ति वेदों की शिक्षाओं में दीक्षित नहीं होता वह शूद्र के ही समान है |

४.२४५ : ब्राह्मण- वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ट – अति श्रेष्ट व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच- नीचतर व्यक्तिओं का संग छोड़कर अधिक श्रेष्ट बनता जाता है | इसके विपरीत आचरण से पतित होकर वह शूद्र बन जाता है | अतः स्पष्ट है कि ब्राह्मण उत्तम कर्म करने वाले विद्वान व्यक्ति को कहते हैं और शूद्र का अर्थ अशिक्षित व्यक्ति है | इसका, किसी भी तरह जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है |

२.१६८: जो ब्राह्मण,क्षत्रिय या वैश्य वेदों का अध्ययन और पालन छोड़कर अन्य विषयों में ही परिश्रम करता है, वह शूद्र बन जाता है | और उसकी आने वाली पीढ़ियों को भी वेदों के ज्ञान से वंचित होना पड़ता है | अतः मनुस्मृति के अनुसार तो आज भारत में कुछ अपवादों को छोड़कर बाकी सारे लोग जो भ्रष्टाचार, जातिवाद, स्वार्थ साधना, अन्धविश्वास, विवेकहीनता, लिंग-भेद, चापलूसी, अनैतिकता इत्यादि में लिप्त हैं – वे सभी शूद्र हैं |

२ .१२६: भले ही कोई ब्राह्मण हो, लेकिन अगर वह अभिवादन का शिष्टता से उत्तर देना नहीं जानता तो वह शूद्र (अशिक्षित व्यक्ति) ही है |
शूद्र भी पढ़ा सकते हैं :

शूद्र भले ही अशिक्षित हों तब भी उनसे कौशल और उनका विशेष ज्ञान प्राप्त किया जाना चाहिए |

२.२३८: अपने से न्यून व्यक्ति से भी विद्या को ग्रहण करना चाहिए और नीच कुल में जन्मी उत्तम स्त्री को भी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए|

२.२४१ : आवश्यकता पड़ने पर अ-ब्राह्मण से भी विद्या प्राप्त की जा सकती है और शिष्यों को पढ़ाने के दायित्व का पालन वह गुरु जब तक निर्देश दिया गया हो तब तक करे |
ब्राह्मणत्व का आधार कर्म :

मनु की वर्ण व्यवस्था जन्म से ही कोई वर्ण नहीं मानती | मनुस्मृति के अनुसार माता- पिता को बच्चों के बाल्यकाल में ही उनकी रूचि और प्रवृत्ति को पहचान कर ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण का ज्ञान और प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए भेज देना चाहिए |

कई ब्राह्मण माता – पिता अपने बच्चों को ब्राह्मण ही बनाना चाहते हैं परंतु इस के लिए व्यक्ति में ब्रह्मणोचित गुण, कर्म,स्वभाव का होना अति आवश्यक है| ब्राह्मण वर्ण में जन्म लेने मात्र से या ब्राह्मणत्व का प्रशिक्षण किसी गुरुकुल में प्राप्त कर लेने से ही कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता, जब तक कि उसकी योग्यता, ज्ञान और कर्म ब्रह्मणोचित न हों |

२.१५७ : जैसे लकड़ी से बना हाथी और चमड़े का बनाया हुआ हरिण सिर्फ़ नाम के लिए ही हाथी और हरिण कहे जाते हैं वैसे ही बिना पढ़ा ब्राह्मण मात्र नाम का ही ब्राह्मण होता है |

२.२८: पढने-पढ़ाने से, चिंतन-मनन करने से, ब्रह्मचर्य, अनुशासन, सत्यभाषण आदि व्रतों का पालन करने से, परोपकार आदि सत्कर्म करने से, वेद, विज्ञान आदि पढने से, कर्तव्य का पालन करने से, दान करने से और आदर्शों के प्रति समर्पित रहने से मनुष्य का यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है |
शिक्षा ही वास्तविक जन्म :

मनु के अनुसार मनुष्य का वास्तविक जन्म विद्या प्राप्ति के उपरांत ही होता है | जन्मतः प्रत्येक मनुष्य शूद्र या अशिक्षित है | ज्ञान और संस्कारों से स्वयं को परिष्कृत कर योग्यता हासिल कर लेने पर ही उसका दूसरा जन्म होता है और वह द्विज कहलाता है | शिक्षा प्राप्ति में असमर्थ रहने वाले शूद्र ही रह जाते हैं |

यह पूर्णत: गुणवत्ता पर आधारित व्यवस्था है, इसका शारीरिक जन्म या अनुवांशिकता से कोई लेना-देना नहीं है|

२.१४८ : वेदों में पारंगत आचार्य द्वारा शिष्य को गायत्री मंत्र की दीक्षा देने के उपरांत ही उसका वास्तविक मनुष्य जन्म होता है | यह जन्म मृत्यु और विनाश से रहित होता है |ज्ञानरुपी जन्म में दीक्षित होकर मनुष्य मुक्ति को प्राप्त कर लेता है| यही मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य है| सुशिक्षा के बिना मनुष्य ‘ मनुष्य’ नहीं बनता|

इसलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होने की बात तो छोडो जब तक मनुष्य अच्छी तरह शिक्षित नहीं होगा तब तक उसे मनुष्य भी नहीं माना जाएगा |

२.१४६ : जन्म देने वाले पिता से ज्ञान देने वाला आचार्य रूप पिता ही अधिक बड़ा और माननीय है, आचार्य द्वारा प्रदान किया गया ज्ञान मुक्ति तक साथ देता हैं | पिताद्वारा प्राप्त शरीर तो इस जन्म के साथ ही नष्ट हो जाता है|

२.१४७ : माता- पिता से उत्पन्न संतति का माता के गर्भ से प्राप्त जन्म साधारण जन्म है| वास्तविक जन्म तो शिक्षा पूर्ण कर लेने के उपरांत ही होता है|

अत: अपनी श्रेष्टता साबित करने के लिए कुल का नाम आगे धरना मनु के अनुसार अत्यंत मूर्खतापूर्ण कृत्य है | अपने कुल का नाम आगे रखने की बजाए व्यक्ति यह दिखा दे कि वह कितना शिक्षित है तो बेहतर होगा |

१०.४: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, ये तीन वर्ण विद्याध्ययन से दूसरा जन्म प्राप्त करते हैं | विद्याध्ययन न कर पाने वाला शूद्र, चौथा वर्ण है | इन चार वर्णों के अतिरिक्त आर्यों में या श्रेष्ट मनुष्यों में पांचवा कोई वर्ण नहीं है |

इस का मतलब है कि अगर कोई अपनी शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाया तो वह दुष्ट नहीं हो जाता | उस के कृत्य यदि भले हैं तो वह अच्छा इन्सान कहा जाएगा | और अगर वह शिक्षा भी पूरी कर ले तो वह भी द्विज गिना जाएगा | अत: शूद्र मात्र एक विशेषण है, किसी जाति विशेष का नाम नहीं |
‘नीच’ कुल में जन्में व्यक्ति का तिरस्कार नहीं :

किसी व्यक्ति का जन्म यदि ऐसे कुल में हुआ हो, जो समाज में आर्थिक या अन्य दृष्टी से पनप न पाया हो तो उस व्यक्ति को केवल कुल के कारण पिछड़ना न पड़े और वह अपनी प्रगति से वंचित न रह जाए, इसके लिए भी महर्षि मनु ने नियम निर्धारित किए हैं |

४.१४१: अपंग, अशिक्षित, बड़ी आयु वाले, रूप और धन से रहित या निचले कुल वाले, इन को आदर और / या अधिकार से वंचित न करें | क्योंकि यह किसी व्यक्ति की परख के मापदण्ड नहीं हैं|
प्राचीन इतिहास में वर्ण परिवर्तन के उदाहरण :

ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र वर्ण की सैद्धांतिक अवधारणा गुणों के आधार पर है, जन्म के आधार पर नहीं | यह बात सिर्फ़ कहने के लिए ही नहीं है, प्राचीन समय में इस का व्यवहार में चलन था | जब से इस गुणों पर आधारित वैज्ञानिक व्यवस्था को हमारे दिग्भ्रमित पुरखों ने मूर्खतापूर्ण जन्मना व्यवस्था में बदला है, तब से ही हम पर आफत आ पड़ी है जिस का सामना आज भी कर रहें हैं|

वर्ण परिवर्तन के कुछ उदाहरण -

(a) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की | ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है |

(b) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये |ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)

(c) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |

(d) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४)
अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए?

(e) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३)

(f) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)

(g) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)

(h) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |

(i) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |

(j) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)

(k) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं |

(l) मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |

(m) ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना |

(n) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |

(o) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |

(p) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |

(q) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया |

(r) वत्स शूद्र कुल में उत्पन्न होकर भी ऋषि बने (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९) |

(s) मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोकों से भी पता चलता है कि कुछ क्षत्रिय जातियां, शूद्र बन गईं | वर्ण परिवर्तन की साक्षी देने वाले यह श्लोक मनुस्मृति में बहुत बाद के काल में मिलाए गए हैं | इन परिवर्तित जातियों के नाम हैं – पौण्ड्रक, औड्र, द्रविड, कम्बोज, यवन, शक, पारद, पल्हव, चीन, किरात, दरद, खश |

(t) महाभारत अनुसन्धान पर्व (३५.१७-१८) इसी सूची में कई अन्य नामों को भी शामिल करता है – मेकल, लाट, कान्वशिरा, शौण्डिक, दार्व, चौर, शबर, बर्बर|

(u) आज भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और दलितों में समान गोत्र मिलते हैं | इस से पता चलता है कि यह सब एक ही पूर्वज, एक ही कुल की संतान हैं | लेकिन कालांतर में वर्ण व्यवस्था गड़बड़ा गई और यह लोग अनेक जातियों में बंट गए |
शूद्रों के प्रति आदर :

मनु परम मानवीय थे| वे जानते थे कि सभी शूद्र जानबूझ कर शिक्षा की उपेक्षा नहीं कर सकते | जो किसी भी कारण से जीवन के प्रथम पर्व में ज्ञान और शिक्षा से वंचित रह गया हो, उसे जीवन भर इसकी सज़ा न भुगतनी पड़े इसलिए वे समाज में शूद्रों के लिए उचित सम्मान का विधान करते हैं | उन्होंने शूद्रों के प्रति कभी अपमान सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं किया, बल्कि मनुस्मृति में कई स्थानों पर शूद्रों के लिए अत्यंत सम्मानजनक शब्द आए हैं |

मनु की दृष्टी में ज्ञान और शिक्षा के अभाव में शूद्र समाज का सबसे अबोध घटक है, जो परिस्थितिवश भटक सकता है | अत: वे समाज को उसके प्रति अधिक सहृदयता और सहानुभूति रखने को कहते हैं |

कुछ और उदात्त उदाहरण देखें -

३.११२: शूद्र या वैश्य के अतिथि रूप में आ जाने पर, परिवार उन्हें सम्मान सहित भोजन कराए |

३.११६: अपने सेवकों (शूद्रों) को पहले भोजन कराने के बाद ही दंपत्ति भोजन करें |

२.१३७: धन, बंधू, कुल, आयु, कर्म, श्रेष्ट विद्या से संपन्न व्यक्तियों के होते हुए भी वृद्ध शूद्र को पहले सम्मान दिया जाना चाहिए |
मनुस्मृति वेदों पर आधारित :

वेदों को छोड़कर अन्य कोई ग्रंथ मिलावटों से बचा नहीं है | वेद प्रक्षेपों से कैसे अछूते रहे, जानने के लिए ‘ वेदों में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता ? ‘ पढ़ें | वेद ईश्वरीय ज्ञान है और सभी विद्याएँ उसी से निकली हैं | उन्हीं को आधार मानकर ऋषियों ने अन्य ग्रंथ बनाए| वेदों का स्थान और प्रमाणिकता सबसे ऊपर है और उनके रक्षण से ही आगे भी जगत में नए सृजन संभव हैं | अत: अन्य सभी ग्रंथ स्मृति, ब्राह्मण, महाभारत, रामायण, गीता, उपनिषद, आयुर्वेद, नीतिशास्त्र, दर्शन इत्यादि को परखने की कसौटी वेद ही हैं | और जहां तक वे वेदानुकूल हैं वहीं तक मान्य हैं |

मनु भी वेदों को ही धर्म का मूल मानते हैं (२.८-२.११)

२.८: विद्वान मनुष्य को अपने ज्ञान चक्षुओं से सब कुछ वेदों के अनुसार परखते हुए, कर्तव्य का पालन करना चाहिए |

इस से साफ़ है कि मनु के विचार, उनकी मूल रचना वेदानुकूल ही है और मनुस्मृति में वेद विरुद्ध मिलने वाली मान्यताएं प्रक्षिप्त मानी जानी चाहियें |

शूद्रों को भी वेद पढने और वैदिक संस्कार करने का अधिकार :

वेद में ईश्वर कहता है कि मेरा ज्ञान सबके लिए समान है चाहे पुरुष हो या नारी, ब्राह्मण हो या शूद्र सबको वेद पढने और यज्ञ करने का अधिकार है |

देखें – यजुर्वेद २६.१, ऋग्वेद १०.५३.४, निरुक्त ३.८ इत्यादि और |

और मनुस्मृति भी यही कहती है | मनु ने शूद्रों को उपनयन ( विद्या आरंभ ) से वंचित नहीं रखा है | इसके विपरीत उपनयन से इंकार करने वाला ही शूद्र कहलाता है |

वेदों के ही अनुसार मनु शासकों के लिए विधान करते हैं कि वे शूद्रों का वेतन और भत्ता किसी भी परिस्थिति में न काटें ( ७.१२-१२६, ८.२१६) |
संक्षेप में -

मनु को जन्मना जाति – व्यवस्था का जनक मानना निराधार है | इसके विपरीत मनु मनुष्य की पहचान में जन्म या कुल की सख्त उपेक्षा करते हैं | मनु की वर्ण व्यवस्था पूरी तरह गुणवत्ता पर टिकी हुई है |

प्रत्येक मनुष्य में चारों वर्ण हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र | मनु ने ऐसा प्रयत्न किया है कि प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान जो सबसे सशक्त वर्ण है – जैसे किसी में ब्राह्मणत्व ज्यादा है, किसी में क्षत्रियत्व, इत्यादि का विकास हो और यह विकास पूरे समाज के विकास में सहायक हो |

अगले लेखों में हम मनु पर थोपे गए अन्य आरोप जैसे शूद्रों के लिए कठोर दंड विधान तथा स्त्री विरोधी होने की सच्चाई को जानेंगे |

लेकिन मनु पाखंडी और आचरणहीनों के लिए क्या कहते हैं, यह भी देख लेते हैं -

४.३०: पाखंडी, गलत आचरण वाले, छली – कपटी, धूर्त, दुराग्रही, झूठ बोलने वाले लोगों का सत्कार वाणी मात्र से भी न करना चाहिए |

जन्मना जाति व्यवस्था को मान्य करने की प्रथा एक सभ्य समाज के लिए कलंक है और अत्यंत छल-कपट वाली, विकृत और झूठी व्यवस्था है | वेद और मनु को मानने वालों को इस घिनौनी प्रथा का सशक्त प्रतिकार करना चाहिए | शब्दों में भी उसके प्रति अच्छा भाव रखना मनु के अनुसार घृणित कृत्य है |



प्रश्न : मनुस्मृति से ऐसे सैंकड़ों श्लोक दिए जा सकते हैं, जिन्हें जन्मना जातिवाद और लिंग-भेद के समर्थन में पेश किया जाता है | क्या आप बतायेंगे कि इन सब को कैसे प्रक्षिप्त माना जाए ?

अग्निवीर: यही तो सोचने वाली बात है कि मनुस्मृति में जन्मना जातिवाद के विरोधी और समर्थक दोनों तरह के श्लोक कैसे हैं ? इस का मतलब मनुस्मृति का गहरे से अध्ययन और परीक्षण किए जाने की आवश्यता है | जो हम अगले लेख में करेंगे, अभी संक्षेप में देखते हैं -

आज मिलने वाली मनुस्मृति में बड़ी मात्रा में मनमाने प्रक्षेप पाए जाते हैं, जो बहुत बाद के काल में मिलाए गए | वर्तमान मनुस्मृति लगभग आधी नकली है| सिर्फ़ मनुस्मृति ही प्रक्षिप्त नहीं है | वेदों को छोड़ कर जो अपनी अद्भुत स्वर और पाठ रक्षण पद्धतियों के कारण आज भी अपने मूल स्वरुप में है, लगभग अन्य सभी सम्प्रदायों के ग्रंथों में स्वाभाविकता से परिवर्तन, मिलावट या हटावट की जा सकती है | जिनमें रामायण, महाभारत, बाइबल, कुरान इत्यादि भी शामिल हैं | भविष्य पुराण में तो मिलावट का सिलसिला छपाई के आने तक चलता रहा |

आज रामायण के तीन संस्करण मिलते हैं – १. दाक्षिणात्य २. पश्चिमोत्तरीय ३. गौडीय और यह तीनों ही भिन्न हैं | गीता प्रेस, गोरखपुर ने भी रामायण के कई सर्ग प्रक्षिप्त नाम से चिन्हित किए हैं | कई विद्वान बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड के अधिकांश भाग को प्रक्षिप्त मानते हैं |

महाभारत भी अत्यधिक प्रक्षिप्त हो चुका ग्रंथ है | गरुड़ पुराण ( ब्रह्मकांड १.५४ ) में कहा गया है कि कलियुग के इस समय में धूर्त स्वयं को ब्राह्मण बताकर महाभारत में से कुछ श्लोकों को निकाल रहे हैं और नए श्लोक बना कर डाल रहे हैं |

महाभारत का शांतिपर्व (२६५.९,४) स्वयं कह रहा है कि वैदिक ग्रंथ स्पष्ट रूप से शराब, मछली, मांस का निषेध करते हैं | इन सब को धूर्तों ने प्रचलित कर दिया है, जिन्होंने कपट से ऐसे श्लोक बनाकर शास्त्रों में मिला दिए हैं |

मूल बाइबल जिसे कभी किसी ने देखा हो वह आज अस्तित्व में ही नहीं है | हमने उसके अनुवाद के अनुवाद के अनुवाद ही देखे हैं |

कुरान भी मुहम्मद के उपदेशों की परिवर्तित आवृत्ति ही है, ऐसा कहा जाता है | देखें -http://satyagni.com/3118/miracle-islam/

इसलिए इस में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मनुस्मृति जो सामाजिक व्यवस्थाओं पर सबसे प्राचीन ग्रंथ है उसमें भी अनेक परिवर्तन किए गए हों | यह सम्भावना अधिक इसलिए है कि मनुस्मृति सर्व साधारण के दैनिक जीवन को, पूरे समाज को और राष्ट्र की राजनीति को प्रभावित करने वाला ग्रंथ रहा है | यदि देखा जाए तो सदियों तक वह एक प्रकार से मनुष्य जाति का संविधान ही रहा है | इसलिए धूर्तों और मक्कारों के लिए मनु स्मृति में प्रक्षेप करने के बहुत सारे प्रलोभन थे |

मनुस्मृति का पुनरावलोकन करने पर चार प्रकार के प्रक्षेप दिखायी देते हैं – विस्तार करने के लिए, स्वप्रयोजन की सिद्धी के लिए, अतिश्योक्ति या बढ़ा- चढ़ा कर बताने के लिए, दूषित करने के लिए| अधिकतर प्रक्षेप सीधे- सीधे दिख ही रहें हैं |

डा. सुरेन्द्र कुमार ने मनु स्मृति का विस्तृत और गहन अध्ययन किया है | जिसमें प्रत्येक श्लोक का भिन्न- भिन्न रीतियों से परीक्षण और पृथक्करण किया है ताकि प्रक्षिप्त श्लोकों को अलग से जांचा जा सके | उन्होंने मनुस्मृति के २६८५ में से १४७१ श्लोक प्रक्षिप्त पाए हैं |

प्रक्षेपों का वर्गीकरण वे इस प्रकार करते हैं -

- विषय से बाहर की कोई बात हो |

- संदर्भ से विपरीत हो या विभिन्न हो |

- पहले जो कहा गया, उसके विरुद्ध हो या पूर्वापार सम्बन्ध न हो |

- पुनरावर्तन हो |

- भाषा की विभिन्न शैली और प्रयोग हो |

- वेद विरुद्ध हो |

इसे और अच्छी तरह से समझने के लिए, मनुस्मृति के गहन और निष्पक्ष अध्ययन के लिए डा. सुरेन्द्र कुमार द्वारा लिखित मनुस्मृति (प्रकाशित-आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट,दिल्ली) जो www.vedicbooks.com पर उपलब्ध है, अवश्य पढ़ें |

डा.सुरेन्द्र कुमार ही नहीं बल्कि बहुत से पाश्चात्य विद्वान जैसे मैकडोनल, कीथ, बुलहर इत्यादि भी मनुस्मृति में मिलावट मानते हैं |

डा. अम्बेडकर भी प्राचीन ग्रंथों में मिलावट स्वीकार करते हैं | वे रामायण, महाभारत, गीता, पुराण और वेदों तक में भी प्रक्षेप मानते हैं |

मनुस्मृति के परस्पर विरोधी, असंगत श्लोकों को उन्होंने कई स्थानों पर दिखाया भी है | वे जानते थे कि मनुस्मृति में कहां -कहां प्रक्षेप हैं | लेकिन वे जानबूझ कर इन श्लोकों को प्रक्षिप्त कहने से बचते रहे क्योंकि उन्हें अपना मतलब सिद्ध करना था | उनके इस पक्षपाती व्यवहार ने उन्हें दलितों का नायक जरूर बना दिया | इस तरह मनुविरोध को बढ़ावा देकर उन्होंने अपना और कई लोगों का राजनीतिक हित साधा | उनकी इस मतान्धता ने समाज में विद्वेष का ज़हर ही घोला है और एक सच्चे नायक मनु को सदा के लिए खलनायक बना दिया |

इसी तरह स्वामी अग्निवेश जो अपने आप को आर्यसमाजी बताते हैं, अपनी अनुकूलता के लिए ही यह भूलते हैं कि महर्षि दयानंद ने जो समाज की रचना का सपना देखा था वह महर्षि मनु की वर्ण व्यवस्था के अनुसार ही था | और उन्होंने प्रक्षिप्त हिस्सों को छोड़ कर अपने ग्रंथों में सर्वाधिक प्रमाण (५१४ श्लोक) मनुस्मृति से दिए हैं | स्वामी अग्निवेश ने भी सिर्फ़ राजनीतिक प्रसिद्धि पाने के लिये ही मनुस्मृति का दहन किया |
निष्कर्ष :

मनुस्मृति में बहुत अधिक मात्रा में मिलावट हुई है | परंतु इस मिलावट को आसानी से पहचानकर अलग किया जा सकता है | प्रक्षेपण रहित मूल मनुस्मृति अत्युत्तम कृति है, जिसकी गुण -कर्म- स्वभाव आधारित व्यवस्था मनुष्य और समाज को बहुत ऊँचा उठाने वाली है |

मूल मनुस्मृति वेदों की मान्यताओं पर आधारित है |

आज मनुस्मृति का विरोध उनके द्वारा किया जा रहा है जिन्होंने मनुस्मृति को कभी गंभीरता से पढ़ा नहीं और केवल वोट बैंक की राजनीति के चलते विरोध कर रहे हैं |

सही मनुवाद जन्मना जाति प्रथा को पूरी तरह नकारता है और इसका पक्ष लेने वाले के लिए कठोर दण्ड का विधान करता है | जो लोग बाकी लोगों से सभी मायनों में समान हैं, उनके लिए, सही मनुवाद ” दलित ” शब्द के प्रयोग के ख़िलाफ़ है |



आइए, हम सब जन्म जातिवाद को समूल नष्ट कर, वास्तविक मनुवाद की गुणों पर आधारित कर्मणा वर्ण व्यवस्था को लाकर मानवता और राष्ट्र का रक्षण करें|

महर्षि मनु जाति, जन्म, लिंग, क्षेत्र, मत- सम्प्रदाय, इत्यादि सबसे मुक्त सत्य धर्म का पालन करने के लिए कहते हैं -



८.१७: इस संसार में एक धर्म ही साथ चलता है और सब पदार्थ और साथी शरीर के नाश के साथ ही नाश को प्राप्त होते हैं, सब का साथ छूट जाता है – परंतु धर्म का साथ कभी नहीं छूटता |

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

आर्यों में जाति व्यवस्था


प्रत्येक श्रेष्ठ और सुसभ्य मनुष्य आर्य है |

अपने आचरण, वाणी और कर्म में वैदिक सिद्धांतों का पालन करने वाले, शिष्ट, स्नेही, कभी पाप कार्य न करनेवाले, सत्य की उन्नति और प्रचार करनेवाले, आतंरिक और बाह्य शुचिता इत्यादि गुणों को सदैव धारण करनेवाले आर्य कहलाते हैं |

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र यह चार वर्ण वास्तव में व्यक्ति को नहीं बल्कि गुणों को प्रदर्शित करते हैं. प्रत्येक मनुष्य में ये चारों गुण (बुद्धि, बल, प्रबंधन, और श्रम) सदा रहते हैं. आसानी के लिए जैसे आज पढ़ाने वाले को अध्यापक, रक्षा करने वाले को सैनिक, व्यवसाय करने वाले को व्यवसायी आदि कहते हैं वैसे ही पहले उन्हें क्रमशः ब्रह्मण, क्षत्रिय या वैश्य कहा गया और इनसे अलग अन्य काम करने वालों को शूद्र. अतः यह वर्ण व्यवस्था जन्म- आधारित नहीं है|

आजकल प्रचलित कुलनाम ( surname) लगाने के रिवाज से इन वर्णों का कोई लेना-देना नहीं है | हमारे प्राचीन धर्मग्रन्थ रामायण, महाभारत या अन्य ग्रंथों में भी इस तरह से प्रथम नाम- मध्य नाम- कुलनाम लगाने का कोई चलन नहीं पाया जाता है और न ही आर्य शब्द किसी प्रकार की वंशावली को दर्शाता है|

निस्संदेह, परिवार तथा उसकी पृष्टभूमि का किसी व्यक्ति को संस्कारवान बनाने में महत्वपूर्ण स्थान है परंतु इससे कोई अज्ञात कुल का मनुष्य आर्य नहीं हो सकता यह तात्पर्य नहीं है | हमारे पतन का एक प्रमुख कारण है मिथ्या जन्मना जाति व्यवस्था जिसे हम आज मूर्खता पूर्वक अपनाये बैठे हैं और जिसके चलते हमने अपने समाज के एक बड़े हिस्से को अपने से अलग कर रखा है – उन्हें शूद्र या अछूत का दर्जा देकर – महज इसलिए कि हमें उनका मूल पता नहीं है | यह अत्यंत खेदजनक है |

आर्य शब्द किसी गोत्र से भी सरोकार नहीं रखता | गोत्र का वर्गीकरण नजदीकी संबंधों में विवाह से बचने के लिए किया गया था | प्रचलित कुलनामों का शायद ही किसी गोत्र से सम्बन्ध भी हो |

आर्य शब्द श्रेष्टता का द्योतक है | और किसी की श्रेष्ठता को जांचने में पारिवारिक पृष्ठभूमि कोई मापदंड हो ही नहीं सकता क्योंकि किसी चिकित्सक का बेटा केवल इसी लिए चिकित्सक नहीं कहलाया जा सकता क्योंकि उसका पिता चिकित्सक है, वहीँ दूसरी ओर कोई अनाथ बच्चा भी यदि पढ़ जाए तो चिकित्सक हो सकता है. ठीक इसी तरह किसी का यह कहना कि शूद्र ब्राह्मण नहीं बन सकता – सर्वथा गलत है |

ब्राह्मण का अर्थ है ज्ञान संपन्न व्यक्ति और जो शिक्षा या प्रशिक्षण के अभाव में ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बनाने की योग्यता न रखता हो – वह शूद्र है | परंतु शूद्र भी अपने प्रयत्न से ज्ञान और प्रशिक्षण प्राप्त करके वर्ण बदल सकता है | ब्राह्मण वर्ण को भी प्राप्त कर सकता है |

द्विज – अर्थात् जिसने दो बार जन्म लिया हो | जन्म से तो सभी शूद्र समझे गए हैं | ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्णों को द्विज कहते हैं क्योंकि विद्या प्राप्ति के उपरांत योग्यता हासिल करके वे समाज के कल्याण में सहयोग प्रदान करते हैं | इस तरह से इनका दूसरा जन्म ‘ विद्या जन्म’ होता है | केवल माता-पिता से जन्म प्राप्त करनेवाले और विद्याप्राप्ति में असफ़ल व्यक्ति इस दूसरे जन्म ‘ विद्या जन्म ‘ से वंचित रह जाते हैं – वे शूद्र हैं |

अतः यदि ब्राह्मण पुत्र भी अशिक्षित है तो वह शूद्र है और शूद्र भी अपने निश्चय से ज्ञान, विद्या और संस्कार प्राप्त करके ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बन सकता है | इस में माता- पिता द्वारा प्राप्त जन्म का कोई संबंध नहीं है |



आइए, हम सब सत्य ग्राही बनें, मिथ्या जातिवाद की जकड़ से मुक्त होकर एकात्म और सशक्त समाज तथा राष्ट्र का निर्माण करें |

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक 2011

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद' का प्रस्तावित हिन्दू विरोधी काला कानून श्रीमती सोनिया गाँधी की अध्यक्षता में बनाई गई "राष्ट्रीय सलाहकार समिति" द्वारा तैयार किया गया प्रस्तावित "सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011" यदि संसद द्वारा पारित कर दिया गया तो मुसलिम, ईसाई आदि अल्पसंख्यक समूहों को हिन्दुओं के प्रति घृणा फ़ैलाने, हिन्दुओं को प्रताड़ित करने और हिन्दू महिलाओं से बलात्कार करने के लिए प्रोत्साहन मिल जाएगा. इस प्रस्तावित कानून का मंतव्य ये है कि यदि बहुसंख्यक वर्ग अर्थात हिन्दू किसी अल्पसंख्यक समूह के प्रति घृणा फैलाये या हिंसा करे या यौन उत्पीड़न करे तो हिन्दुओं को दण्डित करने का प्रावधान है. किन्तु मुसलिम, ईसाई आदि अल्पसंख्यक समूहों द्वारा हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाई जाए या हिंसा की जाँच की जाए या बलात्कार आदि यौन शोषण किया जाए तो उन अल्पसंख्यकों को किसी प्रकार का दंड देने का कोई प्रावधान नहीं है. यदि कोई अल्पसंख्यक उपरोक्त अपराधों के लिए किसी बहुसंख्यक व्यक्ति या संगठन के विरुद्ध शिकायत करता है तो उसकी जांच किए बिना ही उस व्यक्ति एवं संगठन को अपराधी मानकर उसका संज्ञान लिया जाएगा. इस अपराध की असत्यता सिद्ध करना अपराधी का दायित्व होगा. शिकायत करता की पहचान गुप्त रखी जाएगी. इस विधेयक में 'समूह' की परिभाषा में केवल धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक वर्ग ही है, बहुसंख्यक वर्ग के लिए समूह शब्द का प्रयोग नहीं है और केवल समूह के विरुद्ध घृणा, हिंसा आदि किया गया अपराध ही अपराध माना जाएगा. विधेयक में ये मान लिए गया है कि सांप्रदायिक हिंसा केवल बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा ही पैदा की जाती है और अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य कभी ऐसा कर ही नहीं सकते. अतः बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के खिलाफ किए गये सांप्रदायिक अपराध तो दंडनीय हैं परन्तु अल्पसंख्यक समूहों द्वारा बहुसंख्याकों के खिलाफ किए गये ऐसे अपराध कतई दंडनीय नहीं माने गये हैं. अतः अल्पसंख्यक समुदय का कोई भी सदस्य इस कानून के तहत बहुसंख्यक समुदाय के विरुद्ध किए गये किसी अपराध के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, केवल बहुसंख्यक समुदाय का सदस्य ही ऐसे अपराध कर सकता है और इसीलिए इस कानून का मंतव्य यह है कि केवल बहुसंख्यक समुद्र का सदस्य ही ऐसे अपराध कर सकते हैं, अतः उन्हें ही दोषी मानकर दंडित किया जाना चाहिए. किसी अल्पसंख्यक ने रोजगार या किराये पर घर मांग लिया तो बिना योग्यता या अनुकूलता का विचार किए आप यदि हा नहीं कहेंगे तो आप अपराधी होंगे. पुलिस व प्रशासन अल्पसंख्यकों का कवच बन जाएगी. कहीं भी अल्पसंख्यकों के विरुद्ध उपरोक्त कोई भी अपराध होता है तो प्रशासन की भी समान जिम्मेदारी होगी. इस प्रकार प्रशासन अपने को बचाने के लिए निर्दोष हिन्दुओं को प्रताड़ित करेगा परन्तु यदि हिन्दुओं के प्रति उपरोक्त अपराध होता है तो प्रशासन को परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी. इस विधेयक के अनुसार एक सात सदस्यीय राष्ट्रीय प्राधिकरण बनेगा जिसमें कम से कम चार (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सहित) सदस्य 'समूह' अर्थात अल्पसंख्यक समुदाय के होंगे जिससे यह निश्चित है कि बहुसंख्यक समुद्र के सदस्य अल्पमत होंगे. इस विधेयक में धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव क्यों किया गया ? अपराध तो अपराध है चाहे वह किसी भी वर्ग के व्यक्ति ने किया है. सांप्रदायिक अपराध बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नहीं होते. वास्तव में ये विधेयक इस्लामिक राज्य स्थापित करने की और एक खतरनाक कदम है. भारत में वरन सम्पूर्ण विश्व में किसी देश के मूल निवासियों के लिए इस प्रकार का काला कानून शायद ही कभी किसी ने देखा होगा. यदि ये विधेयक पास हो जाता है तो भारत REPUBLIC OF ISLAMIC INDIA हो जायेगा. ऐसे विधेयक की क्या आवश्यकता है जो धर्म व जाति के आधार पर भेदभाव करके संविधान के पंथ निरपेक्ष स्वरुप को और राष्ट्र की एकता और अखंडता को खतरे में डालकर आतंकवादियों व अलगाववादियों का क़ानूनी हथियार बन जाए. इस विधेयक को तैयार करने वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सोनिया जी ने चुने हुए ऐसे लोग लिए हैं जिनका हिंदुत्व विरोधी भाव सर्वज्ञात है. इस परिषद को विधेयक तैयार करने का अधिकार किसने दिया जब इस परिषद की संविधान व कानून में कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में इसकी वैधानिकता क्या है ? श्रीमती सोनिया गाँधी कांग्रेस से बड़ी हो सकती हैं परन्तु संविधान व देश से बड़ी नहीं. PREVENTION OF COMMUNAL AND TARGETED VIOLENCE (ACCESS TO JUSTICE AND REPRATION) BILL, 2011 सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक, 2011 यूपीए सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय सलाहकार समिति (http://nac.nic.in/) ने इस महीने सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011 को चर्चा और सुझावों के लिए आम जनता के सामने रखा था. ये विधेयक यूपीए सरकार द्वारा 2005 में बनाया गया था. तब से लेकर अब तक इसके मसौदे में काफी बदलाव आ चुका है. विधेयक द्वारा बेशक कुछ अच्छा होने की बात कही जा रही हो लेकिन इसके पीछे की मंशा एक समुदाय विशेष को खुश करना है जिसका इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में किया जा सके और एक धर्म विशेष के लोगों को प्रताड़ित करना है. इस विधेयक के पास होने के बाद अर्थात कानून बनाने के बाद बहुसंख्यकों अर्थात हिन्दुओं को सिर्फ इसलिए सजा मिलेगी क्योंकि वो बहुसंख्यक हैं यानि हिन्दू हैं. विधेयक में यह स्पष्ट कहा गया है कि हिंसा, बलात्कार या घृणा सम्बन्धी प्रचार तभी अपराध मना जाएगा जब वो अल्पसंख्यकों के साथ किया गया हो. यदि किसी अल्पसंख्यक लड़की या महिला के साथ कुछ गलत किया जाता है तो वो अपराध होगा लेकिन यदि वैसे ही किसी बहुसंख्यक महिला के साथ किया जाता है तो वो कतई अपराध नहीं है. वहां पर विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है. हिंसा और घृणा का प्रचार के मामले में भी इसी तरह अपराधी निर्धारित किया जाएगा. इस प्रकार लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना पर चोट करके ये विधेयक बनाया गया है. संविधान में जगह-जगह समानता की बात की गई है लेकिन इस विधेयक का तो आधार असमानता है. विधेयक में धर्म और भासाही आधार पर असमानता को तरजीह दी गई है. विधेयक में दिए गये सभी प्रावधान साफ़-साफ़ एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की ओर इशारा करते हैं. विधेयक में ये बात स्पष्ट तौर पर मान ली गई है कि केवल बहुसंख्यक वर्ग द्वारा ही हिंसा फैलाई जा सकती है/ अल्पसंख्यक तो हिंसा कर ही नहीं सकते और सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अल्पसंख्यक हैं. विधेयक में ये भी प्रावधान किया गया है कि सांप्रदायिक हिंसा के दौरान पूरी सरकारी मशीनरी अल्पसंख्यकों की खिदमत में लग जाए और बहुसंख्यकों वर्ग के अधिक से अधिक लोगों को दंड दिलाने का प्रयास करे. अतः अगर कहीं दंगा होता है तो पुलिस या अन्य सरकारी मशीनरी इस बात की जाँच नहीं करेगी कि दंगा किसने किया या उसके कारण क्या थे बल्कि उनका काम ये देखना होगा कि दंगे में बहुसंख्यक लोग कौन-कौन शामिल थे. सांप्रदायिक हिंसा के दौरान बेशक पीड़ित बहुसंख्यक समाज हो लेकिन विधेयक केवल अल्पसंख्यकों को ही पीड़ित होने का प्रमाण पत्र प्रदान करता है, अतः बहुसंख्यक यानि हिन्दू पीड़ित हो ही नहीं सकते. इस प्रकार विधेयक एक वर्ग को ही हमेशा पीड़ित होने की गारंटी प्रदान करता है चाहे 50 अल्पसंख्यकों ने मिलकर 5 बहुसंख्यकों को मारा हो. विधेयक में सजा देने का जो प्रावधान किया गया है वो भी आश्चर्यजनक है और न्याय की मूल धरना के विपरीत है. सजा देने के लिए जो प्रक्रिया अपने जाएगी उसमें धारा 161 के तहत बायां रिकॉर्ड करने की बजाय 164 के तहत बायां दर्ज किए जायेंगे अर्थात सीधे अदालत के सामने बयान होंगे. साथ ही यदि किसी व्यक्ति पर घृणा के प्रचार सम्बन्धी आरोप लगाया जाता है तो उसे तब तक दोषी मना जाएगा जब तक कि वो निर्दोष सिद्ध नहीं हो जाता. जबकि न्याय के अनुसार कोई व्यक्ति तब तक दोषी या अपराधी नहीं मना जाता जब तक कि उस पर दोष सिद्ध न हो जाए. इस मामले में आरोप ही सबूत का काम करेगा यानि यदि किसी अल्पसंख्यक ने किसी बहुसंख्यक पर आरोप मात्रा भी लगा दिया तो वो दोषी मान लिया जाएगा. विधेयक के द्वारा सकरी मशीनरी, पुलिस, सशस्त्र बल लोकसेवकों आदि को भी एक वर्ग विशेष के हित में कार्य करने का दबाव बनाया जा सकता है या एक वर्ग विशेष द्वारा उनके ब्लैकमेलिंग की पूरी-पूरी सम्भावना बनी रहेगी. विधेयक के खंड 12 के अनुसार कोई सरकारी कर्मचारी यदि किसी समूह विशेष के व्यक्ति को पीड़ा पहुंचता है या मानसिक अथवा शारीरिक चोट पहुंचता है तो उसे यातना दिए जाने के अपराध में दण्डित किया जा सकता है. खंड 13 के अनुसार कोई सरकारी व्यक्ति इस विधेयक में उल्लिखित अपराधों के सम्बन्ध में अपनी ड्यूटी निभाने में ढिलाई बरतता है तो वो दंड का भागी होगा. खंड 14 में उन सरकारी व्यक्तियों को दंड का प्रावधान है जो सशस्त्र बालों पर नियंत्रण रखते हैं और अपनी कमान के लोगों पर कारगर ढंग से अपनी ड्यूटी निभाने हेतु नियंत्रण रखने में असफल रहते हैं. इसी प्रकार इस विधेयक के द्वारा लोकसेवकों पर बिना किसी सरकारी अनुमति के मुकदमा चलाया जा सकता है. ऐसे में स्पष्ट है कि लोकसेवक पर एक वर्ग विशेष के हित में कार्य करने के लिए व्यापक दबाव रहेगा. विधेयक में सांप्रदायिक सौहार्द , न्याय और क्षतिपूर्ति के लिए एक राष्ट्रीय प्राधिकरण गठित किया जाएगा. इस सात सदस्यीय प्राधिकरण में भी धर्म और भाषाई आधार पर जमकर भेदभाव किया जाएगा. 7 सदस्यों में से कम से कम 4 सदस्य , जिसमें दो वरिष्ठतम पद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी शामिल हैं, अल्पसंख्यक होने चाहिए. राज्यों पर भी इसी आधार पर राज्य प्राधिकरण गठित किया जाएगा. सरकारों को इस प्राधिकरण को पुलिस और अन्य दूसरी जांच एजेंसियों उपलब्ध करानी होंगी. प्राधिकरण के पास किसी शिकायत की जाँच करने, किसी ईमारत में घुसने, छापा मारने, खोजबीन करने का अधिकार होगा. प्राधिकरण सशस्त्र बालों पर भी नियंत्रण रख सकेगा और केंद्र एवं राज्य सरकारों को परामर्श जारी कर सकेगा. अतः कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की सुपर कैबिनेट ने एक ऐसा बिल तैयार किया है जिसके बाद बहुसंख्यक यानि हिन्दू अपांग हो जायेंगे. पुलिस , सशस्त्र बल आदि पंगु हो जायेंगे. अपराधी और पीड़ित किसी दंगे से पहले ही घोषित हो जाएगा. इस विधेयक को पूरा पढने के लिए इस लिंक पर (http://nac.nic.in/pdf/pctvb_amended.pdf) क्लिक करें. राष्ट्रीय सलाहकार समिति की वेबसाइट (http://nac.nic.in/) पर भी इस विधेयक को देखा जा सकता है.

रविवार, 9 दिसंबर 2012

चार वेद -चार वाक्य


लेखक- पं. देवनारायण भारद्वाज
ब्रह्म की विद्या 'ब्रह्म' अर्थात्‌ वेद ही है। चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद इनमें चार विषय क्रमशह्न ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विज्ञान हैं। यहां एक-एक वेद से एक-एक वाक्य प्रस्तुत किया जा रहा है-
1. मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्‌ (ऋग्वेद 10.53.6)-ऋग्वेद तृण से लेकर परमब्रह्म तक का ज्ञान कराता है। उसके ज्ञान का मूलभूत सारतत्व यही है कि हे मनुष्य तू स्वयं सच्च मनुष्य बन तथा दिव्य गुणयुक्त सन्तानों को जन्म दे अर्थात्‌ सुयोम्य मानवों के निर्माण में सतत प्रयत्नशील रह। मनुष्य, मनुष्य तभी बन सकता है, जब उसमें पशुताओं का प्रवेश न हो। आकार, रूप, रंग से कोई प्राणी मनुष्य दिखाई देता है, किन्तु उसके अन्दर भेड़िया, श्वान, उल्लू गृद्ध आदि आकर अपना डेरा जमा लेते हैं। ऋग्वेद हमें वह सब ज्ञान प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति एक प्रबुद्ध मानव रहता है, वह न पशु और न दानव बनने पाता है।
2. आयुर्यज्ञेन कल्पताम्‌ (यजुर्वेद 18.29)- तांबे का कोई भी तार प्रकाश नहीं कर सकता है, किन्तु जब उसमें विद्युत का प्रवाह होने लगता है तो उससे प्रकाश, गति, उर्जा ओर ध्वनि सभी प्राप्त होने लगते हैं। देखने में तार पहले जैसा ही लगता है। इसी प्रकार देखने में सभी मनुष्य एक से लगते हैं, किन्तु जिनमें यज्ञरूपी विद्युत का प्रवाह हो जाता है, वही दिव्य हो जाते हैं। पंच महायज्ञ की बात तो पृथक ही है। सामान्यतया यज्ञ से तीन कर्मों का बोध प्राप्त होता है-देवपूजा, संगतिकरण और दान। सभी सच्च्े जड़-चेतन देवताओं के प्रति पूजा-भाव रखते हुए समाज में समन्वय-संगति बनाये रखने के लिए सर्वसुलभ संपदाओं को सुविधानुसार दान करना और कराना, यही सब कार्य यज्ञ कहलाते हैं। यही कर्म मनुष्य को महामानव बना देते हैं। आहार, निद्रा, भय व मैथुन तो हर पशु तथा मानव की आवश्यकता है। पशु केवल इन्हीं के लिए जीता है। किन्तु मनुष्य इनसे ऊपर उठता है। इनको भी धर्म के कर्म अर्थात्‌ यज्ञ का रूप प्रदान करता हुआ जीता भी है और बलिदान भी हो जाता है। अगर हमने किसी को प्रेम नहीं दिया, किसी की सेवा नहीं की, किसी की पीठ नहीं थपथपाई, किसी को सहारा नहीं दिया, किसी को सान्त्वना नहीं दी, तो हमारा जीवन व्यर्थ है, निरर्थक है, एक व्यथा है। अयोग्य हैं हम। केवल अपने लिए जी रहे हैं, यह तो पशु का जीवन है। यही पशु प्रवृत्ति है कि केवल अपना ही ध्यान रखे । वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
3. सदावृधः सखा (सामवेद 169-682) - इस यज्ञ भावना, कामना एवं कर्मणा को हम सामवेद के इस उपासना परक मन्त्र से प्राप्त कर सकते हैं। हम सदैव उन व्यक्तियों को अपना मित्र बनायें, जो अपने क्षेत्र में बढे हुए हैं, वृद्ध हैं। उनकी सदसंगति से, उनके वचन व उनके अनुकरण से पढे-बेपढे सभी को सद्ज्ञान-सद्कर्म की प्रेरणा प्राप्त होती रहेगी। उनके समीप बने रहने से मानव में यज्ञ की विद्युत का प्रवाह संचार करता रहेगा, जो इस लोक में तो उपयोगी होगा ही, परलोक में भी 'सदावृधः' जो आदि से ही सर्व वृद्धिपूर्ण परमब्रह्‌मा है, उसका भी सखा बना देगा, समान ख्याति का अधिकारी बना देगा। बड़ों की समीपता व उनका सम्मान सदैव आयु, विद्या, यश एवं बल का स्त्रोत होता है। इससे कोई वंचित न हो, अपितु सब सिंचित हों। यही वेद का मधुर सामगान है।
4. माता भूमि पुत्रोहम्‌ पृथिव्याः (अथर्ववेद 12.1.12)- ज्ञान, कर्म, उपासना इन अवयवों के समन्वित रूप से निर्मित रसायन ही अथर्ववेद का विज्ञान है। पश्चिम प्रभावित विज्ञान अपने आविष्कारों से अति विचित्र यन्त्र-उपकरणों का निर्माण कर सकता है। कम्प्यूटर, दूरदर्शन,दूरभाष, इण्टरनेट और न जाने क्या क्या। इन सबसे भौतिक सुख समृद्धि का विस्तार तो होता दिखाई देता है, किन्तु आन्तरिक शान्ति तिरोहित हो जाती है। आविष्कार तो अत्यन्त विस्यमकारक अदभुत लगते हैं, किन्तु इन सबका प्रारम्भ प्रीतिकर, किन्तु परिणाम प्राणहर सिद्ध होता है। आधुनिक भोगवादी विज्ञान के चमत्कार चीत्कार में नित्य परिणत होते देखे जाते हैं। इनमें सर्वाधिक स्थूल पृथ्वी है, जो सम्पूर्ण प्रकृति का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है। वेद के अनुसार यह हमारी सृजन-पालन व आधार देने वाली माता है, साथ ही हम इसके पुत्र हैं। इसके साथ हमारा व्यवहार माता-पुत्र की भांति होना चाहिए। माता यदि जन्म देकर सन्तान का पालन पोषण करती है, तो सन्तान भी माता का सम्मान और उसकी सेवा में अपने जीवन की बाजी लगाने को प्रस्तुत रहती है। आज की भांति सागर, धरातल, पर्वत, आकाश में पाये जाने वाले पदार्थ यथा रत्न, राशि, जल, वृक्ष-वनस्पति, पत्थर, वायु सभी का भरपूर दोहन करना ही मानव का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। दोहन भी ऐसा कि इन प्राकृतिक पदार्थों का समूल विनाश होता चला जाये तथा पर्यावरण भयंकर रूप से प्रदूषित हो जाए प्रतिदिन सोने का एक अण्डा देने वाली मुर्गी से सन्तुष्ट न होकर एक बार में ही मुर्गी के पेट को फाड़कर सोने के सारे अण्डे एक साथ निकालने वालों को सोना तो मिलता ही नहीं, मुर्गी से भी हाथ धोना पड़ता है।
भूमि की भांति मानव की अन्य मातायें भी हैं। उनमें से एक माता गाय भी है। उसके पोषणकारी स्वर्णिम दुग्ध से जब जी न भरा तो मानव ने उसके मांस को ही खाना प्रारम्भ कर दिया। कृत्रिम विषैले दूध से मानव सन्तान इधर रोग ग्रस्त होती है, उधर हजारों वधशालाओं में गौओं की हत्या करके गोमांस को भारत से निर्यात किया जाता है। दैनिक जागरण (23.07.2000) के अनुसार दिल्ली के भोजन गृहों में गोमांस परोसे जाने के विरोध में जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन किया गया, वह भी मुस्लिम समुदाय के जागरूक व्यक्तियों के द्वारा। अमर उजाला दिनांक (24.07.2000) के अनुसार अमेरिका में शेर के मांस को परोसे जाने पर लोगों द्वारा आपत्ति की गई। यह तो समझ में आता है कि गाय को अंगूर, अन्न, मेवा खिलाकर अधिक गुणवत्ता पूर्ण दुग्ध प्राप्त किया जाए, किन्तु यह समझ में नहीं आता है कि शाकाहारी पशु गाय के अधिक मांस को प्राप्त करने के लिए उसे धोखे से चारे में मांस मिला कर खिला दिया जाये। इस अस्वाभाविक क्रियाकलाप से जब 'मैडकाव' बीमारी से मनुष्य प्रभावित हुए, तो बड़ी संख्या में उन गायों को मार कर अपनी जान बचायी। इतना भोगते हुए भी वनस्पतियों की स्वाभाविक प्रोटीन से अतृप्त मानव इनके जनन गुण सूत्र (जीन्स) में जन्तुओं की प्रोटीन प्रविष्ट करके न जाने और कौन सी असाध्य व्याधि बुलाना चाहता है। यह है कभी न पूरी होने वाली मनुष्य की हत्यारी हवश !
अथर्ववेद इस हवश पर नियन्त्रण करके 'वरदा वेदमाता' के ऐसे विज्ञान की प्रेरणा देता है, जिससे मानव को जीते जी आयु, प्राणश्क्ति, प्रजा, पशु, कीर्ति एवं ब्रह्मवर्चस्व तो मिलें ही, मरने के बाद ब्रह्मलोक का दिव्य आनन्द भी मिले। ऋग्वेद के ज्ञान के पदों से धर्म का बोध होता है। यजुर्वेद के कर्म सृजित अर्थ से मिलकर पद से पदार्थ बन जाते हैं। सामवेद की सात्विक कामनाओं से यह पदार्थ जगहितार्थ समर्पित हो जाते हैं। यही समर्पण अथर्ववेद के विज्ञान द्वारा मानव को मोक्ष की ओर अग्रसर कर देता है। इस प्रकार मानव ''धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष'' रूपी पुरूषार्थ चतुष्टय के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विज्ञान-चार वेदों के ये प्रधान चार विषय हैं, किन्तु सामान्य रूप से चारों वेदों के प्रत्येक मन्त्र में इन विषयों का अनुपम सामंजस्य रहता है। बिना किसी भेदभाव के मनुष्य मात्र स्वसामर्थ्यानुसार ''वेद का पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना'' परमधर्म का अनुगमन कर अपने जीवन को देदीप्यमान कर सकता है तथा वेद की 'मनुर्भव' भावना का जीवन्त स्वरूप बन सकता है।

नारियों की चाल-ढाल



नारियों की चाल-ढाल
स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती
ओ3म्‌ अधः पश्यस्व मोपरि सन्तरां पादकौ हर।
मा ते कशप्लकौ दृशन्‌ स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ।। (ऋग्वेद 8.33.19)
शब्दार्थ- हे नारि! (अधः पश्यस्व) नीचे देख (मा उपरि) ऊपर मत देख। (पादकौ सन्तरां हर) दोनों पैरों को ठीक प्रकार से एकत्र करके रख। (ते कशप्लकौ) तेरे कशप्लक अर्थात्‌ दोनों स्तन, पीठ और पेट, नितम्ब, दोनों जांघें और दोनों पिण्डलियॉं (मा दृशन्‌) दिखाई न दें। यह सब कुछ किसलिए? (हि) क्योंकि (स्त्री) स्त्री (ब्रह्मा) ब्रह्मा, निर्माणकर्त्री (बभूविथ) हुई है।
भावार्थ- मन्त्र में नारी के शील का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया गया है। प्रत्येक स्त्री को इन गुणों को अपने जीवन में धारण करना चाहिए।
1. स्त्रियों को अपनी दृष्टि सदा नीचे रखनी चाहिए, ऊपर नहीं। नीचे दृष्टि रखना लज्जा और शालीनता का चिह्न है। ऊपर देखना निर्लज्जता और अशालीनता का द्योतक है।
2. स्त्रियों को चलते समय दोनों पैरों को मिलाकर बड़ी सावधानी से चलना चाहिए। इठलाते हुए, मटकते हुए, हाव-भाव का प्रदर्शन करते हुए, चंचलता और चपलता से नहीं चलना चाहिए।
3. नारियों को वस्त्र इस प्रकार धारण करने चाहिएं कि उनके स्तन, पेट, पीठ, जंघाएँ, पिण्डलियॉं आदि दिखाई न दें। अपने अंगों का प्रदर्शन करना विलासिता और लम्पटता का द्योतक है।
4. नारी के लिए इतना बन्धन क्यों? ऐसी कठोर साधना किसलिए? इसलिए कि नारी ब्रह्मा है, वह जीवन निर्मात्री और सृजनकर्त्री है। यदि नारी ही बिगड़ गई तो सृष्टि भी बिगड़ जाएगी।

चार वेद -चार वाक्य


लेखक- पं. देवनारायण भारद्वाज
ब्रह्म की विद्या 'ब्रह्म' अर्थात्‌ वेद ही है। चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद इनमें चार विषय क्रमशह्न ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विज्ञान हैं। यहां एक-एक वेद से एक-एक वाक्य प्रस्तुत किया जा रहा है-
1. मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्‌ (ऋग्वेद 10.53.6)-ऋग्वेद तृण से लेकर परमब्रह्म तक का ज्ञान कराता है। उसके ज्ञान का मूलभूत सारतत्व यही है कि हे मनुष्य तू स्वयं सच्च मनुष्य बन तथा दिव्य गुणयुक्त सन्तानों को जन्म दे अर्थात्‌ सुयोम्य मानवों के निर्माण में सतत प्रयत्नशील रह। मनुष्य, मनुष्य तभी बन सकता है, जब उसमें पशुताओं का प्रवेश न हो। आकार, रूप, रंग से कोई प्राणी मनुष्य दिखाई देता है, किन्तु उसके अन्दर भेड़िया, श्वान, उल्लू गृद्ध आदि आकर अपना डेरा जमा लेते हैं। ऋग्वेद हमें वह सब ज्ञान प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति एक प्रबुद्ध मानव रहता है, वह न पशु और न दानव बनने पाता है।
2. आयुर्यज्ञेन कल्पताम्‌ (यजुर्वेद 18.29)- तांबे का कोई भी तार प्रकाश नहीं कर सकता है, किन्तु जब उसमें विद्युत का प्रवाह होने लगता है तो उससे प्रकाश, गति, उर्जा ओर ध्वनि सभी प्राप्त होने लगते हैं। देखने में तार पहले जैसा ही लगता है। इसी प्रकार देखने में सभी मनुष्य एक से लगते हैं, किन्तु जिनमें यज्ञरूपी विद्युत का प्रवाह हो जाता है, वही दिव्य हो जाते हैं। पंच महायज्ञ की बात तो पृथक ही है। सामान्यतया यज्ञ से तीन कर्मों का बोध प्राप्त होता है-देवपूजा, संगतिकरण और दान। सभी सच्च्े जड़-चेतन देवताओं के प्रति पूजा-भाव रखते हुए समाज में समन्वय-संगति बनाये रखने के लिए सर्वसुलभ संपदाओं को सुविधानुसार दान करना और कराना, यही सब कार्य यज्ञ कहलाते हैं। यही कर्म मनुष्य को महामानव बना देते हैं। आहार, निद्रा, भय व मैथुन तो हर पशु तथा मानव की आवश्यकता है। पशु केवल इन्हीं के लिए जीता है। किन्तु मनुष्य इनसे ऊपर उठता है। इनको भी धर्म के कर्म अर्थात्‌ यज्ञ का रूप प्रदान करता हुआ जीता भी है और बलिदान भी हो जाता है। अगर हमने किसी को प्रेम नहीं दिया, किसी की सेवा नहीं की, किसी की पीठ नहीं थपथपाई, किसी को सहारा नहीं दिया, किसी को सान्त्वना नहीं दी, तो हमारा जीवन व्यर्थ है, निरर्थक है, एक व्यथा है। अयोग्य हैं हम। केवल अपने लिए जी रहे हैं, यह तो पशु का जीवन है। यही पशु प्रवृत्ति है कि केवल अपना ही ध्यान रखे । वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
3. सदावृधः सखा (सामवेद 169-682) - इस यज्ञ भावना, कामना एवं कर्मणा को हम सामवेद के इस उपासना परक मन्त्र से प्राप्त कर सकते हैं। हम सदैव उन व्यक्तियों को अपना मित्र बनायें, जो अपने क्षेत्र में बढे हुए हैं, वृद्ध हैं। उनकी सदसंगति से, उनके वचन व उनके अनुकरण से पढे-बेपढे सभी को सद्ज्ञान-सद्कर्म की प्रेरणा प्राप्त होती रहेगी। उनके समीप बने रहने से मानव में यज्ञ की विद्युत का प्रवाह संचार करता रहेगा, जो इस लोक में तो उपयोगी होगा ही, परलोक में भी 'सदावृधः' जो आदि से ही सर्व वृद्धिपूर्ण परमब्रह्‌मा है, उसका भी सखा बना देगा, समान ख्याति का अधिकारी बना देगा। बड़ों की समीपता व उनका सम्मान सदैव आयु, विद्या, यश एवं बल का स्त्रोत होता है। इससे कोई वंचित न हो, अपितु सब सिंचित हों। यही वेद का मधुर सामगान है।
4. माता भूमि पुत्रोहम्‌ पृथिव्याः (अथर्ववेद 12.1.12)- ज्ञान, कर्म, उपासना इन अवयवों के समन्वित रूप से निर्मित रसायन ही अथर्ववेद का विज्ञान है। पश्चिम प्रभावित विज्ञान अपने आविष्कारों से अति विचित्र यन्त्र-उपकरणों का निर्माण कर सकता है। कम्प्यूटर, दूरदर्शन,दूरभाष, इण्टरनेट और न जाने क्या क्या। इन सबसे भौतिक सुख समृद्धि का विस्तार तो होता दिखाई देता है, किन्तु आन्तरिक शान्ति तिरोहित हो जाती है। आविष्कार तो अत्यन्त विस्यमकारक अदभुत लगते हैं, किन्तु इन सबका प्रारम्भ प्रीतिकर, किन्तु परिणाम प्राणहर सिद्ध होता है। आधुनिक भोगवादी विज्ञान के चमत्कार चीत्कार में नित्य परिणत होते देखे जाते हैं। इनमें सर्वाधिक स्थूल पृथ्वी है, जो सम्पूर्ण प्रकृति का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है। वेद के अनुसार यह हमारी सृजन-पालन व आधार देने वाली माता है, साथ ही हम इसके पुत्र हैं। इसके साथ हमारा व्यवहार माता-पुत्र की भांति होना चाहिए। माता यदि जन्म देकर सन्तान का पालन पोषण करती है, तो सन्तान भी माता का सम्मान और उसकी सेवा में अपने जीवन की बाजी लगाने को प्रस्तुत रहती है। आज की भांति सागर, धरातल, पर्वत, आकाश में पाये जाने वाले पदार्थ यथा रत्न, राशि, जल, वृक्ष-वनस्पति, पत्थर, वायु सभी का भरपूर दोहन करना ही मानव का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। दोहन भी ऐसा कि इन प्राकृतिक पदार्थों का समूल विनाश होता चला जाये तथा पर्यावरण भयंकर रूप से प्रदूषित हो जाए प्रतिदिन सोने का एक अण्डा देने वाली मुर्गी से सन्तुष्ट न होकर एक बार में ही मुर्गी के पेट को फाड़कर सोने के सारे अण्डे एक साथ निकालने वालों को सोना तो मिलता ही नहीं, मुर्गी से भी हाथ धोना पड़ता है।
भूमि की भांति मानव की अन्य मातायें भी हैं। उनमें से एक माता गाय भी है। उसके पोषणकारी स्वर्णिम दुग्ध से जब जी न भरा तो मानव ने उसके मांस को ही खाना प्रारम्भ कर दिया। कृत्रिम विषैले दूध से मानव सन्तान इधर रोग ग्रस्त होती है, उधर हजारों वधशालाओं में गौओं की हत्या करके गोमांस को भारत से निर्यात किया जाता है। दैनिक जागरण (23.07.2000) के अनुसार दिल्ली के भोजन गृहों में गोमांस परोसे जाने के विरोध में जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन किया गया, वह भी मुस्लिम समुदाय के जागरूक व्यक्तियों के द्वारा। अमर उजाला दिनांक (24.07.2000) के अनुसार अमेरिका में शेर के मांस को परोसे जाने पर लोगों द्वारा आपत्ति की गई। यह तो समझ में आता है कि गाय को अंगूर, अन्न, मेवा खिलाकर अधिक गुणवत्ता पूर्ण दुग्ध प्राप्त किया जाए, किन्तु यह समझ में नहीं आता है कि शाकाहारी पशु गाय के अधिक मांस को प्राप्त करने के लिए उसे धोखे से चारे में मांस मिला कर खिला दिया जाये। इस अस्वाभाविक क्रियाकलाप से जब 'मैडकाव' बीमारी से मनुष्य प्रभावित हुए, तो बड़ी संख्या में उन गायों को मार कर अपनी जान बचायी। इतना भोगते हुए भी वनस्पतियों की स्वाभाविक प्रोटीन से अतृप्त मानव इनके जनन गुण सूत्र (जीन्स) में जन्तुओं की प्रोटीन प्रविष्ट करके न जाने और कौन सी असाध्य व्याधि बुलाना चाहता है। यह है कभी न पूरी होने वाली मनुष्य की हत्यारी हवश !
अथर्ववेद इस हवश पर नियन्त्रण करके 'वरदा वेदमाता' के ऐसे विज्ञान की प्रेरणा देता है, जिससे मानव को जीते जी आयु, प्राणश्क्ति, प्रजा, पशु, कीर्ति एवं ब्रह्मवर्चस्व तो मिलें ही, मरने के बाद ब्रह्मलोक का दिव्य आनन्द भी मिले। ऋग्वेद के ज्ञान के पदों से धर्म का बोध होता है। यजुर्वेद के कर्म सृजित अर्थ से मिलकर पद से पदार्थ बन जाते हैं। सामवेद की सात्विक कामनाओं से यह पदार्थ जगहितार्थ समर्पित हो जाते हैं। यही समर्पण अथर्ववेद के विज्ञान द्वारा मानव को मोक्ष की ओर अग्रसर कर देता है। इस प्रकार मानव ''धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष'' रूपी पुरूषार्थ चतुष्टय के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विज्ञान-चार वेदों के ये प्रधान चार विषय हैं, किन्तु सामान्य रूप से चारों वेदों के प्रत्येक मन्त्र में इन विषयों का अनुपम सामंजस्य रहता है। बिना किसी भेदभाव के मनुष्य मात्र स्वसामर्थ्यानुसार ''वेद का पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना'' परमधर्म का अनुगमन कर अपने जीवन को देदीप्यमान कर सकता है तथा वेद की 'मनुर्भव' भावना का जीवन्त स्वरूप बन सकता है।

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

आस्था की आड़ में जेएनयू का जेहाद


एक है जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय ! मैं वहां नहीं पढ़ा इसकी कसक हमेशा थी लेकिन अब नहीं है। अब तक हमें पता था कि ये लीक से अलग हटकर सोचने वाले युवाओं का बौद्धिक तीर्थस्थल है अब मै ये कह सकता हूँ ये हिन्दुस्तान में तालिबानियों की एक पूरी जमात पैदा कर रहा है। एक ऐसी जमात जिसने ब्राह्मणवाद के विरोध की आड़ में हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों के खिलाफ जेहाद छेड़ रखा है अगर ये सब सिर्फ धार्मिक वितंडावाद और धर्मजनित शोषण उत्पीडन और गैर बराबरी के खिलाफ होता तो निस्संदेह इसका स्वागत किया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा न करके आल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंस फोरम (एआइबीएसएफ) और यूनाईटेड दलित स्‍टूडेंटस फोरम (यूडीएसएफ) जैसे तथाकथित छात्र संगठनों ने न सिर्फ हिन्दू देवी देवताओं का अपमान शुरू कर दिया बल्कि हिंदी और हिन्दुस्तान के घोर विरोधी मैकाले की जयंती भी मनाई।
इस विरोध में दलितों पिछड़ों के ये तथाकथित विचारक ये भूल गए कि आज देश में सवर्णों और एलिटों की धार्मिक आस्था तो पूरी तरह से उपभोग और मध्यमवर्गीय कुंठा में विलीन हो गयी है ,ये धर्म का इस्तेमाल भी फैशन की तरह करते है ,असली आस्था और आस्थाओं से जुडी जीवन शैली तो हमारे गाँवों, देहातों में दलितों, आदिवासियों -गिरिजनों ने अपना रखी है। अभी शायद एक सप्ताह भी नहीं हुए, उड़ीसा में आदिवासियों ने अपने हाथों से अपनी झोपडियों में आग लगा दिया है, वजह ये थी कि पुलिस के जवान माओवादियों की तलाश में उनके घरों में घुस आये थे। इस दौरान जूते पहनकर वो उनके रसोईघर में भी चले गए जहाँ वो आमतौर पर अपने देवी-देवताओं की तस्वीरें रखते हैं, इसलिए उन्होंने पुलिस के घर में घुसने के बाद पवित्रता के लिए घर को भी जलाने में कोई संकोच नहीं किया।

शर्मनाक स्थिति ये है कि आज देश में दलितवाद के पुरोधाओं और दलितों के तथाकथित मसीहाओं ने दलितों, आदिवासियों को देखा ही नहीं है, उनके विचार युद्ध भी उन दलितों -पिछडों के लिए होते हैं जिसके पेट भरे हुए हैं। ये विचारक या तो इस दम पर सत्ता हासिल करना चाहते हैं या खुद को जबरिया बुद्धिजीवी मनवाने पर तुले हुए हैं। हम इसे धोखाधड़ी कहते हैं। शायद बात अजीबोगरीब लगे लेकिन ये सच है कि वो लोग जो जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में महिसाषुर की जयंती मना रहे हैं अगर किसी बैगा या धरकार आदिवासी के घर जाकर उनको अपने उद्देश्यों के बारे में बताएं तो वो अगले ही पल घर में रखी कुल्हाड़ी से उनकी गर्दन अलग कर देगा। वो भी इसे वध कहना कहते हैं। धर्म से जुड़े मिथकों से दलितों-आदिवासियों ने अपने अपने किस्से गढ़ लिए हैं, जो कहीं भी किसी भी किताब में पढ़ने को नहीं मिलते। जिरही, अमिला जैसे दुर्गा के नाम आपको किसी भी हिंदू धर्म के ग्रंथों में नहीं मिलेंगे। वो उन्हें अपनी खेती किसानी और अपनी संस्थाओं से जोड़ कर देखता हैं। मजे की बात ये है कि आदिवासियों को हिन्दू धर्म से कोई मतलब नहीं है। मध्य प्रदेश पूर्वी उत्तर प्रदेश और छतीसगढ़ की कई जनजातियाँ तो जानती ही नहीं उनका धर्म क्या है। हाँ उनके आस्था के प्रतीक वही हैं जो हिन्दुओं के है ,लेकिन उनकी पूजा शैली भी बिलकुल भिन्न है। वो नवरात्र में महिसाषुर के नाम पर अमिला देवी के मंदिर पर हजारों पशुओं की बलि चढ़ा देगा और उन्हें खायेगा भी ,जबकि कोई भी हिन्दू धर्म का अनुयायी नवरात्र में मांस को हाँथ तक नहीं लगाएगा। आप और हम मिथकों को नए तरीकों से परिभाषित कर अपनी अपनी कुंठाओं को शांत कर सकते हैं ,वो उन्हें परिभाषित हरगिज नहीं करेगा ,क्यूंकि उसे लगता है कि वो इन्ही की बदौलत वो सरकार ,सवर्णवादी समाज और प्रकृति से लड़ सकता है। हमारे कहने का मतलब ये हरगिज नहीं है कि मिथकों को परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए ,लेकिन मिथक दूसरे मिथक को ही जन्म देंगे, ये सच है।

शायद हममे से कुछ लोगों ने ने इतिहासकार डॉ युगेश्वर को पढ़ा हो उन्होंने कई किताबें लिखी है जिनमे एक किताब है “रावण एक जीवन ” उनकी ये किताब पढ़ते वक्त मुमकिन है आपकी आस्था रावण में हो जाए ,इतिहास से जुड़े पात्रों का चुनाव हमेंव्यक्तिगत तौर पर करना है ,लेकिन इसे किसी समूह पर कैसे अध्यारोपित किया जा सकता है ?फेसबुक और ब्लागिंग के इस शानदार युग में जब विचारों का बेरोक टोक आदान प्रदान संभव है ,शहरी एलिट वर्ग को ये स्वतंत्रता बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। ये कुछ ऐसा है कि बढ़िया पकवान को अति खाना और शर्मनाक तरीके से उलटी कर देना। उन्हे यूँ लगता है कि इन माध्यमों का उपयोग करके वो किसी भी व्यक्ति या समुदाय पर पूरी ताकत से हमला बोल सकते हैं ,नतीजा ये है कि ये हमले वेब से निकलकर विश्वविद्यालाओं के गलियारों तक पहुँच चुके हैं। एक ऐसे समय में जब सत्ता ने विश्वविद्यालयों के लोकतंत्र को अपने पैरों से रौंद डाला हैं। छात्र संघ चुनावों को ख़त्म करके छात्रों से विरोध का एक आखिरी हथियार भी छिन्न लिया गया हो ,जहाँ नहीं तहां छात्र लतियाए जा रहे हों ,लठीयाये जा रहे हों ,मेस में दलित छात्रों का सबके साथ भोजन करना अभी तक वर्जित हो ,इस तरह की कोई भी कोशिश बेहद खेदपूर्ण है। आस्था और अनास्था हमें खुद तय करनी है ,लेकिन किसी भी व्यक्ति या वर्ग की आस्था को अवैज्ञानिक और अतार्किक आधार पर चोट पहुंचाने का अधिकार किसी को नहीं है। याद रखें ये वही जेएनयु है जहाँ अश्लील एम्एम्एस बनाने कों भी एक किस्म की बुद्धिजीविता माना जाता है ,ये वही जेएनयु है जहाँ के छात्र ,किताबों और जनांदोलनों की राह छोड़कर गांजे और चरस के अँधेरे में गुम हैं। ये वही विश्वविद्यालय है जो दुनिया भर के लाखों छात्रों का निर्माण करने वाले काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के कुलगीत का अपमान करता है। अतिवादिता हमेशा खतरनाक होती है ,मुमकिन हैआगे देवी देवताओं के चित्र जलाये जाएँ,केम्पस जंग के मैदान में तब्दील हो जाए और कुछ ब्लाग्स और वेबसाइट्स इसे भुनाए भी। जो भी हो ये तय है महिषासुर और मैकाले कों पूजने वाले इस विश्वविद्यालय ने अब वो अधिकार खो दिया है, जिससे वो देश भर के छात्रों और छात्र आन्दोलनों का नेतृत्व कर सके।
प्रस्तुतकर्ता रामदास सोनी

ब्रह्मचर्य और गृहस्थ जीवन में धर्म, अर्थ और काम का महत्व

हिंदू आश्रम व्यवस्था को जानें
*धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
*ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।
*धर्म से मोक्ष और अर्थ से काम साध्य माना गया है।


ब्रह्मचर्य और गृहस्थ जीवन में धर्म, अर्थ और काम का महत्व है। वानप्रस्थ और संन्यास में धर्म प्रचार तथा मोक्ष का महत्व माना गया है।
प्राचीन भारत में ऋषि-मुनि वन में कुटी बनाकर रहते थे। जहाँ वे ध्यान और तपस्या करते थे। उक्त जगह पर समाज के लोग अपने बालकों को वेदाध्यन के अलावा अन्य विद्याएँ सीखने के लिए भेजते थे। धीरे-धीरे यह आश्रम संन्यासियों, त्यागियों, विरक्तों धार्मिक यात्रियों और अन्य लोगों के लिए शरण स्थली बनता गया।
यहीं पर तर्क-वितर्क और दर्शन की अनेकों धारणाएँ विकसित हुई। सत्य की खोज, राज्य के मसले और अन्य समस्याओं के समाधान का यह प्रमुख केंद्र बन गया। कुछ लोग यहाँ सांसारिक झंझटों से बचकर शांतिपूर्वक रहकर गुरु की वाणी सुनते थे। इसे ही ब्रह्मचर्य और संन्यास आश्रम कहा जाने लगा।
ब्रह्मचर्य आश्रम को ही मठ या गुरुकुल कहा जाता है। ये आधुनिक शिक्षा के साथ धार्मिक शिक्षा के केंद्र होते हैं। यह आश्रय स्थली भी है। पुष्ट शरीर, बलिष्ठ मन, संस्कृत बुद्धि एवं प्रबुद्ध प्रज्ञा लेकर ही विद्यार्थी ग्रहस्थ जीवन में प्रवेश करता है। विवाह कर वह सामाजिक कर्तव्य निभाता है। संतानोत्पत्ति कर पितृऋण चुकता करता है। यही पितृ यज्ञ भी है।
ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम में रहकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की शिक्षा लेते हुए व्यक्ति को 50 वर्ष की उम्र के बाद वानप्रस्थ आश्रम में रहकर धर्म और ध्यान का कार्य करते हुए मोक्ष की अभिलाषा रखना चाहिए अर्थात उसे मुमुक्ष हो जाना चाहिए। ऐसा वैदज्ञ कहते हैं।
आश्रमों की अपनी व्यवस्था होती है। इसके नियम होते हैं। आश्रम शिक्षा, धर्म और ध्यान व तपस्या के केंद्र हैं। राज्य और समाज आश्रमों के अधीन होता है। सभी को आश्रमों के अधीन माना जाता है। मंदिर में पुरोहित और आश्रमों में आचार्यगण होते हैं। आचार्य की अपनी जिम्मेदारी होती है कि वे किस तरह समाज में धर्म कायम रखें। राज्य के निरंकुश होने पर अंकुश लगाएँ। किस तरह विद्यार्थियों को शिक्षा दें, किस तरह वे आश्रम के संन्यासियों को वेदाध्ययन कराएँ और मुक्ति की शिक्षा दें। संन्यासी ही धर्म की रीढ़ हैं।
राज्य, समाज, मंदिर और आश्रम को धर्म संघ के अधीन माना गया है। आचार्यों के संगठन को ही संघ कहा जाता है। संघ की अपनी नीति और उसके अपने नियम होते हैं। जो संन्यासी आश्रम से जुड़ा हुआ नहीं है उसे संन्यासी नहीं माना जाता। संन्यासियों का मंदिर से कोई वास्ता नहीं होता।
आश्रम चार हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। आश्रम ही हिंदू समाज की जीवन व्यवस्था है। आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति की उम्र 100 वर्ष मानकर उसे चार भागों में बाँटा गया है।
उम्र के प्रथम 25 वर्ष में शरीर, मन और बुद्धि के विकास को निर्धारित किया गया है। दूसरा गृहस्थ आश्रम है जो 25 से 50 वर्ष की आयु के लिए निर्धारित है जिसमें शिक्षा के बाद विवाह कर पति-पत्नी धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हैं। उक्त उम्र में व्यवसाय या कार्य को करते हुए अर्थ और काम का सुख भोगते हैं।
50 से 75 तक की आयु से गृहस्थ भार से मुक्त होकर जनसेवा, धर्मसेवा, विद्यादान और ध्यान का विधान है। इसे वानप्रस्थ कहा गया है। फिर धीरे-धीरे इससे भी मुक्त होकर व्यक्ति संन्यास आश्रम में प्रवेश कर संन्यासियों के ही साथ रहता है।
प्रस्तुतकर्ता रामदास सोनी

बांग्लादेशी घुसपैठ से असम के इस्लामीकरण की आवाज उठाई जा रही है

अगर एक तरफ असम में बांग्लादेशी घुसपैठ से असम के इस्लामीकरण की आवाज उठाई जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश में हिन्दू आबादी तेजी से कम हो रही है. बांग्लादेश में 2001 से 2011 के बीच तेज गिरावट दर्ज की गई है. 2001 में बांग्लादेश की जनगणना के अनुसार वहां 1.68 करोड़ हिन्दू थे जो 2011 में घटकर 1.23 करोड़ रह गये हैं. बांग्लादेश में अब कम से कम 15 जिले ऐसे हैं जहां हिन्दू आबादी नदारद हो गई है.

2011 की गई जगनणना की जो रिपोर्ट सामने आई है उसके मुताबिक 2001 की जगनणना में बांग्लादेश में कुल आबादी के 9.2 प्रतिशत हिन्दू थे लेकिन 2011 में उनकी संख्या बढ़ने की बजाय घटकर बांग्लादेश की कुल आबादी के 8.5 प्रतिशत रह गई है. 2001 में बांग्लादेश की हिन्दू आबादी 1.68 करोड़ थी. हिन्दू जन्मदर के आधार पर जो आंकलन किया गया था उसके मुताबिक 2011 में बांग्लादेश में हिन्दू आबादी 1.82 करोड़ होनी चाहिए थी लेकिन जो नतीजे निकले हैं वे चौंकानेवाले हैं. बांग्लादेश में हिन्दू आबादी बढ़ने की बजाय तेजी से घटी है और अब बांग्लादेश में हिन्दू आबादी घटकर 1.23 करोड़ रह गई है. यानी एक दशक के भीतर करीब साठ लाख हिन्दू कम हो गये. हालांकि इसी अवधि के दौरान ईसाई, बौद्ध और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के वृद्धिदर में कोई कमी नहीं दर्ज की गई है. बांग्लादेश में 90.4 प्रतिशत मुस्लिम हैं बाकी नौ प्रतिशत में अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक हैं.
बांग्लादेश में हिन्दूओं की इस घटती संख्या के पीछे बांग्लादेश में चरमपंथी मुस्लिम संगठन हैं जो इस्लाम के नाम पर मुस्लिमों के बीच काम करते हैं और बड़े पैमाने पर हिन्दुओं के खिलाफ अभियानों को मदद करते हैं. बांग्लादेश में इससे संबंधित जो रपटें प्रकाशित हुई हैं वे बताती हैं कि बांग्लादेश में हिन्दुओं का जबर्दस्त उत्पीड़न हो रहा है. केवल हिंसक वारदातों के जरिए ही उनकी जर जमीन उनसे हासिल नहीं की जा रही है बल्कि इस्लामिक देशों से आर्थिक मदद हासिल करके काम करनेवाले गैर सरकारी मुस्लिम संगठन बड़े पैमाने पर धर्मांतरण को भी अंजाम दे रहे हैं. एक अनुमान है कि बांग्लादेश में ऐसे करीब तीन सौ गैर सरकारी संगठन सक्रिय हैं जो हिन्दुओं को धर्मांतरित कर रहे हैं जिसके कारण हिन्दू आबादी में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है.
लेकिन बांग्लादेश में हिन्दुओं का ध्रर्मांतरण ही उनके लिए एकमात्र समस्या नहीं है. बांग्लादेश के नेशनल हिन्दू ग्रैण्ड एलायंस के महासचिव गोविन्द चन्द्र प्रमाणिक के हवाले से बांग्लादेश के अखबार वीकली ब्लिट्ज कहता है कि बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर हिन्दू लड़कियों का अपहरण करके उनका जबरन मुस्लिमों के साथ विवाह कर दिया जाता है. विरोध करने पर उनके साथ गैंगरेप तक की घटनाएं अंजाम दी जाती हैं. एनेमी प्रापर्टी एक्ट के प्रावधानों के तहत वहां हिन्दुओं की जर जमीन बड़े पैमाने पर मुस्लिम आबादी ने कब्जा कर लिया है जिसके कारण हिन्दू पलायन पर मजबूर हो रहे हैं. इसके अलावा मुस्लिम बहुल इलाकों में हिन्दुओं का उत्पीड़न के कारण भी वहां हिन्दू आबादी में तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है.
 उम्मीद की जा रही थी कि शेख हसीना की सरकार आने के बाद बांग्लादेश के हालात में कुछ बदलाव नजर आयेंगे लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं आये हैं. प्रमाणिक एक उदाहरण से बताते हैं कि शेख हसीना की सरकार में भी हिन्दुओं के उत्पीड़न में कोई कमी नहीं आई है. उनका कहना है कि बांग्लादेश के गोपालगंज जिले में 2001 की जनगणना के अनुसार हिन्दू आबादी 3 लाख 71 हजार थी. बांग्लादेश में गोपालगंज हिन्दू बहुल जिला था और ऐसा समझा जाता था कि हिन्दू वोटबैंक की लालच में यहां हिन्दुओं को कोई नुकसान नहीं होगा. लेकिन 2011 की जनगणना रिपोर्ट बताती है कि गोपालगंज में हिन्दुओं की संख्या घटकर पचास हजार से भी नीचे चली गई है. प्रणाणिक कहते हैं कि इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं के लिए अब कोई स्वर्ग नहीं बचा है. बांग्लादेश में शेख हसीना की पार्टी बांग्लादेश अवामी लीग को हिन्दू अपनी पार्टी समझते थे और उन्हें उम्मीद थी कि लीग की सरकार आयेगी तो हिन्दुओं की रक्षा हो सकेगी लेकिन लीग की सरकार आने के बाद भी हिन्दुओं के उत्पीड़न में कोई कमी नहीं आई. ---रामदास सोनी

181 pariwaron ke 442 logon ne sweekara hindu dharm


गुरुवार, 29 नवंबर 2012

ईशनिंदा पर माफ़ी लेकिन पुलिस को कोसा तो खैर नहीं


ईशनिंदा करके क़ानून के चंगुल में फंसने से आप शायद बच भी जाएं, लेकिन पुलिस और महारानी की अवमानना करके अब नहीं बच पाएंगे.
नीदरलैंड के अधिकारियों ने उस प्रस्ताव को मंजूरी देने का फैसला किया है जिसमें ईशनिंदा को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने की बात की गई है.
 क़ानून 1930 के दशक में लागू किया गया था और बीते आधे दशक में कभी इसका इस्तेमाल नहीं किया गया.देश के ज्यादातर सांसदों ने संसद में एक स्वर में कहा है कि ईशनिंदा संबंधी क़ानून 21वीं सदी में प्रासंगिक नहीं है.

शान में गुस्ताख़ी

रोचक बात ये है कि नीदरलैंड में आप किसी पुलिस अधिकारी या देश की सत्ता का कमान संभालने वाली महारानी के बारे में ऐसा कुछ नहीं कह सकते जो उनकी शान में गुस्ताख़ी करता हो.
नीदरलैंड के समाज को उदार और सहिष्णु माना जाता है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अहम स्थान दिया गया है.
हेग में मौजूद बीबीसी संवाददाता ऐन्ना होलिगन के मुताबिक, देश की एक अदालत ने कहा था कि इस्लाम-विरोधी दक्षिणपंथी
नेता गीर्ट विल्डर्स को इस्लाम की आलोचना करने की अनुमति होनी चाहिए, भले ही उनके इस मुंहफट तरीके से मुसलमान आहत होते हों.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि अदालत के इस रुख के बाद ईशनिंदा के मुद्दे पर देश में बहुत बहस हुई है.
हालांकि साल 2008 में देश की गठबंधन सरकार ने 'कंजरवेटिव क्रिश्चियन' राजनीतिक पार्टी का समर्थन बरकरार रखने के लिए ईशनिंदा कानून को खत्म नहीं करने का फैसला किया था.