राष्ट्रीय सलाहकार परिषद' का प्रस्तावित हिन्दू विरोधी काला कानून श्रीमती सोनिया गाँधी की अध्यक्षता में बनाई गई "राष्ट्रीय सलाहकार समिति" द्वारा तैयार किया गया प्रस्तावित "सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011" यदि संसद द्वारा पारित कर दिया गया तो मुसलिम, ईसाई आदि अल्पसंख्यक समूहों को हिन्दुओं के प्रति घृणा फ़ैलाने, हिन्दुओं को प्रताड़ित करने और हिन्दू महिलाओं से बलात्कार करने के लिए प्रोत्साहन मिल जाएगा. इस प्रस्तावित कानून का मंतव्य ये है कि यदि बहुसंख्यक वर्ग अर्थात हिन्दू किसी अल्पसंख्यक समूह के प्रति घृणा फैलाये या हिंसा करे या यौन उत्पीड़न करे तो हिन्दुओं को दण्डित करने का प्रावधान है. किन्तु मुसलिम, ईसाई आदि अल्पसंख्यक समूहों द्वारा हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाई जाए या हिंसा की जाँच की जाए या बलात्कार आदि यौन शोषण किया जाए तो उन अल्पसंख्यकों को किसी प्रकार का दंड देने का कोई प्रावधान नहीं है. यदि कोई अल्पसंख्यक उपरोक्त अपराधों के लिए किसी बहुसंख्यक व्यक्ति या संगठन के विरुद्ध शिकायत करता है तो उसकी जांच किए बिना ही उस व्यक्ति एवं संगठन को अपराधी मानकर उसका संज्ञान लिया जाएगा. इस अपराध की असत्यता सिद्ध करना अपराधी का दायित्व होगा. शिकायत करता की पहचान गुप्त रखी जाएगी. इस विधेयक में 'समूह' की परिभाषा में केवल धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक वर्ग ही है, बहुसंख्यक वर्ग के लिए समूह शब्द का प्रयोग नहीं है और केवल समूह के विरुद्ध घृणा, हिंसा आदि किया गया अपराध ही अपराध माना जाएगा. विधेयक में ये मान लिए गया है कि सांप्रदायिक हिंसा केवल बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा ही पैदा की जाती है और अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य कभी ऐसा कर ही नहीं सकते. अतः बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के खिलाफ किए गये सांप्रदायिक अपराध तो दंडनीय हैं परन्तु अल्पसंख्यक समूहों द्वारा बहुसंख्याकों के खिलाफ किए गये ऐसे अपराध कतई दंडनीय नहीं माने गये हैं. अतः अल्पसंख्यक समुदय का कोई भी सदस्य इस कानून के तहत बहुसंख्यक समुदाय के विरुद्ध किए गये किसी अपराध के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, केवल बहुसंख्यक समुदाय का सदस्य ही ऐसे अपराध कर सकता है और इसीलिए इस कानून का मंतव्य यह है कि केवल बहुसंख्यक समुद्र का सदस्य ही ऐसे अपराध कर सकते हैं, अतः उन्हें ही दोषी मानकर दंडित किया जाना चाहिए. किसी अल्पसंख्यक ने रोजगार या किराये पर घर मांग लिया तो बिना योग्यता या अनुकूलता का विचार किए आप यदि हा नहीं कहेंगे तो आप अपराधी होंगे. पुलिस व प्रशासन अल्पसंख्यकों का कवच बन जाएगी. कहीं भी अल्पसंख्यकों के विरुद्ध उपरोक्त कोई भी अपराध होता है तो प्रशासन की भी समान जिम्मेदारी होगी. इस प्रकार प्रशासन अपने को बचाने के लिए निर्दोष हिन्दुओं को प्रताड़ित करेगा परन्तु यदि हिन्दुओं के प्रति उपरोक्त अपराध होता है तो प्रशासन को परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी. इस विधेयक के अनुसार एक सात सदस्यीय राष्ट्रीय प्राधिकरण बनेगा जिसमें कम से कम चार (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सहित) सदस्य 'समूह' अर्थात अल्पसंख्यक समुदाय के होंगे जिससे यह निश्चित है कि बहुसंख्यक समुद्र के सदस्य अल्पमत होंगे. इस विधेयक में धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव क्यों किया गया ? अपराध तो अपराध है चाहे वह किसी भी वर्ग के व्यक्ति ने किया है. सांप्रदायिक अपराध बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नहीं होते. वास्तव में ये विधेयक इस्लामिक राज्य स्थापित करने की और एक खतरनाक कदम है. भारत में वरन सम्पूर्ण विश्व में किसी देश के मूल निवासियों के लिए इस प्रकार का काला कानून शायद ही कभी किसी ने देखा होगा. यदि ये विधेयक पास हो जाता है तो भारत REPUBLIC OF ISLAMIC INDIA हो जायेगा. ऐसे विधेयक की क्या आवश्यकता है जो धर्म व जाति के आधार पर भेदभाव करके संविधान के पंथ निरपेक्ष स्वरुप को और राष्ट्र की एकता और अखंडता को खतरे में डालकर आतंकवादियों व अलगाववादियों का क़ानूनी हथियार बन जाए. इस विधेयक को तैयार करने वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सोनिया जी ने चुने हुए ऐसे लोग लिए हैं जिनका हिंदुत्व विरोधी भाव सर्वज्ञात है. इस परिषद को विधेयक तैयार करने का अधिकार किसने दिया जब इस परिषद की संविधान व कानून में कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में इसकी वैधानिकता क्या है ? श्रीमती सोनिया गाँधी कांग्रेस से बड़ी हो सकती हैं परन्तु संविधान व देश से बड़ी नहीं. PREVENTION OF COMMUNAL AND TARGETED VIOLENCE (ACCESS TO JUSTICE AND REPRATION) BILL, 2011 सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक, 2011 यूपीए सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय सलाहकार समिति (http://nac.nic.in/) ने इस महीने सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011 को चर्चा और सुझावों के लिए आम जनता के सामने रखा था. ये विधेयक यूपीए सरकार द्वारा 2005 में बनाया गया था. तब से लेकर अब तक इसके मसौदे में काफी बदलाव आ चुका है. विधेयक द्वारा बेशक कुछ अच्छा होने की बात कही जा रही हो लेकिन इसके पीछे की मंशा एक समुदाय विशेष को खुश करना है जिसका इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में किया जा सके और एक धर्म विशेष के लोगों को प्रताड़ित करना है. इस विधेयक के पास होने के बाद अर्थात कानून बनाने के बाद बहुसंख्यकों अर्थात हिन्दुओं को सिर्फ इसलिए सजा मिलेगी क्योंकि वो बहुसंख्यक हैं यानि हिन्दू हैं. विधेयक में यह स्पष्ट कहा गया है कि हिंसा, बलात्कार या घृणा सम्बन्धी प्रचार तभी अपराध मना जाएगा जब वो अल्पसंख्यकों के साथ किया गया हो. यदि किसी अल्पसंख्यक लड़की या महिला के साथ कुछ गलत किया जाता है तो वो अपराध होगा लेकिन यदि वैसे ही किसी बहुसंख्यक महिला के साथ किया जाता है तो वो कतई अपराध नहीं है. वहां पर विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है. हिंसा और घृणा का प्रचार के मामले में भी इसी तरह अपराधी निर्धारित किया जाएगा. इस प्रकार लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना पर चोट करके ये विधेयक बनाया गया है. संविधान में जगह-जगह समानता की बात की गई है लेकिन इस विधेयक का तो आधार असमानता है. विधेयक में धर्म और भासाही आधार पर असमानता को तरजीह दी गई है. विधेयक में दिए गये सभी प्रावधान साफ़-साफ़ एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की ओर इशारा करते हैं. विधेयक में ये बात स्पष्ट तौर पर मान ली गई है कि केवल बहुसंख्यक वर्ग द्वारा ही हिंसा फैलाई जा सकती है/ अल्पसंख्यक तो हिंसा कर ही नहीं सकते और सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अल्पसंख्यक हैं. विधेयक में ये भी प्रावधान किया गया है कि सांप्रदायिक हिंसा के दौरान पूरी सरकारी मशीनरी अल्पसंख्यकों की खिदमत में लग जाए और बहुसंख्यकों वर्ग के अधिक से अधिक लोगों को दंड दिलाने का प्रयास करे. अतः अगर कहीं दंगा होता है तो पुलिस या अन्य सरकारी मशीनरी इस बात की जाँच नहीं करेगी कि दंगा किसने किया या उसके कारण क्या थे बल्कि उनका काम ये देखना होगा कि दंगे में बहुसंख्यक लोग कौन-कौन शामिल थे. सांप्रदायिक हिंसा के दौरान बेशक पीड़ित बहुसंख्यक समाज हो लेकिन विधेयक केवल अल्पसंख्यकों को ही पीड़ित होने का प्रमाण पत्र प्रदान करता है, अतः बहुसंख्यक यानि हिन्दू पीड़ित हो ही नहीं सकते. इस प्रकार विधेयक एक वर्ग को ही हमेशा पीड़ित होने की गारंटी प्रदान करता है चाहे 50 अल्पसंख्यकों ने मिलकर 5 बहुसंख्यकों को मारा हो. विधेयक में सजा देने का जो प्रावधान किया गया है वो भी आश्चर्यजनक है और न्याय की मूल धरना के विपरीत है. सजा देने के लिए जो प्रक्रिया अपने जाएगी उसमें धारा 161 के तहत बायां रिकॉर्ड करने की बजाय 164 के तहत बायां दर्ज किए जायेंगे अर्थात सीधे अदालत के सामने बयान होंगे. साथ ही यदि किसी व्यक्ति पर घृणा के प्रचार सम्बन्धी आरोप लगाया जाता है तो उसे तब तक दोषी मना जाएगा जब तक कि वो निर्दोष सिद्ध नहीं हो जाता. जबकि न्याय के अनुसार कोई व्यक्ति तब तक दोषी या अपराधी नहीं मना जाता जब तक कि उस पर दोष सिद्ध न हो जाए. इस मामले में आरोप ही सबूत का काम करेगा यानि यदि किसी अल्पसंख्यक ने किसी बहुसंख्यक पर आरोप मात्रा भी लगा दिया तो वो दोषी मान लिया जाएगा. विधेयक के द्वारा सकरी मशीनरी, पुलिस, सशस्त्र बल लोकसेवकों आदि को भी एक वर्ग विशेष के हित में कार्य करने का दबाव बनाया जा सकता है या एक वर्ग विशेष द्वारा उनके ब्लैकमेलिंग की पूरी-पूरी सम्भावना बनी रहेगी. विधेयक के खंड 12 के अनुसार कोई सरकारी कर्मचारी यदि किसी समूह विशेष के व्यक्ति को पीड़ा पहुंचता है या मानसिक अथवा शारीरिक चोट पहुंचता है तो उसे यातना दिए जाने के अपराध में दण्डित किया जा सकता है. खंड 13 के अनुसार कोई सरकारी व्यक्ति इस विधेयक में उल्लिखित अपराधों के सम्बन्ध में अपनी ड्यूटी निभाने में ढिलाई बरतता है तो वो दंड का भागी होगा. खंड 14 में उन सरकारी व्यक्तियों को दंड का प्रावधान है जो सशस्त्र बालों पर नियंत्रण रखते हैं और अपनी कमान के लोगों पर कारगर ढंग से अपनी ड्यूटी निभाने हेतु नियंत्रण रखने में असफल रहते हैं. इसी प्रकार इस विधेयक के द्वारा लोकसेवकों पर बिना किसी सरकारी अनुमति के मुकदमा चलाया जा सकता है. ऐसे में स्पष्ट है कि लोकसेवक पर एक वर्ग विशेष के हित में कार्य करने के लिए व्यापक दबाव रहेगा. विधेयक में सांप्रदायिक सौहार्द , न्याय और क्षतिपूर्ति के लिए एक राष्ट्रीय प्राधिकरण गठित किया जाएगा. इस सात सदस्यीय प्राधिकरण में भी धर्म और भाषाई आधार पर जमकर भेदभाव किया जाएगा. 7 सदस्यों में से कम से कम 4 सदस्य , जिसमें दो वरिष्ठतम पद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी शामिल हैं, अल्पसंख्यक होने चाहिए. राज्यों पर भी इसी आधार पर राज्य प्राधिकरण गठित किया जाएगा. सरकारों को इस प्राधिकरण को पुलिस और अन्य दूसरी जांच एजेंसियों उपलब्ध करानी होंगी. प्राधिकरण के पास किसी शिकायत की जाँच करने, किसी ईमारत में घुसने, छापा मारने, खोजबीन करने का अधिकार होगा. प्राधिकरण सशस्त्र बालों पर भी नियंत्रण रख सकेगा और केंद्र एवं राज्य सरकारों को परामर्श जारी कर सकेगा. अतः कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की सुपर कैबिनेट ने एक ऐसा बिल तैयार किया है जिसके बाद बहुसंख्यक यानि हिन्दू अपांग हो जायेंगे. पुलिस , सशस्त्र बल आदि पंगु हो जायेंगे. अपराधी और पीड़ित किसी दंगे से पहले ही घोषित हो जाएगा. इस विधेयक को पूरा पढने के लिए इस लिंक पर (http://nac.nic.in/pdf/pctvb_amended.pdf) क्लिक करें. राष्ट्रीय सलाहकार समिति की वेबसाइट (http://nac.nic.in/) पर भी इस विधेयक को देखा जा सकता है.
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