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रविवार, 29 दिसंबर 2013

केवल २४ साल में मुस्लिम भारत पर कब्ज़ा कर लेंगे

हिंदू लड़कियों से शादी करके १२ बच्चे पैदा करे तो केवल २४ साल में मुस्लिम भारत पर कब्ज़ा कर लेंगे | हाल ही में पुलिस ने एक ऐसे ही युवक को पकड़ा है , इस युवक का नाम वसीम अकरम है ,वह फेसबुक दक्ष शर्मा के नाम से प्रोफाइल बनाकर हिंदू युवतियों को फंसाता था ,फिर उनका शारीरिक शोषण करता था | पुलिस ने अकरम को नजीराबाद से पकड़ा है |वसीम ने पूछताछ में बताया की लव जेहाद के नाम से ये सब कुछ चल रहा है , इससे जुड़े कट्टरपंथी हिंदू लड़कियों को फंसाकर उनसे शादी कर लेते हैं , इसका मुख्या संगठन ढाका में है तथा हिंदुस्तान में इसका मुख्या संगठन केरल में है| इस संगठन का मानना है की अगर एक मुस्लिम युवक एक हिंदू लड़की से शादी करके छः बच्चे पैदा करे तो हिंदुस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बनाने में ४० साल लगेंगे और अगर एक मुसलमान दो हिंदू लड़कियों से शादी करके १२ बच्चे पैदा करे तो केवल २४ साल में मुस्लिमभारत पर कब्ज़ा कर लेंगे | वो कहते हैं की हिंदू लड़कीसे शादी करने से एक तरफ हम हिंदू आबादी को बढ़ने से रोकते हैं तो दूसरी तरफ मुस्लिम आबादी बढाते हैं | अकरम ने बताया की मुल्ला मौलवी मुस्लिम बोलीवुड सितारों से कहते हैं की वे कमसे कम दो हिंदू लड़कियों से शादी करे जिससे की देश में हिंदू लड़कियों में मुस्लिम लड़कों के प्रति सहानुभूति बने ,वो भी सितारों की नक़ल करके मुस्लिम लड़कों के प्रेम जाल में आसानी से फंस जाएं |हिन्दुस्थान को "दारुल हरब" से "दारुल इस्लाम" बनाने का जो इनका उद्देश्य है, ये उसी की एक कड़ी है। कुछ साल पहले आप जानते हैं की केरल में इसके 2500 मामले सामने आये थे। जिसमे पकडे गए आतंकवादियों ने इसके बारे में सब बताया था। और तहकीकात करने पर ये सारे मामले सामने आये। लेकिन अब तो ये पूरे देश में फ़ैल चूका है।ये इनका गजवा-ए-हिन्द(हिंदुस्तान पर फतह) का एक हिस्सा है, जो इनकी (मुसलामानों की) किताबों में लिखा है। की पाकिस्तान भविष्य में हिंदुस्तान पर फतह करेगा और पूरा हिंदुस्तान एक मुस्लिम मुल्क होगा। आप "गजवा-ए-हिन्द" के बारे में नेट पर या यु-ट्यूब पर सर्च कर सकते हैं। जिसमे खुद पाकिस्तानी बोल रहा है इसके बारे में। SHARE IF U R A TRUE HINDU. कृपया इस संदेश को प्रसारित करने में मदद करें..

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

तरुण तेजपाल पर सेकुलर जुबान और कलम खामोश

आजकल कोई अखबार पलट लें या कोई पत्रिका अथवा कोई समाचार चैनल देख लें सब जगह तरुण तेजपाल की कलंक कथा की चर्चा हो रही है। फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो तरुण तेजपाल का बचाव कर रहे हैं। वही तरुण तेजपाल, जो इन दिनों गोवा में पुलिस हिरासत में हैं और उनसे अपनी बेटी की उम्र की और तहलका में उनके सहयोगी रही एक महिला पत्रकार के साथ हुए बलात्कार के संदर्भ में पूछताछ हो रही है। इधर वामपंथी मानसिकता के कुछ लोग तरुण के लिए माफी की वकालत कर रहे हैं, तो कुछ लोग उनके पक्ष में लेख लिख रहे हैं।
पिछले एक पक्ष से मीडिया में अजीब सा ऊधम मचा हुआ है। तरुण तेजपाल नाम के स्वनामधन्य ह्यसज्जन ह्ण के कृत्यों पर समाज उद्वेलित है और भर्त्सना की बात है कि साहित्यिक जगत और मीडिया के वामपंथी और राष्ट्र विरोधी लोग इस दुष्कर्म को कम आंकने, कम दिखाने, कम महसूस कराने में लगे हैं।  प्रिंट तथा इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोग निजी बातचीत में यहां तक चर्चा कर रहे हैं कि धुंआ अपने आप नहीं निकलता। वह लड़की भी कुछ न कुछ पैमाने पर दोषी है। इस काम में अंग्रेजी के चैनलों और अखबारों के साथ हिंदी के कुछ महारथी भी शामिल हैं।  जिनमें सर्वप्रमुख जनसत्ता का संपादक मंडल और उसके लेखक हैं। यहां विशेष रूप से महात्मा गांधी हिंदी संस्थान की पत्रिका ह्यहिंदी समयह्ण के भूतपूर्व संपादक राजकिशोर अग्रणी हैं। उनके दो लेख इस विषय पर जनसत्ता में पिछले दिनों छपे हैं। पहले लेख में उन्होंने तरुण तेजपाल के 6 माह के संपादन को छोड़ने और क्षमा मांगने को महत्व देते हुए इस विषय को अब शांत कर देने की मार्मिक अपील की और नए लेख में उन्होंने तरुण तेजपाल को कलाकार मानते हुए इन शब्दों में उसका स्वस्ति-गान किया है।  पत्रकारिता एक कला है और तरुण तेजपाल हमारे समय के उल्लेखनीय कलाकार हैं। उनके काटे हुए कई लोग आज भी बिलबिला रहे हैं। उनके वाक्य का अंतिम टुकड़ा बता रहा है कि राजकिशोर किसलिए तरुण तेजपाल का अपराध कम करने के लिये कोशिश कर रहे हैं।  क्या विशेष विचारधारा (इसे राष्ट्रवाद का विरोध पढ़ा जाए) के लिए  काम करना किसी का अपराध कम कर देता है।  तरुण स्टिंग अपरेशन के महारथी रहे हैं। उनकी शैली रही है कि पहले वातावरण तैयार करो।  शेर के सामने बकरी बांधो, शेर को बकरी खाने के लिये फुसलाओ और फिर हाहाकार मचाओ कि शेर ने बकरी खा ली। बंगारू लक्ष्मण जैसे सरल लोग उनके इन षड्यंत्रों का शिकार हुए हैं।  
इस विषय को थोड़ा विस्तार में देखने की जरूरत है। कवि, लेखक, संगीतकार, चित्रकार, मूर्तिकार, राजनीतिज्ञ, मीडिया के लोग यानी समाज में अपनी प्रभावी उपस्थिति दिखा पाने, दर्शा पाने वाले लोग सदा-सर्वदा से इन दुष्कमोंर् में संलिप्त रहे हैं। शेक्सपियर की मृत्यु सिफलिस से हुई थी। आस्कर वाइल्ड के कृत्यों को सारा साहित्यिक जगत जानता है। छायावाद की प्रमुख नेत्री, फिराक गोरखपुरी अपने प्रसंगों के लिए चर्चित रहे हैं। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति कैनेडी के दसियों प्रसंग, जवाहर लाल नेहरू की श्रद्घा माता, लेडी एडविना माउंटबेटन और ढेरों स्त्रियों से प्रगाढ़ता, अय्यूब खान की प्रसिद्घ गायिका नूरजहां से हद दर्जे की आत्मीयता  के बारे में दुनिया जानती है। इन लोगों में यश, पद, प्रभाव का प्राचुर्य था और लोग इनकी ओर आकर्षित होते थे। इसका ही परिणाम ये आत्मीय सम्बन्ध और उनके बारे में कानाफूंसियां थं। 
मगर यहां एक पेच है और यह पेच बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण है। इन लोगों ने कभी इस हाथ दे और उस हाथ ले जैसा कुछ नहीं किया।  ये कभी ह्यआज मेरी गाड़ी में बैठ जाह्ण या ह्यआती क्या खंडाला ह्ण जैसा प्रस्ताव देते धरे नहीं गये। गोवा के 5 सितारा होटल में किया गया काण्ड स्टिंग अपरेशन नहीं था।  वहां  किसी शेर के सामने बकरी बांध कर उसे फुसला कर बदनाम करने का षड्यंत्र नहीं किया गया था, बल्कि यह एक धूर्त व्यक्ति का अपने पद के दुरुपयोग का उदाहरण है। तरुण का कृत्य अपने पद के दबाव में स्त्री अस्मिता को रौंद देने का है। किसी सामान्य व्यक्ति के द्वारा भी यह काम किया जाता तो निश्चित रूप से प्रताड़नीय और दंडनीय होता ही होता मगर यहां तो मामला एक लड़की को अपने पद के दवाब में कुचल डालने का है। उस पर तुर्रा ये कि तुम्हारे पास अपनी नौकरी बचाने का ये ही एक मात्र रास्ता है। यहां यह बात भी सोचने की है कि तहलका जैसा पत्र जिसकी प्रतियां सामान्यत: बाजारों में नहीं दिखायी देतीं, जिसमें बहुत अधिक विज्ञापन नहीं होते, उसके पास गोवा में सेमीनार करने के संसाधन कहां से आते हैं ? क्या ये यूं ही है कि कपिल सिब्बल तहलका को शुरू करने के लिये  धन देते हैं।  पत्रकारिता के ऐसे कौन से महत्वपूर्ण कार्य हैं जिनके करने से देखते ही देखते तरुण का साम्राज्य खड़ा हो जाता है?  इस समय भी तरुण को बचाने के लिए उसके हिमायतियों की टीमें लगी हुई हैं। क्या तरुण की जगह निर्भया के दुष्कर्मी होते तब भी इसी प्रकार के बयान आते ? क्या शोमा चौधरी तब भी ऐसे ही बयान देतीं? इसी रोशनी में मैं एक प्रश्न इस घटना को कम करके आंकने वाले, कम दिखाने वाले महानुभावों से करना चाहूंगा। अगर इस लड़की की जगह उनकी बेटी या बहन होती तो क्या तब भी वे बलात्कारी को कलाकार मानते और क्षमा करने की बात करते? अगर हां, तो मैं 6 माह बल्कि एक वर्ष के लिये लफ्ज का संपादन छोड़ने और सहर्ष चार-पांच बार क्षमा मांगने के लिये तैयार हूं । बताइए  कब और कहां  भेंट की जाए । साभार- पांचजन्य 

शनिवार, 23 नवंबर 2013

कांग्रेस मोटी चमड़ी की पार्टी, खेत में भी खाती है, रेत में भी खाती है: नरेंद्र मोदी

बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी ने अलवर में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा। बीजेपी को भ्रष्‍टाचार में डूबी पार्टी बताने वाले राहुल गांधी के बयान पर पलटवार करते हुए मोदी ने कहा कि कांग्रेस का भ्रष्‍टाचार तीनों लोक में हैं। पूरे खानदान पर घोटाले के दाग लगे हैं। उन्‍होंने कहा, 'हमारे शहजादे कह रहे थे कि हम भ्रष्‍टाचार में वर्ल्‍ड चैंपियन हैं। कांग्रेस ने जल, थल, नभ में घोटाले किए। पानी में पनडुब्‍बी, जमीन पर कोयला घोटाला, आदर्श घोटाल, रेल घोटाला और पता नहीं क्‍या-क्‍या। हवा में 2 जी घोटाला।' 
मोदी ने कांग्रेस की तरफ इशारा करते हुए कहा, 'ये रेल में भी खाते हैं, खेल में भी खाते हैं। खेत में भी खाते हैं, रेत में भी खाते हैं। ये कुछ नहीं छोड़ते हैं। घोटालों के पैसे विदेशों में जमा कराए जा रहे हैं। हिंदुस्‍तान के गरीब का पैसा विदेशों में जमा हो रहा है। केंद्र सरकार क्‍यों नहीं ऐसा कानून बनाती कि हमारे देश का पैसा विदेशी बैंकों में जमा करने वालों का पता चले और यह रकम अपने देश में आए।' मोदी ने कहा, 'क्‍या हमें यह जानने का हक नहीं है कि विदेशी बैंकों में रखे ये पैसे किन लोगों के हैं? दिल्‍ली की सरकार (केंद्र सरकार) इस बारे में चिंता क्‍यों नहीं करती?'
 
केंद्र और राजस्‍थान में कांग्रेस की सरकारों पर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा, 'हाईकोर्ट ने कहा था कि इतिहास में ऐसी कमजोर सरकार नहीं देखी। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि ऐसी सरकार को सत्‍ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है। देश में किसी भी सरकार को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे नहीं लताड़ा है।' उन्‍होंने कांगेस को मोटी चमड़ी वाली पार्टी बताते हुए कहा कि इस पार्टी पर किसी कोर्ट की टिप्‍पणी का कुछ असर नहीं होता। 

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

फर्जी नहीं बटला हाउस एनकाउंटर, शहजाद हत्‍या का दोषी: कोर्ट

दिल्‍ली में पांच साल पहले हुए चर्चित बटला हाउस एनकाउंटर मामले में फैसला आ गया है. दिल्‍ली की साकेत कोर्ट ने कहा है कि एनकाउंटर फर्जी नहीं था. इसी के साथ कोर्ट ने इस मामले में गिरफ्तार इकलौते संदिग्‍ध आतंकी शहजाद उर्फ पप्‍पू को इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा की हत्‍या का दोषी माना है. अब सोमवार को सजा पर बहस होगी.
कोर्ट ने शहजाद को आईपीसी की धारा 302, 307, 186  और 120 बी के तहत दोषी करार दिया है. कोर्ट ने कहा कि शहजाद ने गोली मारकर इंस्‍पेक्‍टर मोहन शर्मा की हत्‍या की. यही नहीं उसने बाकी पुलिसवालों पर भी गोलियां चलाईं और हेड कॉन्‍स्‍टेबल बलवंत सिंह की हत्‍या की भी कोशिश की.
उधर, शहजाद के घरवालों ने कहा है कि कोर्ट के फैसले से नाखुश हैं. उनका कहना है कि उसे फंसाया गया है. उसके चाचा ने कहा है कि वे अब हाईकोर्ट में अपील करेंगे.
पांच साल पहले 19 सितंबर 2008 को जामिया नगर इलाके के बाटला हाउस में एक एनकाउंटर हुआ था, जिसमें दो आतंकी मारे गए थे. दिल्ली पुलिस के एक जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा भी शहीद हुए थे. दिल्ली पुलिस ने उस वक्त दावा किया था कि उसने उसी महीने दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के साजिशकर्ताओं का एनकाउंटर किया है, जबकि कुछ लोगों का कहना था कि यह मुठभेड़ फर्जी थी . लेकिन अब कोर्ट का यह फैसला दिल्ली पुलिस के लिए बड़ी राहत लेकर आया है. इस फैसले से एनकाउंटर को लेकर उठ रहे सवालों को खारिज कर दिया है.
अपनी चार्जशीट में पुलिस ने कहा था कि उस मुठभेड़ के दौरान शहजाद अपने दोस्त जुनैद के साथ बालकनी से कूदकर फरार हो गया था. पुलिस ने कहा था कि यह सभी आतंकवादी इंडियन मुजाहिदीन आतंकवादी संगठन से थे, जो अहमदाबाद और दिल्ली धमाकों में तो शामिल थे ही, उनकी प्लानिंग दिल्ली में तब और धमाके करने की थी. इस एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस ने मोहन चंद्र शर्मा जैसा अपना एक जांबाज सिपाही भी खोया, लेकिन इसके बाद भी यह एनकाउंटर काफी सवालों के घेरे में भी रहा समय-समय पर कुछ लोगों ने इसे फेक एनकाउंटर कहने में भी देर नहीं की.
अदालत ने 20 जुलाई को पुलिस और बचाव पक्ष की अंतिम जिरह पूरी होने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रखा था. सुनवाई के दौरान, शहजाद ने 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में हुए श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों के संबंध में वहां की साबरमती जेल में बंद सैफ और जीशान को बचाव पक्ष के गवाहों के तौर पर बुलाकर दावा किया था कि वह मौके पर नहीं था.
अभियोजन पक्ष ने दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा के छापामार दल में शामिल छह चश्मदीदों सहित 70 गवाहों से पूछताछ की थी. पुलिस ने कहा था कि उसके पास यह साबित करने के लिए पर्याप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य तथा फोन रिकार्ड हैं कि शहजाद जामिया नगर के फ्लैट में भी मौजूद था और निरीक्षक शर्मा सहित अन्य पुलिसकर्मियों पर गोली चलाने वालों में भी शामिल था.
पुलिस ने कहा था कि 19 सितंबर 2008 को मुठभेड़ के दौरान पुलिस दल पर गोलियां चलाने के बाद शहजाद और जुनैद बालकनी से कूदकर फरार हो गये थे. शहजाद के अधिवक्ता ने हालांकि दावा किया था कि उनका मुवक्क्लि उस फ्लैट में मौजूद नहीं था जहां गोलीबारी हुई थी.
बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया था कि बैलिस्टिक रिपोर्ट के अनुसार, दिवंगत पुलिस अधिकारी के शव से मिली गोलियां गिरफ्तारी के वक्त शहजाद के पास से कथित रूप से मिले हथियार से नहीं बल्कि घटनास्थल से जब्त बंदूक से मेल खाती हैं.
जानें क्‍या था बटला एनकांटर का पूरा घटनाक्रम
इंडियन मुजाहिद्दीन के संदिग्ध आतंकवादी शहजाद को 19 सितम्बर 2008 के बटला हाउस मुठभेड़ मामले में दिल्ली की एक अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने को लेकर सिलसिलेवार घटनाक्रम निम्नलिखित है.
19 सितम्बर, 2008: दिल्ली के जामिया नगर में बटला हाउस के एल-18 में छापेमारी करने वाले दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ और आईएम के संदिग्ध सदस्यों के बीच मुठभेड़ में पुलिस निरीक्षक एम. सी. शर्मा को अपनी जान गंवानी पड़ी. शहजाद एवं अन्य आरोपी जुनैद (अब घोषित भगोड़ा) फरार हो गए. दो संदिग्ध आतंकवादी आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद गोलीबारी में मारे गए जबकि आईएम के एक संदिग्ध सदस्य मोहम्मद सैफ ने आत्मसमर्पण कर दिया.
1 जून, 2010: शाहजाद को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से गिरफ्तार किया गया.
अप्रैल, 2010: मामले में दिल्ली की अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया गया. जुनैद को फरार घोषित कर दिया गया. आरोपपत्र में कहा गया कि मुठभेड़ 13 सितम्बर 2008 को करोल बाग, कनाट प्लेस, ग्रेटर कैलाश और इंडिया गेट पर हुए विस्फोट की जांच का हिस्सा थी. विस्फोटों में 26 लोग मारे गए थे और 133 जख्मी हुए थे.
15 फरवरी, 2011: अदालत ने शहजाद पर हत्या, हत्या का प्रयास, षड्यंत्र और इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए.
20 जुलाई, 2013: अदालत ने मामले में फैसला सुरक्षित रखा.
25 जुलाई, 2013: अदालत ने शहजाद को निरीक्षक एम. सी. शर्मा की हत्या और अन्य पुलिस अधिकारियों पर हमले का दोषी पाया. उसके खिलाफ सजा के लिए 29 जुलाई की तारीख तय की.aaj tak

सोमवार, 15 जुलाई 2013

दहेज प्रथा या वर-दक्षिणा

दहेज का अर्थ है जो सम्पत्ति, विवाह के समय वधू के परिवार की तरफ़ से वर को दी जाती है। दहेज को उर्दू में जहेज़ कहते हैं। यूरोपभारतअफ्रीका और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास है। भारत में इसे दहेजहुँडा यावरदक्षिणा के नाम से भी जाना जाता है तथा वधू के परिवार द्वारा नक़द या वस्तुओं के रूप में यह वर के परिवार को वधू के साथ दिया जाता है। संभवत: इस प्रथा को उन समाजों में महत्त्व प्राप्त हुआ होगा, जहाँ छोटी उम्र में विवाह प्रचलित रहे होंगे।

दहेज का उद्देश्य

दहेज का उद्देश्य नवविवाहित पुरुष को गृहस्थी जमाने में मदद करना था, जो अन्य आर्थिक संसाधनों के अभाव में शायद वह स्वयं नहीं कर सकता था। कुछ समाजों में दहेज का एक अन्य उद्देश्य था, पति की अकस्मात मृत्यु होने पर पत्नी को जीवन निर्वाह में सहायता देना। दहेज के पीछे एक अवधारणा यह भी रही होगी कि पति, विवाह के साथ आई ज़िम्मेदारी का निर्वाह ठीक तरह से कर सके। वर्तमान युग में भी दहेज नवविवाहितों के जीवन-निर्वाह में मदद के उद्देश्य से ही दिया जाता है।

वधू मूल्य

एक प्रतिरोधी प्रथा है 'वधू-मूल्य', वधू के परिवार द्वारा उसके बदले बहुमूल्य नक़द या वस्तुओं की प्राप्ति। अत: वधू-मूल्य एक प्रकार का विनिमय है। दहेज और वधू-मूल्य के बारे में एक विशिष्ट तथ्य यह है कि दहेज ऊँची जतियों में प्रचलित है, जबकि वधू-मूल्य प्रधानत: निम्न जातियों और जनजातियों (आदिवासियों) में प्रचलित है। वधू-मूल्य के बारे में यह तर्क है कि जाति व्यवस्था में निम्न जातियाँ (वैश्य और शूद्र) अधिकांश शारीरिक एवं तुच्छ समझे जाने वाले कार्य करती हैं, परिवार में आने वाली एक वधू का अर्थ है, आय एवं कार्य के लिए अतिरिक्त श्रम, जबकि दुल्हन के परिवार में एक कमाने वाले सदस्य की कमी हो जाती है। इसलिए वधू-मूल्य द्वारा इसकी क्षतिपूर्ति की जाती है।

दहेज का प्रयोग

दहेज का प्रयोग अक्सर न केवल विवाह के लिए स्त्री की वांछनीयता बढ़ाने के लिए हुआ है, बल्कि बड़े परिवारों में यह सत्ता और संपत्ति बढ़ाने और कई बार राज्यों की सीमा व नीतियों के निर्धारण का कारण बना है।

दहेज के सामाजिक प्रभाव

दहेज प्रथा के अनेक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव हैं तथा इसके कई सुनिश्चित विपरीत परिणाम हैं यद्यपि दहेज प्रथा दुनिया के अनेक देशों में प्रचलित है, परंतु भारत में इसने संकटपूर्ण स्थितियाँ निर्मित कर दी है। ढिंढोरा पीटा जाता है कि दहेज लेना या देना सामाजिक अपराध है और क़ानून द्वारा इसे प्रतिबंधित भी किया गया है, लेकिन यह बुराई जारी है। समाज के पढ़े-लिखे वर्ग में भी विवाह तय करते समय इसे चर्चा का आवश्यक अंग बनाया जाता है। विवाह के समय दहेज की वस्तुओं को सामाजिक हैसियत के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। वर-वधू के परिवारों के बीच कई बार दहेज को लेकर सहमति न होने पर रिश्ते टूट जाते हैं।

दहेज से हानि

दहेज प्रथा के वीभत्स प्रमाण हैं, प्रताड़ना की घटनाएँ, जो अंतत: नवविवाहित वधुओं की 'दहेज हत्या' के रूप में परिणता होती हैं। लड़कियों के साथ बुरे बर्ताव, भेदभाव तथा कन्या भ्रूण और कन्या शिशुओं की हत्या जैसे जघन्य कृत्यों के रूप में सामने आने वाले इसके दुष्परिणाम दहेज प्रथा की उस क्रूरता को प्रदर्शित करते हैं, जिसका सामना समाज को अब भी करना है।

बुधवार, 10 जुलाई 2013

नेताओं पर चला सुप्रीम कोर्ट का डंडा, लालू यादव हो सकते हैं पहले शिकार

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि अब कोई भी नेता जेल से चुनाव नहीं लड़ सकेगा। किसी कोर्ट में दोषी करार दिए जाने वाले जनप्रतिनिधियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनकी सदस्‍यता उसी क्षण से खत्‍म मानी जाएगी जिस क्षण कोई अदालत उन्‍हें किसी मामले में दोषी करार देगी।
 
पीपुल्‍स रिप्रेजेंटेटिव एक्‍ट की एक धारा के तहत किसी आपराधिक मामले में भी दोषी करार दिए जाने की स्थिति में सांसदों और विधायकों को अयोग्‍य करार दिए जाने के खिलाफ उन्‍हें मिली सुरक्षा के बारे में कानूनी प्रावधान को स्‍पष्‍ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि यह आदेश तत्‍काल प्रभाव से लागू होगा। यानी अब ट्रायल कोर्ट में भी दोषी करार दिए जाने पर सांसदों या विधायकों को सदस्‍यता छोड़नी पड़ेगी और कोई नेता जेल से चुनाव भी नहीं लड़ पाएगा। वैसे, जिन नेताओं ने सजा के खिलाफ अपील कर रखी है, उन पर यह फैसला अभी लागू नहीं होगा। 
 
क्‍या होगा असर
 
1. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर कई नेताओं पर हो सकता है। दो पूर्व रेल मंत्री और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव इसके पहले शिकार हो सकते हैं। चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में लालू के खिलाफ अदालत का फैसला जल्‍द ही आने वाला है। 
 
2. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद न्यायपालिका और विधायिका के बीच  टकराव के भी आसार बन गए हैं। नेता एक मत से संसद के जरिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरस्‍त कर सकते हैं। 
 
3. जयललिता का उदाहरण: तमिलनाडु की मुख्‍यमंत्री जयललिता को दो मामलों में क्रमश: दो और तीन साल की सजा हुई है। उन्‍होंने इसके खिलाफ अपील कर रखी है और इसी आधार पर वह मुख्‍यमंत्री बनी हुई हैं। लेकिन अब ऐसा संभव नहीं हो सकेगा। हालांकि फिलहाल के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिन नेताओं ने अपनी सजा के खिलाफ अपील कर रखी है, उन पर ताजा आदेश नहीं लागू होगा। लेकिन यह केवल पुराने मामलों में लागू होगा। अब नए केस में अपील के आधार पर कोई नेता ऐसा फायदा नहीं उठा पाएगा। पहले अदालती प्रक्रिया पूरी होने में देरी का फायदा उठा कर नेता अपना राजनीतिक कॅरियर सुरक्षित रख लिया करता था। सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला नेताओं की इस प्रवृत्ति पर रोक लगाएगा।
 
4. राजनीति का अपराधीकरण रुकेगा: इस फैसले से राजनीति का अपराधीकरण रोकने में मदद मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह ने खुशी जताई है। उन्होंने कहा है कि न्यायपालिका को यह कदम आजादी मिलने के बाद ही उठा लेना चाहिए था। sabhar>>db

आईएसआई के पूर्व प्रमुख ने लादेन को बताया हीरो, अमेरिका को सबसे बड़ा दुश्‍मन

इस्लामाबाद. पाकिस्‍तान में नौ सालों से अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के छिपे होने के बारे में खुलासा करते हुए आईएसआई के पूर्व प्रमुख हामिद गुल ने कहा है कि वह एक हीरा था और अमेरिका उसके लिए सबसे बड़ा दुश्‍मन था। इससे पहले एक रिपोर्ट में कहा गया कि लादेन खुफिया एजेंसियों की मिलीभगत के कारण पाकिस्तान में सुरक्षित था। सरकार ने लादेन की मौत की जांच के लिए आयोग बनाया था। इसकी 336 पेज की रिपोर्ट अल-जजीरा ने जारी की है। इस आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारी सरकार के अंदर तथा बाहर के तत्व लादेन से मिले हुए थे। हालांकि इस मामले में किसी भी व्यक्ति को दोषी नहीं पाया गया।’ पाकिस्तान सरकार ने एबटाबाद में लादेन को मार गिराने के लिए अमेरिकी कमांडो कार्रवाई के बाद एक जज की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया था। इसे मामले में हुई सुरक्षा संबंधी चूक का पता लगाना था। कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने पहले कहा था कि ओसामा को पाकिस्तान में शरण देने में खुफिया एजेंसियों का हाथ था। लेकिन पाकिस्तान सरकार ने उनका पुरजोर खंडन किया था। sabhar >dainik bhasker

गुरुवार, 20 जून 2013

उत्तराखंड में 500 सड़कें और 200 पुल बहे, जमीन में समा गए कई घर

नई दिल्‍ली. उत्‍तर भारत में मानूसन का कहर जारी है। देवभूमि उत्तराखंड में मंगलवार को मौसम खुला तो बर्बादी के गहरे जख्म दिखने लगे। रविवार को बादल फटने के बाद आई मंदाकिनी की बाढ़ ने केदारनाथ में भयानक तबाहीमचाई। केदारनाथ मंदिर का मुख्य द्वार बह गया। सिर्फ मुख्य मंदिर की इमारत बची है, वो भी मलबे में डूबी है। आसपास सबकुछ तबाह हो गया है। मंदिर प्रशासन ने कहा है कि मंदिर पूरी तरह सुरक्षित है। केदारनाथ में 40 होटल और पास का डेढ़ सौ दुकानों वाला रामबाड़ा बाजार मलबे में दबा है। हजार से अधिक लोग या तो लापता हैं या मारे गए हैं। केदारनाथ के समीप गौरीकुंड से 5000 लोग लापता हैं। 700 से ज्यादा खच्चर वाले भी लापता बताए जा रहे हैं। महंत स्‍वामी स्‍वरूपानंद शंकराचार्य इसे नदियों पर बांध बनाने का नतीजा बता रहे हैं। 
 
उत्तराखंड के बाढ़ प्रभावित इलाकों में हवाई दौरा कर लौटे पीएम मनमोहन सिंह ने मृतकों के परिजनों को एक लाख और घायलों के परिजनों 50 हजार देने की घोषणा की है। उन्होंने राज्य के लिए 1000 करोड़ की आपदा राहत राशि जारी करने की घोषणा की है।
 
 
बीजेपी नेता सुषमा स्‍वराज ने आरोप लगाया है कि 1000 से ज्‍यादा लोग मारे गए हैं और सरकार राहत-कार्य पर ध्‍यान नहीं दे रही है। बीजेपी ने उत्तराखंड में बाढ़ और भूस्खलन को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की भी मांग की है। सुषमा ने ट्वीट किया, 'उत्‍तराखंड में हजारों लोग मारे गए हैं। सरकार ने कोई राहत-कार्य नहीं किया है। उत्‍तराखंड से विपक्ष के नेता अजय भट्ट ने बताया है कि पूरी केदार घाटी तबाह हो गई है।' सरकार ने सुषमा के दावे का खंडन नहीं किया है। 
 
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बुधवार को बाढ़ से हुई तबाही के आकलन के लिए उच्चस्तरीय बैठक बुलाई है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की 12 टीमें उत्तराखंड के लिए रवाना हो चुकी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उत्तराखंड और हिमाचल के मुख्यमंत्रियों से बात की है। उत्‍तराखंड और हिमाचल में हालात का जायजा लेने के लिए पीएम और सोनिया आज खुद हवाई सर्वे भी करेंगे। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि आईटीबीपी की तीन बटालियनें उत्‍तराखंड भेजी गई हैं। बद्रीनाथ में स्‍पेशल कंट्रोल रूम स्‍थापित किया गया है। (बस गुंबद बच गया, तबाह हुआ पूरा केदारनाथ धाम)
 
शिंदे ने बताया कि आईटीबीपी ने 4000 लोगों को बचाया है जबकि 6400 लोगों को जोशीमठ में शरण दी है, हालांकि करीब 62 हजार तीर्थयात्री अब भी अलग-अलग जगहों पर फंसे हुए हैं। ऐसे लोगों के लिए खाने-पीने की चीजों का इंतजाम किया जा रहा है। आईटीबीपी के डीजी अजय चड्ढा ने बताया कि उत्‍तराखंड में अब भी कई ऐसे स्‍थान हैं जहां तक पहुंचा नहीं जा सका है। हालांकि इसके लिए कोशिशें जारी हैं। उत्‍तराखंड और हिमाचल में हालात की सूचना के लिए आईटीबीपी ने हेल्‍पलाइन नंबर शुरू किया है। ये हैं 011- 24362892, 9968383478 (नहीं चेते तो और बरपेगा कुदरत का कहर)
 
राहत कार्य में जुटे हेलीकॉप्‍टर के पायलट ए के दत्‍त के मुताबिक बद्रीनाथ में हालत खराब है। गोविंदघाट में हजारों गाडियां फंसी हैं। मौसम ठीक होता तो और भी लोगों को बचाया जा सकता था। उत्‍तराखंड प्रशासन 200 के मरने और 500 से अधिक के गायब होने की बात मान रहा है। फिलहाल सिर्फ जिंदा बचे लोगों को निकाला जा रहा है। बीजेपी अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है कि यह राष्‍ट्रीय आपदा है। इसमें हजारों लोगों की जान जाने की आशंका है। इससे पहले, बीजेपी नेता सुषमा स्‍वराज ने आरोप लगाया कि उत्‍तराखंड में 1000 से ज्‍यादा लोग मारे गए हैं। सुषमा ने ट्वीट किया, 'उत्‍तराखंड में हजारों लोग मारे गए हैं। सरकार ने कोई राहत-कार्य नहीं किया है। उत्‍तराखंड से विपक्ष के नेता अजय भट्ट ने बताया है कि पूरी केदार घाटी तबाह हो गई है।' सरकार ने सुषमा के दावे का खंडन नहीं किया है।

शुक्रवार, 3 मई 2013

सरबजीत की मौत का कारण टॉर्चर

लाहौर/नई दिल्ली। पाकिस्‍तान की जेलों में 22 साल गुजराने के बाद लाहौर के जिन्‍ना अस्‍पताल में आखिरी सांस लेने वाले सरबजीत सिंह का शव गुरुवार रात उनके पैतृक गांव भिखीविंड ले जाया गया। इससे पहले लाहौर से शव लेकर एयर इंडिया का विशेष विमान जब अमृतसर एयरपोर्ट पर उतरा तो वहां विदेश राज्‍य मंत्री परनीत कौर, पंजाब के डिप्‍टी सीएम सुखबीर सिंह बादल और पंजाब कांग्रेस के अध्‍यक्ष प्रताप सिंह बाजवा समेत कई नेता मौजूद रहे। लेकिन सरबजीत का शव लेकर लाहौर एयरपोर्ट से इस विमान के उड़ान भरने में वहां के अधिकारियों की वजह से देरी हुई। सरबजीत की लाश को भारत भेजते समय आखिरी वक्‍त में पाकिस्‍तान की लालफीताशाही आड़े आई। पहले पाकिस्‍तान के कस्‍टम अधिकारियों ने सरबजीत का शव भारत भेजने से रोका, फिर वहां की एंटी नारकोटिक्‍स फोर्स ने अड़ंगा डाला।
            कस्‍टम अधिकारी शव को भारत भेजने से पहले एनओसी, पोस्‍टमॉर्टम रिपोर्ट और पुलिस रिपोर्ट मांग रहे थे। पाकिस्‍तानी अधिकारी विदेश मंत्रालय से भी क्लियरेंस मांग रहे थे। इसके बाद एंटी नारकोटिक्‍स टीम ने सरबजीत का शव भारत भेजने की मंजूरी देने से पहले हॉस्पिटल की तरफ से क्लियरेंस की मांग की। इस तरह सरबजीत का शव लेने गया एयर इंडिया का विशेष विमान एयरबस 319 लाहौर एयरपोर्ट पर करीब तीन घंटे से अधिक समय तक खड़ा रहा। कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद शव को भारतीय विमान में रखा जा सका। (57 पाकिस्तानी कैदियों को भारतीय कैदियों से अलग किया)
 
सरबजीत को शव को पोस्‍टमॉर्टम के लिए पहले पट्टी ले जाया जाएगा। इसके बाद शव को परिजनों को सौंप दिया जाएगा। सरबजीत का परिवार दिल्‍ली से विमान के जरिये अमृतसर और फिर वहां से हेलिकॉप्‍टर के जरिये भिखीविंड पहुंचा जहां कल दोपहर दो बजे सरबजीत का अंतिम संस्कार होगा। लाहौर के जिन्‍ना अस्‍पताल में सरबजीत के शव की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सरबजीत की मौत का कारण टॉर्चर को बताया गया है। पोस्टमार्टम के बाद शव भारतीय अधिकारियों को सौंप दिया गया। गत 26 अप्रैल को कोट लखपत जेल में पाकिस्‍तानी कैदियों के हमले में सरबजीत को गंभीर चोट आई थी जिसके बाद उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती कराना पड़ा था। गुरुवार आधी रात के बाद करीब डेढ़ बजे सरबजीत के मौत की खबर आई। 
 
इस बीच, जीते जी सुध नहीं लेने वाली सरकार मरने के बाद सरबजीत और उनके परिवार वालों पर कृपा बरसा रही है। मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री राहत कोष से सरबजीत के परि‍वार वालों को 25 लाख रुपये देने की घोषणा की तो पंजाब सरकार ने एक करोड़ रुपये देने का ऐलान कर दिया। पंजाब सरकार सरबजीत को शहीद का दर्जा देने के साथ सरबजीत की बेटियों को सरकारी नौकरी भी देगी। सरबजीत का अंतिम संस्‍कार भी पूरे राजकीय सम्‍मान के साथ किया जाएगा। पंजाब में तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की गई है।

नेहरू खानदान का धार्मिक एवं चारित्रिक सच.. जरूर पढ़ें

इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू राजवंश में अनैतिकता को नयी ऊँचाई पर पहुचाया. बौद्धिक इंदिरा को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भर्ती कराया गया था लेकिन वहाँ से जल्दी ही पढाई में खराब प्रदर्शन के कारण बाहर निकाल दी गयी.... उसके बाद उनको शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय में भर्ती कराया गया था, लेकिन गुरु देव रवीन्द्रनाथ टैगोर उसके दुराचरण के लिए बाहर कर दिया .

शान्तिनिकेतन से बहार निकाले जाने के बाद इंदिरा अकेला हो गयी. राजनीतिज्ञ के रूप में पिता राजनीति के साथ व्यस्त था और मां तपेदिक के स्विट्जरलैंड में मर रही थी. उनके इस अकेलेपन का फायदा फ़िरोज़ खान नाम के व्यापारी ने उठाया. फ़िरोज़ खान मोतीलाल नेहरु के घर पे मेहेंगी विदेशी शराब की आपूर्ति किया करता था. फ़िरोज़ खान और इंदिरा के बीच प्रेम सम्बन्ध स्थापित हो गए. महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल डा. श्रीप्रकाश नेहरू ने चेतावनी दी, कि इंदिरा फिरोज खान के साथ अवैध संबंध रहा था. फिरोज खान इंग्लैंड में तो था और इंदिरा के प्रति उसकी बहुत सहानुभूति थी. जल्द ही वह अपने धर्म का त्याग कर, एक मुस्लिम महिला बनीं और लंदन के एक मस्जिद में फिरोज खान से उसकी शादी हो गयी. इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू ने नया नाम मैमुना बेगम रख लिया. उनकी मां कमला नेहरू इस शादी से काफी नाराज़ थी जिसके कारण उनकी तबियत और ज्यादा बिगड़ गयी. नेहरू भी इस धर्म रूपांतरण से खुश नहीं थे क्युकी इससे इंदिरा के प्रधानमंत्री बन्ने की सम्भावना खतरे में आ गयी.

तो, नेहरू ने युवा फिरोज खान से कहा कि अपना उपनाम खान से गांधी कर लो. परन्तु इसका इस्लाम से हिंदू धर्म में परिवर्तन के साथ कोई लेना - देना नहीं था. यह सिर्फ एक शपथ पत्र द्वारा नाम परिवर्तन का एक मामला था. और फिरोज खान फिरोज गांधी बन गया है, हालांकि यह बिस्मिल्लाह सरमा की तरह एक असंगत नाम है. दोनों ने ही भारत की जनता को मूर्ख बनाने के लिए नाम बदला था. जब वे भारत लौटे, एक नकली वैदिक विवाह जनता के उपभोग के लिए स्थापित किया गया था. इस प्रकार, इंदिरा और उसके वंश को काल्पनिक नाम गांधी मिला. नेहरू और गांधी दोनों फैंसी नाम हैं. जैसे एक गिरगिट अपना रंग बदलती है, वैसे ही इन लोगो ने अपनी असली पहचान छुपाने के लिए नाम बदले.

इंदिरा गांधी के दो बेटे राजीव गांधी और संजय गांधी थे . संजय का मूल नाम संजीव था क्युकी राजीव और संजीव सुनने में अच्छे लगते थे. संजीव ब्रिटेन में कार चोरी करने के आरोप में गिरफ्तार हुआ और उसका पासपोर्ट जब्त किया गया. इंदिरा गांधी की दिशा निर्देश में, भारतीय राजदूत कृष्णा मेनन अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर संजीव से उसका नाम संजय करवा दिया और एक नया पासपोर्ट संजय गाँधी के नाम से बनवा दिया.

यह एक ज्ञात तथ्य यह है कि राजीव के जन्म के बाद, इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी अलग - अलग रहते थे, लेकिन उन्होंने छवि ख़राब होने के कारण तलाक नहीं लिया. के.एन. राव की पुस्तक "नेहरू राजवंश" (10:8186092005 ISBN) में यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है संजय गांधी फ़िरोज़ गांधी का पुत्र नहीं था, जिसकी पुष्टि के लिए उस पुस्तक में अनेक तथ्यों को सामने रखा गया है. उसमे यह साफ़ तौर पे लिखा हुआ है की संजय गाँधी एक और मुस्लिम मोहम्मद यूनुस नामक सज्जन का बेटा था.

दिलचस्प बात यह है की एक सिख लड़की मेनका का विवाह भी संजय गाँधी के साथ मोहम्मद यूनुस के घर में ही हुआ था. यूनुस शादी से नाखुश था क्युकी वह अपनी बहू के रूप में अपनी पसंद की एक मुस्लिम लड़की के साथ उसकी शादी करना चाहता था. मोहम्मद यूनुस ही वह व्यक्ति था जो संजय गाँधी की विमान दुर्घटना के बाद सबसे ज्यादा रोया था. 'यूनुस की पुस्तक "व्यक्ति जुनून और राजनीति" (persons passions and politics )(ISBN-10: 0706910176) में साफ़ लिखा हुआ है की संजय गाँधी के जन्म के बाद उनका खतना पूरे मुस्लिम रीति रिवाज़ के साथ किया गया था.

यह एक तथ्य है कि संजय गांधी लगातार अपनी माँ इंदिरा को ब्लाच्क्मैल करते थे की वह उनको असली पिता के बारे में बताये. संजय का अपनी माँ पर एक गहरा भावनात्मक नियंत्रण था जिसका वह अक्सर दुरोपयोग करते थे. इंदिरा गांधी संजय के कुकर्मों की अनदेखी करती थी और संजय परोक्ष रूप से सरकार नियंत्रित करता था.

जब संजय गांधी की मृत्यु की खबर इंदिरा गांधी के पास पहुची तो इंदिरा का पहला सवाल था "संजय की चाभी और घडी कहाँ है ??". नेहरू - गांधी वंश के बारे में कुछ गहरे रहस्य उन चीजों में छुपे थे. विमान दुर्घटना का होना भी आज तक एक रहस्य ही है. यह एक नया विमान था जो गोता मारकर जमीन पर गिरा और उसमे तब तक कोई विस्फोट या आग नहीं थी जब तक वह जमीन पर नहीं गिरा. यह तब होता है जब विमान में ईंधन ख़त्म हो जाता है. लेकिन उड़ान रजिस्टर से पता चलता है कि ईंधन टैंक उड़ान से पहले फुल किया गया था. इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुचित प्रभाव का उपयोग कर इस दुर्घटना की जांच होने से रोक ली जो अपने आप में संदेहास्पद है.

कैथरीन फ्रैंक की पुस्तक "the life of Indira Nehru Gandhi (ISBN: 9780007259304) में इंदिरा गांधी के अन्य प्रेम संबंधों के कुछ पर प्रकाश डाला है. यह लिखा है कि इंदिरा का पहला प्यार शान्तिनिकेतन में जर्मन शिक्षक के साथ था. बाद में वह एमओ मथाई, (पिता के सचिव) धीरेंद्र ब्रह्मचारी (उनके योग शिक्षक) के साथ और दिनेश सिंह (विदेश मंत्री) के साथ भी अपने प्रेम संबंधो के लिए प्रसिद्द हुई.
पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने इंदिरा गांधी के मुगलों के लिए संबंध के बारे में एक दिलचस्प रहस्योद्घाटन किया अपनी पुस्तक "profiles and letters " (ISBN: 8129102358) में किया. यह कहा गया है कि 1968 में इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री के रूप में अफगानिस्तान की सरकारी यात्रा पर गयी थी . नटवर सिंह एक आईएफएस अधिकारी के रूप में इस दौरे पे गए थे. दिन भर के कार्यक्रमों के होने के बाद इंदिरा गांधी को शाम में सैर के लिए बाहर जाना था . कार में एक लंबी दूरी जाने के बाद, इंदिरा गांधी बाबर की कब्रगाह के दर्शन करना चाहती थी, हालांकि यह इस यात्रा कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया. अफगान सुरक्षा अधिकारियों ने उनकी इस इच्छा पर आपत्ति जताई पर इंदिरा अपनी जिद पर अड़ी रही . अंत में वह उस कब्रगाह पर गयी . यह एक सुनसान जगह थी. वह बाबर की कब्र पर सर झुका कर आँखें बंद करके कड़ी रही और नटवर सिंह उसके पीछे खड़े थे . जब इंदिरा ने उसकी प्रार्थना समाप्त कर ली तब वह मुड़कर नटवर से बोली "आज मैंने अपने इतिहास को ताज़ा कर लिया (Today we have had our brush with history ". यहाँ आपको यह बता दे की बाबर मुग़ल साम्राज्य का संस्थापक था, और नेहरु खानदान इसी मुग़ल साम्राज्य से उत्पन्न हुआ. इतने सालो से भारतीय जनता इसी धोखे में है की नेहरु एक कश्मीरी पंडित था....जो की सरासर गलत तथ्य है.
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यह गिनती करना मुश्किल है आज कितने उच्च शिक्षा के संस्थानों कैसे राजीव गांधी के नाम पर चल रहे हैं लेकिन सच यह है की खुद राजीव गांधी कम क्षमता का एक व्यक्ति था. 1962 से 1965 तक, वह ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज में एक यांत्रिक अभियांत्रिकी पाठ्यक्रम के लिए नामांकित किया गया था. लेकिन, वह कैम्ब्रिज की डिग्री के बिना छोड़ दिया, क्योंकि वह परीक्षा पारित नहीं कर सका. अगले साल 1966 में, वह इंपीरियल कॉलेज, लंदन, गया लेकिन यहाँ भी डिग्री के बिना ही उनको जाना पड़ा.

ऊपर में के.एन. राव ने कहा कि पुस्तक का आरोप है कि राजीव गांधी एक कैथोलिक बन गए सानिया माइनो शादी करने के लिए. राजीव रॉबर्टो बन गया. उनके बेटे का नाम Raul और बेटी का नाम Bianca है. काफी चतुराई से एक ही नाम राहुल और प्रियंका के रूप में भारत के लोगों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं.

व्यक्तिगत आचरण में राजीव हमेशा ही एक मुगल राजा की तरह था. वह 15 अगस्त 1988 को लाल किले की प्राचीर से गरज कर बोला था : "हमारा प्रयास भारत को 250-300 साल पहले वाली ऊंचाई तक ले जाने के लिए होना चाहिए". यह तो औरंगजेब और उसके जेज़िया गुरु का शाशन काल था जो की नंबर एक का मंदिर विध्वंसक था. "

भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के बाद लन्दन में उनका पत्रकार सम्मेलन बहुत जानकारीपूर्ण था. इस पत्रकार सम्मेलन में राजीव दावा है कि वह एक पारसी है और हिन्दू नहीं है . फिरोज खान के पिता और राजीव गांधी के पैतृक दादा गुजरात के जूनागढ़ क्षेत्र से एक मुस्लिम सज्जन था. नवाब खान के नाम से यह मुस्लिम पंसारीने एक पारसी महिला को मुस्लिम बनाकर उससे शादी की थी. इस स्रोत से पता चलता है की वोह अपने आप को पारसी क्यों कहते थे. ध्यान रहे कि उनका कोई पारसी पूर्वज नहीं था . उनकी दादी ने पारसी धर्म को त्याग दिया और नवाब खान शादी के बाद मुस्लिम बन गयी थी . हैरानी की बात है, पारसी राजीव गांधी का वैदिक संस्कार के अनुसार भारतीय जनता का पूरा ध्यान में रखते हुए अंतिम संस्कार किया गया था.

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डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी लिखते हैं कि सोनिया गांधी के नाम एंटोनिया माइनो था. उसके पिता एक मेसन था. वह कुख्यात इटली के फासिस्ट शासन के एक कार्यकर्ता था और वह रूस में पांच साल की कैद की सेवा की. वास्तव में सोनिया गांधी ने कभी पांचवी कक्षा के ऊपर अध्ययन नहीं किया है. वह एक अंग्रेजी शिक्षण कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय परिसर में लेनोक्स स्कूल नाम की दुकान से कुछ अंग्रेजी सीखी है. इस तथ्य से वह प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन करने का दावा करती थी परन्तु जब डॉक्टर स्वामी ने उनके इस झूठ पर प्रश्न किये, तो सोनिया ने चुप्पी साध ली और बाद में कह दिया की उनके द्वारा cambridge university में डिग्री की बात एक "प्रिंटिंग मिस्टेक" है. उसके बाद सोनिया ने कभी cambridge university में पढने की बात नहीं स्वीकारी. सत्य यह है की कुछ अंग्रेजी सीखने के बाद, वह कैम्ब्रिज शहर में एक रेस्तरां में एक वेट्रेस थी .

सोनिया गांधी ब्रिटेन में जिस रेस्तरां में एक वेट्रेस थी वहां माधवराव सिंधिया अक्सर आते थे क्युकी वह उस समय cambridge में शिक्षा ले रहे थे. माधवराव सिंधिया से सोनिया के गर्म रिश्ते थे जो उसकी शादी के बाद भी जारी रहे . 1982 की एक रात 2 बजे आईआईटी दिल्ली मुख्य गेट के पास एक दुर्घटना हुई थी, जिसमे पुलीस ने श्री सिंधिया के साथ सोनिया को नशे की हालत में कार से बाहर निकाला था.

जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब प्रधानमंत्री के सुरक्षा कर्मी नई दिल्ली और चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों में प्राचीन मंदिर की मूर्तियां, और अन्य प्राचीन वस्तुओं को भारतीय खजाने के बक्सों में इटली भेजने जाते थे. मुख्यमंत्री और बाद में संस्कृति प्रभारी मंत्री के रूप में अर्जुन सिंह इस लूट का आयोजन करते थे. सीमा से अनियंत्रित, वे इटली में पहुंचा दिए जाते थे जहाँ उन्हें Etnica और Ganpati नाम के दो शो रूम्स में बेचा जाता था. ये दोनों शो रूम्स सोनिया गांधी की बहन Alessandra माइनो विंची के नाम पर हैं.

इंदिरा गांधी की मृत्यु उसके दिल या दिमाग में गोलियों के कारण नहीं हुई बल्कि वह खून की कमी के कारण मरी थी. इंदिरा गाँधी को गोली लगने के बाद जब उनका काफी खून बह चूका था उस समय सोनिया ने अजीब जोर देकर कहा है कि खून बह रहा इंदिरा गांधी को डा. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में ले जाया जाना चाहिए ना की एम्स में जो एक आपात प्रोटोकॉल के लिए और ठीक इस तरह की घटनाओं के इलाज के लिए उपयुक्त है. इस प्रकार 24 बहुमूल्य मिनट बर्बाद कर दिए गए . यह संदिग्ध है कि यह सोनिया गांधी की अपरिपक्वता या तेजी से सत्ता में उसके पति को लाने के लिए एक चाल थी.

राजेश पायलट और माधव राव सिंधिया के प्रधानमंत्री के पद के लिए मजबूत दावेदार थे और वे सोनिया गांधी के सत्ता के लिए अपने रास्ते में पत्थर थे. उन दोनों के रहस्यमय दुर्घटनाओं में मृत्यु हो गई.

इस बात के प्रचुर तथ्य मौजूद हैं की मायिनो परिवार ने लिट्टे के साथ अनुबंध किया था जिससे उनकी राजीव हत्याकांड में भूमिका संदेहास्पद बनती है . आजकल, सोनिया गांधी काफी एमडीएमके, पीएमके और द्रमुक जैसे जो राजीव गांधी के हत्यारों की स्तुति के साथ राजनीतिक गठबंधन में अडिग है. कोई भारतीय विधवा कभी अपने पति के हत्यारों के साथ ऐसा नहीं कर सकती. ऐसी परिस्थितियों में कई हैं, और एक शक बढ़ा. राजीव की हत्या में सोनिया की भागीदारी में एक जांच आवश्यक है. (ISBN 81-220-0591-8) - तुम डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी पुस्तक "आशातीत प्रश्न और अनुत्तरित प्रश्न राजीव गांधी की हत्या पढ़ सकते हैं. यह इस तरह के षड्यंत्र का संकेत होता है.

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इटली के कानून के अनुसार राहुल और प्रियंका इटालियन नागरिक हैं क्युकी उन दोनों के जन्म के समय सोनिया गाँधी एक इटालियन नागरिक थी. 1992 में, सोनिया गांधी इतालवी नागरिकता कानून के अनुच्छेद 17 के तहत इटली की उसकी नागरिकता को पुनर्जीवित किया . राहुल गांधी के इतालवी उसकी हिन्दी की तुलना में बेहतर है. राहुल गांधी एक इतालवी नागरिक तथ्य यह है कि 27 सितंबर 2001 को वह एक इतालवी पासपोर्ट पर यात्रा करने के लिए बोस्टन हवाई अड्डे, संयुक्त राज्य अमेरिका में एफबीआई द्वारा गिरफ्तार किया गया था से प्रासंगिक है. यदि भारत में एक कानून बना है कि कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर विदेशी मूल के एक व्यक्ति को नहीं लाया जा सकता तो राहुल गांधी को स्वचालित रूप से प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य हैं.

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स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद, राहुल गांधी नई दिल्ली में सेंट स्टीफंस कॉलेज में प्रवेश मिल गया, योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि राइफल शूटिंग के खेल कोटे पर. 1989-90 में कुछ दिन दिल्ली में रहने के बाद राहुल ने 1994 में रोलिंस कॉलेज फ्लोरिडा जो एक christianचैरिटी द्वारा चलाया जाने वाला सी ग्रेड का कॉलेज है , से बी.ए. किया. बस एक बीए करने के लिए अमेरिका जाने की ज़रूरत किसी को नहीं होती. इसलिए अगले ही वर्ष, 1995 में उसे एम. फिल मिला ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज से . इस डिग्री की वास्तविकता आप इसी से समझ सकते हैं की उन्हें ये डिग्री बिना एमए किये हुवे मिल गयी. इसके पीछे Amaratya सेन की मदद का हाथ माना जाता है. आप में से कई मशहूर फिल्म 'मुन्नाभाई एमबीबीएस " देख ही चुके हैं .

2008 में राहुल गांधी ने कानपुर में चन्द्र शेखर आजाद विश्वविद्यालय के छात्रों की रैली के लिए एक सभागार का उपयोग करने से रोका गया था. बाद में, विश्वविद्यालय के कुलपति वी.के. सूरी, को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल द्वारा अपदस्थ किया गया था. 26/11 के दौरान जब पूरे देश के बारे में कैसे मुंबई आतंक से निपटने के लिए तनाव में था, राहुल गांधी आराम से प्रातः 5 बजे तक अपने दोस्तों के साथ जश्न मना रहा था . राहुल गांधी कांग्रेस के सदस्यों के लिए तपस्या की सलाह है. वे कहते हैं, यह सभी नेताओं का कर्तव्य है तपस्या हो. दूसरी ओर वह एक पूरी तरह सुसज्जित जिम वाले एक मंत्री वाले बंगला में रहते हैं . इसके अलावा वह दिल्ली के दो सबसे मेहेंगे ५ स्टार जिम के नियमित सदस्य भी हैं, राहुल गांधी की चेन्नई यात्रा 2009 में तपस्या के लिए अभियान के लिए पार्टी के 1 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किये . इस तरह की विसंगतियों से पता चलता है कि राहुल गांधी द्वारा की गई पहलों का कितना महत्व है.
2007 उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान के दौरान राहुल गांधी ने कहा कि "अगर नेहरू - गांधी परिवार का कोई भी सदस्य उस समय सक्रिय होता तो बाबरी मस्जिद कभी न गिरती."
इस कथन से उनका अपने पूर्वजों के लिए एक वफादारी के रूप में अपने मुसलमान संबद्धता का पता चलता है.
31 दिसंबर, 2004 को जॉन एम., itty, केरल के अलाप्पुझा जिले में एक सेवानिवृत्त कॉलेज के प्रोफेसर, दलील देते है कि केरल में एक रिसॉर्ट में तीन दिनों के लिए एक साथ रहने के लिए राहुल गांधी और उसकी प्रेमिका Juvenitta उर्फ वेरोनिका के खिलाफ कार्रवाई लिया जाना चाहिए. यह अनैतिक तस्करी अधिनियम के तहत एक आपराधिक अपमान के रूप में वे शादी नहीं कर रहे. वैसे भी, एक और विदेशी बहू के सहिष्णु भारतीयों पर राज कर रही है.

स्विस पत्रिका Schweizer है Illustrierte 11 वीं नवम्बर 1991 अंक से पता चला है कि राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी द्वारा नियंत्रित अमेरिकी 2 अरब डॉलर के लायक खातों के लाभार्थी था. 2006 में स्विस बैंकिंग एसोसिएशन से एक रिपोर्ट से पता चला है कि भारतीय नागरिकों की संयुक्त जमा के रूप में अभी तक किसी भी अन्य देश, 1.4 खरब अमरीकी डॉलर का एक कुल, एक भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से अधिक का आंकड़ा अधिक से अधिक कर रहे हैं. इस राजवंश ने भारत के आधे से अधिक नियम. केंद्र की उपेक्षा कर, बाहर के 28 राज्यों और 7 संघ शासित प्रदेशों की, उनमें से आधे से अधिक समय के किसी भी बिंदु पर कांग्रेस सरकार है. तक राजीव गांधी ने भारत में मुगल शासन के साथ सोनिया गांधी, रोम भारत पर शासन करना शुरू कर दिया था.

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इस लेख लिखने के पीछे उद्देश्य भारतीय नागरिको को उनके प्रिय नेताओ के बारे में जागरूक करना है और यह बताना है की किस तरह एक परिवार सदियों से इस देश को खोकला करता आ रहा है और हम भारतीय चुपचाप उनकी गुलामी करते जा रहे हैं. सबूत के समर्थन की कमी की वजह से इस लेख में कई अन्य चौंकाने वाला तथ्य नहीं प्रस्तुत कर रहे हैं.
इन सभी तथ्यों की पुष्टि के लिए आप डॉक्टर सुभ्रमनियम स्वामी की पुस्तकों या उनकी वेबसाइट देख सकते हैं.

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

सरबजीत को फांसी देकर भारत से बदला निकालेगा पाक!

इस्लामाबाद. क्या कसाब की फांसी के बाद पाकिस्तान भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह को फांसी देकर भारत से बदला निकाल सकता है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति के ऑफिस के जुड़े सूत्रों की माने तो इससे पाकिस्तान सरकार पर सरबजीत को फांसी देने के लिए दबाव बन सकता है।
पाक की ओर से जारी बयान में अधिकारियों ने कहा कि हम भारत की न्याय प्रक्रिया की इज्जत करते हैं। हमें उम्मीद है कि यह सब एक न्यायोचित प्रक्रिया के तहत किया गया है। उन्होंने बताया कि भारतीय राष्ट्रपति ने इस मामले पर फैसला लेने में काफी जल्दबाजी की है और आखिरी समय तक यह फैसला छिपा कर रखा गया।
लेकिन अब इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सरबजीत सिंह की भी दया याचिका भी खारिज कर दी जाए। 49 वर्षीय सरबजीत सिंह पर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बम धमाके करने का आरोप है, जिसमें 14 लोग मारे गए। इस पर उसे मौत की सजा सुनाई जा चुकी है।
पाकिस्तान सरकार की तरफ़ से भी एक सधी प्रतिक्रिया में कहा गया है कि पाकिस्तान हर तरह की चरमपंथी कार्रवाईयों का विरोध करता है.

 
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मोअज़्ज़म अली ख़ान ने कहा कि चरमपंथ के मुद्दे पर पाकिस्तान की नीति बिल्कुल साफ़ है और उसने हमेशा हर तरह की चरमपंथी कार्रवाईयों का विरोध किया है. एक बयान जारी कर पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा, आतंकवाद के अभिशाप को इस पूरे क्षेत्र से समाप्त करने के लिए हम सभी देशों के साथ मिलकर काम करने के इच्छुक हैं.
 
पाकिस्तानी प्रवक्ता का कहना था कि मंगलवार को इस्लामाबाद स्थित भारतीय दूतावास के उपउच्चायुक्त ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के दफ़्तर जाकर कसाब की फांसी के संबंध में कुछ दस्तावेज़ दिए थे जिसे दक्षिण एशिया के महानिदेशक ने स्वीकार किया था
sabhar-dainik bhasker

कोमा में सरबजीत: ब्रेन हेमरेज का खतरा, भारत ने दर्ज कराई शिकायत

 

लाहौर क्षेत्र के डीआईजी (जेल) मलिक मुबाशर खान पूरे मामले की जांच कर रहे हैं। भारतीय उच्चायोग के दो अधिकारी इस्‍लामाबाद से सरबजीत के पास पहुंच गए हैं। सरबजीत की बहल दलबीर कौर भी वहां जाना चाह रही हैं। उन्‍होंने कहा कि मैंने सभी से कहा था कि वह सुरक्षित नहीं है। सरबजीत पर हमला पहले से सुनयोजित था। उसे मारने की कोशिश की जा रही है। उन्‍होंने कहा, 'हम आज ही पाकिस्‍तान जाना चाहते हैं। हमें आज ही वीजा मिलना चाहिए।' वह काफी सदमे में हैं और उनकी तबीयत भी बिगड़ गई है। अमृतसर में उनका इलाज चल रहा है।
सरबजीत पर हमले से उनकी पत्नी सुखप्रीत कौर और बेटी पूनमदीप कौर का रो-रोकर बुरा हाल है। पूनमदीप ने कहा है कि सरकार ने मेरे पिता के समुचित इलाज कराने की व्यवस्था नहीं कि तो मैं आत्मदाह कर लूंगी। सुखप्रीत का कहना है कि उनके पति पर साजिश के तहत हमला किया गया है।


गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

गोधरा कांड की इस सच्चाई को आग की तरह फैलाएं, ताकि सच्चाई सब तक पहुँच सके- संदीप पुण्ढीर

एक बार इसे पढ़े जरुर.....

गोधरा कांड की इस सच्चाई को आग की तरह फैलाएं, ताकि सच्चाई सबतक पहुँच सके,

 क्या आप सचमुच में जानते हैं कि..... गुजरात दंगे का सच क्या है.....??????

     यह सच हर भारतीय को पता होना चाहिए...
दरअसल ..... आज जहाँ देखो वहाँ गुजरात के दंगो के बारे में ही सुनने और
देखने को मिलता है... फिर चाहे वो गूगल हो या फेसबुक .. हो या फिर
टीवी...! रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं..... रोज गुजरात की सरकार को कटघरे
में खड़ा किया जाता है...!

 असल में..... सबका निशाना केवल एक नरेन्द्र भाई मोदी.....क्योंकि, वे हम
हिन्दुओं के चहेते हैं... जिस कारण कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम तथा सेकुलर जी-
जान से इस काम में जुटे हैं...! जिसे देखो... वो अपने को जज दिखाता
है.... हर कोई सेकुलरता के नाम पर एक ही स्वर में गुजरात दंगो की
भर्त्सना करते हैं..... हालाँकि, मै भी दंगो को गलत मानता हूँ क्योंकि
दंगे सिर्फ दर्द दे कर जाते हैं ...! लेकिन......

 सबसे बड़ा सवाल यह है कि.....गुजरात दंगा हुआ क्यों..........? 27 फरवरी
2002 को साबरमती ट्रेन के S6 बोगी को गोधरा रेलवे स्टेशन से करीब 826
मीटर की दुरी पर जला दिया गया था....जिसमे 57 मासूम, निहत्थे और निर्दोष
हिन्दू कारसेवकों की मौत हो गयी थी... ! प्रथम द्रष्टा रहे वहाँ के 14
पुलिस के जवान जो उस समय स्टेशन पर मौजूद थे.. और उनमे से 3 पुलिस वाले
घटना स्थल पर पहुंचे और साथ ही पहुंचे अग्नि शमन दल के एक जवान सुरेशगिरी
गोसाई जी....! अगर हम इन चारो लोगों की मानें तो "म्युनिसिपल काउंसिलर
हाजी बिलाल" भीड़ को आदेश दे रहे थे.... ट्रेन के इंजन को जलाने
का......! साथ ही साथ.... जब ये जवान आगबुझाने की कोशिश कर रहे थे.....
तब भीड़ के द्वारा ट्रेन पर पत्थरबाजी चालू कर दी गई ......! अब इसके आगे
बढ़ कर देखें तो.... जब गोधरा पुलिस स्टेशन की टीम पहुंची तब 2 लोग 10
,000 की भीड़ को उकसा रहे थे.... ये थे म्युनिसिपल प्रेसिडेंट मोहम्मद
कलोटा और म्युनिसिपल काउंसिलर हाजी बिलाल.....!अब सवाल उठता है कि.....
मोहम्मद कलोटा और हाजी बिलाल को किसने उकसाया और ये ट्रेन को जलाने क्यों
गए......????? सवालो के बाढ़ यही नहीं रुकते हैं..... बल्कि सवालो की
लिस्ट अभी काफी लम्बी है...... अब सवाल उठता है कि .... क्यों मारा गया
ऐसे राम भक्तो को......??? कुछ मीडिया ने बताया की ये मुसलमानों को
उकसाने वाले नारे लगा रहे….अब क्या कोई बताएगा कि .....क्या भगवान राम के
भजन मुसलमानों को उकसाने वाले लगते हैं......????? लेकिन इसके पहले भी एक
हादसा हुआ 27 फ़रवरी 2002 को सुबह 7 .43 मिनट 4 घंटे की देरी से जैसे ही
साबरमती ट्रेन चली और प्लेटफ़ॉर्म छोड़ा तो... प्लेटफ़ॉर्म से 100 मीटर
की दुरी पर ही 1000 लोगो की भीड़ ने ट्रेन पर पत्थर चलाने चालू कर दिए
.....! पर, यहाँ रेलवे की पुलिस ने भीड़ को तितर- बितर कर दिया और ट्रेन
को आगे के लिए रवाना कर दिया.....! लेकिन, जैसे ही ट्रेन मुश्किल से 800
मीटर चली...... अलग-अलग बोगियों से कई बार चेन खींची गई....! बाकी की
कहानी जिस पर बीती उसकी जुबानी.......... उस समय मुश्किल से से 15-16 की
बच्ची की जुबानी......... ये बच्ची थी कक्षा 11 में पढने वाली गायत्री
पंचाल जो कि उस समय अपने परिवार के साथ अयोध्या से लौट रही थी .... उसकी
मानें तो... ट्रेन में राम धुनचल रहा था और ट्रेन जैसे ही गोधरा से आगे
बढ़ी ..... एक दम से चेन खींच कर रोक दिया गया ...! उसके बाद देखने में
आया कि ... एक भीड़ हथियारों से लैस हो कर ट्रेन की तरफ बढ़ रही है.....!
हथियार भी कैसे....... लाठी- डंडा नहीं बल्कि.... तलवार, गुप्ती, भाले,
पेट्रोल बम्ब, एसिड बम और पता नहीं क्या क्या.........! भीड़ को देख कर
ट्रेन में सवार यात्रियों ने खिड़की और दरवाजे बंद कर लिए.......! पर
भीड़ में से जो अन्दर घुस आए थे ...वो कार सेवको को मार रहे थे और उनके
सामानों को लूट रहे थे और साथ ही बाहर खड़ी भीड़ मारो -काटो के नारे लगा
रही थी....! एक लाउड स्पीकर जो कि पास के मस्जिद पर था........... उससे
बार बार ये आदेश दिया जा रहा था कि ..... “मारो... काटो.. लादेन ना
दुश्मनों ने मारो” ! इसके साथ ही.... साथ ही बहार खड़ी भीड़ ने पेट्रोल
डाल कर आग लगाना चालू कर दिया... जिससे कोई जिन्दा ना बचे....! ट्रेन की
बोगी में चारो तरफ पेट्रोल भरा हुआ था....! दरवाजे बाहर से बंद कर दिए गए
थे , ताकि कोई बाहर ना निकल सके...! S-6 और S-7 के वैक्यूम पाइप काट दिए
गए थे ...... ताकि ट्रेन आगे बढ़ ही नहीं सके......! जो लोग जलती ट्रेन
से किसी प्रकार बाहर निकल भी गए तो.... उन्हें तेज हथियारों से काट दिया
गया .... कुछ गहरे घाव की वजह से वहीँ मारे गए और कुछ बुरी तरह घायल हो
गए....! अब सवाल उठता है कि.... हिन्दुओं ने सुबह 8 बजे ही दंगा क्यों
नहीं शुरू कर किया बल्कि हिन्दू उस दिन दोपहर तक शांत बना रहा (ये बात आज
तक किसी को नहीं दिखी है)....???????? असल में..... हिन्दुओं ने जवाब
देना तब चालू किया जब उनके घरों , गावों , मोहल्लो में वो जली और कटी फटी
लाशें पहुंची......! क्या ये लाशें हिन्दुओं को को मुसलमानों की तरफ से
गिफ्ट थी जो हिन्दुओं को शांत बैठना चाहिए था .....सेकुलर बन कर ???????

 हिन्दू सड़क पर उतरे 27 फ़रवरी 2002 की दोपहर से.....! पुरे एक दिन
हिन्दू शांति से घरो में बैठे रहे....| अगर वो दंगा हिन्दुओं ने या मोदी
ने करना था तो 27 फ़रवरी 2002 की सुबह 8 बजे से ही क्यों नहीं चालू
हुआ....??? जबकि मोदी ने 28 फ़रवरी 2002 की शाम को ही आर्मी को सडको पर
लाने का आदेश दिया जो कि अगले ही दिन 1 मार्च 2002 को हो गया और सडको पर
आर्मी उतर आयी ..... गुजरात को जलने से बचाने के लिए....! पर भीड़ के आगे
आर्मी भी कम पड़ रही थी तो 1 मार्च 2002 को ही मोदी ने अपने पडोसी
राज्यों से सुरक्षा कर्मियों की मांग करी...! ये पडोसी राज्य थे
महाराष्ट्र (कांग्रेस शासित- विलास राव देशमुख -मुख्य मंत्री), मध्य
प्रदेश (कांग्रेस शासित- दिग्विजय सिंह -मुख्य मंत्री), राजस्थान
(कांग्रेस शासित- अशोक गहलोत- मुख्य मंत्री) और पंजाब (कांग्रेस शासित-
अमरिंदर सिंह मुख्य मंत्री) ...! क्या कभी किसी ने भी.......... इन
माननीय मुख्यमंत्रियों से एक बार भी पुछा है कि ........ अपने
सुरक्षाकर्मी क्यों नहीं भेजे गुजरात में जबकि गुजरात ने आपसे सहायता
मांगी थी..........??????? या ये एक सोची समझी गूढ़ राजनितिक विद्वेष का
परिचायक था.... इन प्रदेशो के मुख्यमंत्रियों का गुजरात को सुरक्षा
कर्मियों का ना भेजना...???? उसी 1 मार्च 2002 को हमारे राष्ट्रीय
मानवाधिकार (National Human Rights) वालो ने मोदी को अल्टीमेटम दिया ३
दिन में पुरे घटनाक्रम का रिपोर्ट पेश करने के लिए ...! लेकिन... कितने
आश्चर्य की बात है कि... यही राष्ट्रीय मानवाधिकार वाले २७ फ़रवरी २००२
और 28 फ़रवरी 2002 को गायब रहे ..... इन मानवाधिकार वालो ने तो पहले दिन
के ट्रेन के फूंके जाने पर ये रिपोर्ट भी नहीं माँगा कि क्या कदम उठाया
गया गुजरात सरकार के द्वारा...! एक ऐसे ही सबसे बड़े घटना क्रम में दिखाए
गए या कहे तो बेचे गए........ “गुलबर्ग सोसाइटी” के जलने की....... इस
गुलबर्ग सोसाइटी ने पुरे मीडिया का ध्यान अपने तरफ खींच लिया | यहाँ एक
पूर्व सांसद एहसान जाफरी साहब रहते थे......! इन महाशय का ना तो एक भी
बयान था २७ फरवरी २००२ को और ना ही ये डरे थे उस समय तक.......!
लेकिन...... जब २८ फरवरी २००२ की सुबह जब कुछ लोगो ने इनके घर को घेरा
जिसमे कुछ कुछ तथाकथित मुसलमान भी छुपे हुए थे..... तो एहसान जाफरी जी ने
भीड़ पर गोली चलवा दिया ........ अपने लोगो से जिसमे 2 हिन्दू मरे और 13
हिन्दू गंभीर रूप से घायल हो गए.....! जब इस घटनाक्रम के बाद इनके घर पर
भीड़ बढ़ने लगी तो ये अपने यार-दोस्तों को फ़ोन करने लगे और तभी गैस
सिलिंडर के फटने से कुल 42 लोगों की मौत हो गयी....! यहाँ शायद भीड़ के
आने पर ही एहसान साहब को पुलिस को फ़ोन करना चाहिए था ना कि खुद के
बन्दों के द्वारा गोली चलवाना चाहिए था....! पर इन्होने गोली चलाने के
बाद फ़ोन किया डाइरेक्टर जेनेरल ऑफ़ पुलिस (DGP ) को......! यहाँ एक और
झूठ सामने आया..... जब अरुंधती रॉय जैसी लेखिका तक ने यहाँ तक लिख दिया
कि ... एहसान जाफरी की बेटी को नंगा करके बलात्कार के बाद मारा गया और
साथ ही एहसान जाफरी को भी.....! लेकिन..... यहाँ एहसान जाफरी के बड़े
बेटे ने ही पोल खोल दी कि .... जिस दिन उसके पिता की जान गई उस दिन उसकी
बहन तो अमेरिका में थी और अभी भी रहती है.....! तो यहाँ.......... कौन
किसको झूठे केस में फंसाना चाह रहा है ये साफ़ है....! अब यहाँ तक तो सही
था.............. पर............. गोधरा में साबरमती को कैसे इस दंगे से
अलग किया जाता और हिन्दुओं को इसके लिए आरोपित किया जाता ...! इसके लिए
लोग गोधरा के दंगे को ऐसे तो संभाल नहीं सकते थे ...अपने शब्दों से....
तो एक कहानी प्रकाश में आई.....! कहानी थी कि .... कारसेवक गोधरा स्टेशन
पर चाय पीने उतरे और चाय देने वाला जो कि एक मुसलमान था उसको पैसे नहीं
दिए… जबकि गुजराती अपनी ईमानदारी के लिए ही जाने जाते हैं…! चलिए छोडिये
ये धर्मान्धो की कहानी में कभी दिखेगा ही नहीं.... आगे बढ़ते हैं...| अब
कारसेवको ने पैसा तो दिया नहीं बल्कि मुसलमान की दाढ़ी खींच कर उसको
मारने लगे तभी उस बूढ़े मुसलमान की बेटी जो की 16 साल की बताई गई वो आई
तो कारसेवको ने उसको बोगी में खींच कर बोगी का दरवाजा अन्दर से बंद कर
लिया ..! और इसीके के प्रतिफल में....... मुसलमानों ने ट्रेन में आग लगा
दी और 58 लोगो को मार दिया..... जिन्दा जलाकर या काट कर.....! अब अगर इस
मनगढ़ंत कहानी को मान भी लें तो कई सवाल उठते हैं:- क्या उस बूढ़े
मुसलमान चाय वाले ने रेलवे पुलिस को इत्तिला किया...??????? रेलवे पुलिस
उस ट्रेन को वहाँ से जाने नहीं देती या लड़की को उतार लिया जाता..... उस
बूढ़े चाय वाले ने 27 फ़रवरी 2002 को कोई FIR क्यों नहीं दाखिल
किया...????? 5 मिनट में ही सैकड़ो लीटर पेट्रोल और इतनी बड़ी भीड़ आखिर
जुटी कैसे....???????? सुबह 8 बजे सैकड़ो लीटर पेट्रोल आखिर आया कहाँ
से...................?????????
एक भी केस 27 फ़रवरी २००२ की तारीख में
मुसलमानों के द्वारा क्यों नहीं दाखिल हुआ..........??????? अब रेलवे
पुलिस कि जांच में ये बात सामने आई कि ...... उस दिन गोधरा स्टेसन पर कोई
ऐसी घटना हुई ही नहीं थी...! ना तो चाय वाले के साथ कोई झगडा हुआ था और
ना ही किसी लड़की के साथ में कोई बदतमीजी या अपहरण की घटना हुई.....!
इसके बाद आयी नानावती रिपोर्ट में कहा गया है कि .... जमीअत-उलमा-इ-हिंद
का हाथ था उन 58 लोगो के जलने में और ट्रेन के जलने में....! उससे भी
बड़ी बात कि.....दंगे में 720 मुसलमान मरे तो 250 हिन्दू भी मरे.....!
मुसलमानों के मरने का सभी शोक मनाते हैं........चाहे वो सेकुलर हिन्दू
हो.... चाहे वो मुसलमान हो या चाहे वो राजनेता या मीडिया हो ! पर दंगे
में 250 मरे हुए हिन्दुओं और साबरमती ट्रेन में मरे 58 हिंदुवो को कोई
नहीं पूछता है....कोई बात तक नहीं करता है ..! सभी को केवल मरे हुए
मुसलमान ही दिखते हैं...! एक और बात काबिले गौर है क्या किसी भी मुस्लिम
लीडर का बयान आया था साबरमती ट्रेन के जलने पर....??????? क्या किसी
मुस्लिम लीडर ने साबरमती ट्रेन को चिता बनाने के लिए खेद प्रकट
किया.....????????? इसीलिए सच को जानिए...... और जो भी गुजरात दंगे की
बात करे अथवा नरेन्द्र मोदी के बारे में बोले....... उसे उसी की भाषा में
जबाब दें....! गुजरात दंगा..... मुस्लिमों के द्वारा शुरू किया गया
था..... और हम हिन्दुओं को उनसे इस बात का जबाब मांगना चाहिए..... और
उन्हें जिम्मेदार ठहराना चाहिए....! अथवा... क्या वे लाशें हिन्दुओं को
को मुसलमानों की तरफ से गिफ्ट थी जो हिन्दुओं को शांत बैठना चाहिए था
.....?????? जय महाकाल...!!!

 स्रोत: जय हिंद -हिन्दू भारत का लेख... dated 2 may 2012 नोट: इस पोस्ट
को इतना शेयर करें कि..... कट्टरपंथी मुस्लिमों और सेकुलरों की बोलती बंद
हो जाए..... तथा भारत के बच्चे-बच्चे की जुबान पर ये सच आ जाये...... तभी
हम नरेन्द्र भाई मोदी के दुश्मनों को मुंहतोड़ जबाब दे पाएंगे... —

शनिवार, 16 मार्च 2013

हर महीने तीन दंगे, रोज एक बलात्‍कार, तीन मर्डर :अखिलेश सरकार का एक साल, अभी बहुत कुछ बाकी है....

लखनऊ. जो जंगलराज इन दिनों एक साल के अखिलेश राज की सबसे बड़ी पहचान बना हुआ है, उसके अंदेशे प्रदेशवासियों को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद ही सताने लगे थे, क्योंकि सपा कार्यकर्ता सत्ता की पदचाप सुनते ही उपद्रवी हो उठे थे। इसीलिए 15 मार्च 2012 को शपथ लेते समय अखिलेश ने लोगों को यह कह कर उन्हें आश्‍वस्त किया था कि, ‘अब तक जो हुआ, सो हुआ, आज से प्रदेश की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी मेरी।’ पर उन्हें मुंह चिढ़ाते हुए हुड़दंगियों ने थोड़ी ही देर बाद वह मंच तोड़ डाला, जिस पर शपथ-ग्रहण हुआ था। हालांकि उस वक्‍त अखि‍लेश यादव ने हुड़दंगि‍यों को सपा से नि‍काल बाहर कि‍या, पर वहीं से अखि‍लेश सरकार का भवि‍ष्‍य लोगों को साफ दि‍खाई देने लगा। अब, जबकि एक साल पूरे हो गए हैं, मंच से नि‍कला हुड़दंग ब्‍यूरोक्रेसी से लेकर राजनीति में हावी है। प्रस्‍तुत है अखि‍लेश सरकार का एक साल का लेखा जोखा- 
 
यूपी में अफसरशाही की अगर स्थिति समझनी है तो पिछले एक साल में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बयान पर ही गौर कर लीजिए। आमतौर पर उन्‍होंने कई बार सीएम अखिलेश को सार्वजनिक तौर पर हिदायत दी कि अफसर क्षेत्र के नेताओं की नहीं सुनते। इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई कीजिए। यही नहीं पार्टी के वरिष्‍ठ नेता मोहम्‍मद आजम खां तो अफसरशाही पर डंडा चलाने की बात कह चुके हैं वह अलग बात है कि बाद में मुकर गए। खुद सीएम अखिलेश भी अफसरों से परेशान दिखते हैं, वह लगातार उन्‍हें अपनी साख सुधारने की हिदायत देते रहते हैं। लेकिन तस्‍वीर का दूसरा पहलू ये है कि इसी यूपी सरकार के प्रमुख सचिव से लेकर डीएम तक या तो सीबीआई जांच में फंसे हैं या किसी घोटाले में शामिल हैं। साल बीत गया लेकिन अखिलेश सरकार ने इन पर शायद कभी 'गौर' नहीं किया।
 
वैसे अखिलेश सरकार द्वारा पीसीएस और पीपीएस अफसरों के प्रमोशन देने से इस समय ब्‍यूरोक्रेसी काफी मजबूत होती दिखाई दे रही है। लेकिन पहले अफसरों की कमी से जूझ रही सरकार के लिए अब नया संकट खड़ा होता दिख रहा है, वह है 'किस' अफसर को 'किस' पद पर बिठाया जाए। यही कारण है कि कभी डीजीपी मुख्‍यालय में दो दर्जन आईपीएस अटैच कर दिए जाते हैं तो कभी किसी विभाग में पद से ज्‍यादा अफसर तैनात कर दिए जाते है।
 
नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव के साथ तीन साल की कैद की सजा पाने वाले आईएएस राजीव कुमार जमानत पर बाहर आ गए। गौरतलब है कि नोएडा प्‍लाट आवंटन घोटाला मुलायम सरकार के ही कार्यकाल में हुआ था। सजा होने के बाद अखिलेश सरकार ने उन्‍हें प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक पद से हटाया जरूर लेकिन जैसे ही वह जमानत लेकर लौटे, उन्‍हें दोबारा उसी पद पर आसीन करा दिया।
 
सीनियर आईएएस सदाकांत इस समय समाज कल्याण विभाग के आयुक्‍त हैं। दो साल पहले वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गृह मंत्रालय में ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर कार्यरत थे। उस दौरान लेह-लद्दाख में 200 करोड़ रुपए का घोटाला उजागर हुआ। सीबीआई ने 2010 में मामले में एफआईआर दर्ज की और उसमें सदाकांत को भी आरोपी बनाया। आखिरकार केंद्र सरकार ने सदाकांत की प्रतिनियुक्ति रद करके उन्हें वापस यूपी कैडर में भेज दिया। यूपी लौटे सदाकांत तो उन्‍हें समाज कल्‍याण विभाग जैसे अहम विभाग की जिम्‍मेदारी दे दी गई।
 
उत्तर प्रदेश की आय में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आबकारी आयुक्‍त पद पर तैनात महेश गुप्ता का नाम 1998 में सूचना विभाग में कर्मचारियों की भर्ती में हुए घोटाले में उजागर हुआ। सीबीआई ने मामले की जांच के दौरान 2008 में ही महेश गुप्ता सहित अन्य अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। मायाराज में विवादित आबकारी नीति बनाने में महेश गुप्ता का ही योगदान माना जाता है। इस नीति के कारण ही पोंटी चड्ढा ने पूरे प्रदेश के शराब कारोबार पर एकछत्र राज कायम कर लिया। अखिलेश सरकार आई तो उम्‍मीद की जा रही थी कि महेश गुप्‍ता को हटाया जा सकता है लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
 
1981 में आईएएस टॉप करने वाले प्रदीप शुक्ला एनआरएचएम घोटाले में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किए गए। करीब तीन महीने जेल में रहने के बाद उन्‍हें जमानत मिली। रिहा होते ही प्रदीप शुक्‍ला ने गिरफ्तारी से पहले के अपनी तैनाती बतौर राजस्व परिषद में सदस्य पद पर ज्वांइन कर लिया। मामले में कोर्ट ने सख्ती दिखाई तो दो दिन बाद उन्हें निलंबित किया गया। प्रदीप शुक्‍ला के मामले में सीबीआई ने अखिलेश सरकार पर आरोप लगाया है कि काफी कोशिश के बाद भी यूपी सरकार ने अभियेाजन की स्‍वीकृति नहीं दी, जिसके कारण प्रदीप शुक्‍ला के खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं हो सकी। 
 
राकेश बहादुर पिछली सपा सरकार में नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर तैनात थे। 2006 में नोएडा में होटलों के लिए प्लाट आवंटन हुए। इनमें घोटाले की बात सामने आने पर बसपा सरकार ने 2007 में इन आवंटनेां को रद कर दिया। 2009 में राकेश बहादुर को मायावती सरकार ने निलंबित कर दिया। 2010 में प्रवर्तन निदेशालय ने राकेश बहादुर के खिलाफ मनी लांड्रिंग का केस दर्ज किया। राकेश बहादुर अखिलेश सरकार बनने के फौरन बाद ही नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर बिठा दिए गए। इस पर कोर्ट ने भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। आखिरकार सरकार को इन्‍हें पद से हटाना ही पड़ा।
 
मुलायम सरकार के दौरान नोएडा के सीईओ पद की जिम्मेदारी संभालने वाले संजीव सरन अखिलेश सरकार बनते ही वापस उसी पद पर पहुंच गए। 2006 में नोएडा में हुए 4000 करोड़ से अधिक के कथित भूमि घोटाले में बसपा सरकार ने इन्हें भी निलंबित कर दिया था। इनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई। मामले की जांच ईओडब्यू मेरठ को सौंपी गई। इन्‍हें अखिलेश सरकार ने दोबारा उसी पद पर बिठा दिया। अदालत ने पद से हटाने का आदेश दिया तो पिछली 16 जनवरी को इन्‍हें वेटिंग में डाला गया। यूपीएसआईडीसी घोटाले में आरोपी आईएएस अफसर के धनलक्ष्मी अखिलेश सरकार में सुलतानपुर के डीएम पद की जिम्‍मेदारी संभाल रही हैं। मुख्यमंत्री की सचिव अनीता सिंह पर पिछली मुलायम सरकार में इनके ऊपर कुछ आरोप भी लगे, इनमें सपा सरकार के कुछ करीबी नेताओं और अधिकारियों को 2005 में नियमों को दरकिनार कर गोमतीनगर के पॉश इलाके में प्लाट आवंटित करना प्रमुख है। अनीता सिंह वर्तमान में मुख्‍यमंत्री अखिलेश की सचिव हैं। जाहिर है सत्‍ता के अधिकतर फैसलों में उनका विशेष योगदान रहता है।
 
अलीगढ़ में 38वीं वाहिनी पीएसी में तैनात डीएसपी वीके शर्मा ने पिछले साल अक्‍टूबर में प्रदेश पुलिस के डीजीपी एसी शर्मा पर गंभीर आरोप लगाया कि वह ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए पैसा लेते हैं। इसके साथ ही उन्‍होंने एटा के डीएम और एसएसपी पर भी गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि एटा में तैनाती के दौरान इन लोगों ने सपा के एक कद्दावर नेता के साथ मिलकर दहेज हत्‍या के मामले में कुछ आरोपियों का नाम हटाने के लिए उन पर दबाव बनाया। गैरकानूनी काम करने से मना करने पर स्‍थानांतरण किया गया। मामले में अखिलेश सरकार ने डीजीपी के खिलाफ तो कोई कार्रवाई नहीं की हां, डीएसपी को सस्‍पेंड जरूर कर दिया। वह कोर्ट से निलंबन निरस्‍त करने का आदेश भी ले आए लेकिन फि‍र भी ज्‍वाइनिंग का इंतजार कर रहे हैं।
 
यूपी कैडर के आईएएस अफसर शशि भूषण को छेड़खानी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। आईएएस शशि भूषण के ऊपर छेड़खानी का यह आरोप गूगल इंडिया एक्जिक्यूटिव ने लगाया। आरोप है कि दिल्ली से लखनऊ आ रही लखनऊ मेल में आईएएस शशि ने उक्त महिला से छेड़खानी की।
 
लखनऊ. जो जंगलराज इन दिनों एक साल के अखिलेश राज की सबसे बड़ी पहचान बना हुआ है, उसके अंदेशे प्रदेशवासियों को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद ही सताने लगे थे, क्योंकि सपा कार्यकर्ता सत्ता की पदचाप सुनते ही उपद्रवी हो उठे थे। इसीलिए 15 मार्च 2012 को शपथ लेते समय अखिलेश ने लोगों को यह कह कर उन्हें आश्‍वस्त किया था कि, ‘अब तक जो हुआ, सो हुआ, आज से प्रदेश की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी मेरी।’ पर उन्हें मुंह चिढ़ाते हुए हुड़दंगियों ने थोड़ी ही देर बाद वह मंच तोड़ डाला, जिस पर शपथ-ग्रहण हुआ था। हालांकि उस वक्‍त अखि‍लेश यादव ने हुड़दंगि‍यों को सपा से नि‍काल बाहर कि‍या, पर वहीं से अखि‍लेश सरकार का भवि‍ष्‍य लोगों को साफ दि‍खाई देने लगा। अब, जबकि एक साल पूरे हो गए हैं, मंच से नि‍कला हुड़दंग ब्‍यूरोक्रेसी से लेकर राजनीति में हावी है। प्रस्‍तुत है अखि‍लेश सरकार का एक साल का लेखा जोखा- 
 
यूपी में अफसरशाही की अगर स्थिति समझनी है तो पिछले एक साल में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बयान पर ही गौर कर लीजिए। आमतौर पर उन्‍होंने कई बार सीएम अखिलेश को सार्वजनिक तौर पर हिदायत दी कि अफसर क्षेत्र के नेताओं की नहीं सुनते। इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई कीजिए। यही नहीं पार्टी के वरिष्‍ठ नेता मोहम्‍मद आजम खां तो अफसरशाही पर डंडा चलाने की बात कह चुके हैं वह अलग बात है कि बाद में मुकर गए। खुद सीएम अखिलेश भी अफसरों से परेशान दिखते हैं, वह लगातार उन्‍हें अपनी साख सुधारने की हिदायत देते रहते हैं। लेकिन तस्‍वीर का दूसरा पहलू ये है कि इसी यूपी सरकार के प्रमुख सचिव से लेकर डीएम तक या तो सीबीआई जांच में फंसे हैं या किसी घोटाले में शामिल हैं। साल बीत गया लेकिन अखिलेश सरकार ने इन पर शायद कभी 'गौर' नहीं किया।
 
वैसे अखिलेश सरकार द्वारा पीसीएस और पीपीएस अफसरों के प्रमोशन देने से इस समय ब्‍यूरोक्रेसी काफी मजबूत होती दिखाई दे रही है। लेकिन पहले अफसरों की कमी से जूझ रही सरकार के लिए अब नया संकट खड़ा होता दिख रहा है, वह है 'किस' अफसर को 'किस' पद पर बिठाया जाए। यही कारण है कि कभी डीजीपी मुख्‍यालय में दो दर्जन आईपीएस अटैच कर दिए जाते हैं तो कभी किसी विभाग में पद से ज्‍यादा अफसर तैनात कर दिए जाते है।
 
नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव के साथ तीन साल की कैद की सजा पाने वाले आईएएस राजीव कुमार जमानत पर बाहर आ गए। गौरतलब है कि नोएडा प्‍लाट आवंटन घोटाला मुलायम सरकार के ही कार्यकाल में हुआ था। सजा होने के बाद अखिलेश सरकार ने उन्‍हें प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक पद से हटाया जरूर लेकिन जैसे ही वह जमानत लेकर लौटे, उन्‍हें दोबारा उसी पद पर आसीन करा दिया।
 
सीनियर आईएएस सदाकांत इस समय समाज कल्याण विभाग के आयुक्‍त हैं। दो साल पहले वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गृह मंत्रालय में ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर कार्यरत थे। उस दौरान लेह-लद्दाख में 200 करोड़ रुपए का घोटाला उजागर हुआ। सीबीआई ने 2010 में मामले में एफआईआर दर्ज की और उसमें सदाकांत को भी आरोपी बनाया। आखिरकार केंद्र सरकार ने सदाकांत की प्रतिनियुक्ति रद करके उन्हें वापस यूपी कैडर में भेज दिया। यूपी लौटे सदाकांत तो उन्‍हें समाज कल्‍याण विभाग जैसे अहम विभाग की जिम्‍मेदारी दे दी गई।
 
उत्तर प्रदेश की आय में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आबकारी आयुक्‍त पद पर तैनात महेश गुप्ता का नाम 1998 में सूचना विभाग में कर्मचारियों की भर्ती में हुए घोटाले में उजागर हुआ। सीबीआई ने मामले की जांच के दौरान 2008 में ही महेश गुप्ता सहित अन्य अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। मायाराज में विवादित आबकारी नीति बनाने में महेश गुप्ता का ही योगदान माना जाता है। इस नीति के कारण ही पोंटी चड्ढा ने पूरे प्रदेश के शराब कारोबार पर एकछत्र राज कायम कर लिया। अखिलेश सरकार आई तो उम्‍मीद की जा रही थी कि महेश गुप्‍ता को हटाया जा सकता है लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
 
1981 में आईएएस टॉप करने वाले प्रदीप शुक्ला एनआरएचएम घोटाले में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किए गए। करीब तीन महीने जेल में रहने के बाद उन्‍हें जमानत मिली। रिहा होते ही प्रदीप शुक्‍ला ने गिरफ्तारी से पहले के अपनी तैनाती बतौर राजस्व परिषद में सदस्य पद पर ज्वांइन कर लिया। मामले में कोर्ट ने सख्ती दिखाई तो दो दिन बाद उन्हें निलंबित किया गया। प्रदीप शुक्‍ला के मामले में सीबीआई ने अखिलेश सरकार पर आरोप लगाया है कि काफी कोशिश के बाद भी यूपी सरकार ने अभियेाजन की स्‍वीकृति नहीं दी, जिसके कारण प्रदीप शुक्‍ला के खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं हो सकी। 
 
राकेश बहादुर पिछली सपा सरकार में नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर तैनात थे। 2006 में नोएडा में होटलों के लिए प्लाट आवंटन हुए। इनमें घोटाले की बात सामने आने पर बसपा सरकार ने 2007 में इन आवंटनेां को रद कर दिया। 2009 में राकेश बहादुर को मायावती सरकार ने निलंबित कर दिया। 2010 में प्रवर्तन निदेशालय ने राकेश बहादुर के खिलाफ मनी लांड्रिंग का केस दर्ज किया। राकेश बहादुर अखिलेश सरकार बनने के फौरन बाद ही नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर बिठा दिए गए। इस पर कोर्ट ने भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। आखिरकार सरकार को इन्‍हें पद से हटाना ही पड़ा।
 
मुलायम सरकार के दौरान नोएडा के सीईओ पद की जिम्मेदारी संभालने वाले संजीव सरन अखिलेश सरकार बनते ही वापस उसी पद पर पहुंच गए। 2006 में नोएडा में हुए 4000 करोड़ से अधिक के कथित भूमि घोटाले में बसपा सरकार ने इन्हें भी निलंबित कर दिया था। इनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई। मामले की जांच ईओडब्यू मेरठ को सौंपी गई। इन्‍हें अखिलेश सरकार ने दोबारा उसी पद पर बिठा दिया। अदालत ने पद से हटाने का आदेश दिया तो पिछली 16 जनवरी को इन्‍हें वेटिंग में डाला गया। यूपीएसआईडीसी घोटाले में आरोपी आईएएस अफसर के धनलक्ष्मी अखिलेश सरकार में सुलतानपुर के डीएम पद की जिम्‍मेदारी संभाल रही हैं। मुख्यमंत्री की सचिव अनीता सिंह पर पिछली मुलायम सरकार में इनके ऊपर कुछ आरोप भी लगे, इनमें सपा सरकार के कुछ करीबी नेताओं और अधिकारियों को 2005 में नियमों को दरकिनार कर गोमतीनगर के पॉश इलाके में प्लाट आवंटित करना प्रमुख है। अनीता सिंह वर्तमान में मुख्‍यमंत्री अखिलेश की सचिव हैं। जाहिर है सत्‍ता के अधिकतर फैसलों में उनका विशेष योगदान रहता है।
 
अलीगढ़ में 38वीं वाहिनी पीएसी में तैनात डीएसपी वीके शर्मा ने पिछले साल अक्‍टूबर में प्रदेश पुलिस के डीजीपी एसी शर्मा पर गंभीर आरोप लगाया कि वह ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए पैसा लेते हैं। इसके साथ ही उन्‍होंने एटा के डीएम और एसएसपी पर भी गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि एटा में तैनाती के दौरान इन लोगों ने सपा के एक कद्दावर नेता के साथ मिलकर दहेज हत्‍या के मामले में कुछ आरोपियों का नाम हटाने के लिए उन पर दबाव बनाया। गैरकानूनी काम करने से मना करने पर स्‍थानांतरण किया गया। मामले में अखिलेश सरकार ने डीजीपी के खिलाफ तो कोई कार्रवाई नहीं की हां, डीएसपी को सस्‍पेंड जरूर कर दिया। वह कोर्ट से निलंबन निरस्‍त करने का आदेश भी ले आए लेकिन फि‍र भी ज्‍वाइनिंग का इंतजार कर रहे हैं।
 
यूपी कैडर के आईएएस अफसर शशि भूषण को छेड़खानी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। आईएएस शशि भूषण के ऊपर छेड़खानी का यह आरोप गूगल इंडिया एक्जिक्यूटिव ने लगाया। आरोप है कि दिल्ली से लखनऊ आ रही लखनऊ मेल में आईएएस शशि ने उक्त महिला से छेड़खानी की।
 
10 हजार छात्रों को लैपटॉप मिले, बाकी सात महीने तक खड़े रहें लाइन में
 
लखनऊ. वैसे तो सीएम अखिलेश सरकार बनते ही ऐलान किया था कि जल्‍द ही छात्रों को उनके वायदे के अनुसार लैपटॉप हाथ में दे देंगे लेकिन वादा पूरा करते-करते साल निकल गया और आखिरकार अखिलेश यादव 10 हजार छात्रों को 11 मार्च को लैपटॉप देने में कामयाब हो गए। वैसे दुनिया भर की सुविधाओं के साथ अखिलेश यादव और मुलायम की तस्‍वीर लिए इस एचपी के लैपटॉप की कहानी भी बड़ी दिलचस्‍प है। सरकार की सोच और मानदंडों को पूरा करने में कंपनियों को काफी मेहनत करनी पड़ी, यही नहीं खुद सरकार को टेंडर निरस्‍त करने की निराशा से जूझना पड़ा। अब लैपटॉप की सप्‍लाई शुरू हो गई है और बताया जाता है कि सितम्‍बर तक 15 लाख छात्रों के हाथ अखिलेश सरकार लैपटॉप पहुंचा देगी। इसमें हर महीने का टार्गेट कंपनी को दिया गया है। 
 
सरकार बनने के करीब छह महीने बाद 9 सितम्‍बर को शासन ने लैपटॉप के जो मानक जारी किए, उनमें लैपटॉप की खरीद के लिए विशेषज्ञों की गठित समिति द्वारा स्पेसिफिकेशन निर्धारित किए जाने के बाद शासनादेश जारी किया। तय किया गया खरीद प्रक्रिया के लिए नामित एजेंसी यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन की ओर से निर्धारित टेंडर जारी किया जाएगा। खास बात यह कि सरकार ने लैपटॉप आपूर्ति करने से पहले केन्द्र सरकार के प्रयोगशाला और स्पेसीफिकेशन कंपनी से मानक और गुणवत्ता की जांच कराने की शर्तें भी रखी।
 
पहले टेंडर की विषमता को देखते हुए किसी भी कम्पनी ने टेंडर के लिए आवेदन ही नहीं किया। दस सितम्बर को हुई प्री ब्रिड कांफ्रेंस में कई कंपनियों ने तकनीकी आधार पर निर्धारित समय के भीतर सैम्पल लैपटॉप तैयार करने में अपनी असमर्थता जता दी, जिससे 1 अक्टूबर को टेंडर की अंतिम तिथि होने के बावजूद कोई भी टेंडर भरा नहीं गया। आखिरकार ये टेंडर प्रक्रिया रद करनी पड़ गई।
 
इसके बाद दोबारा टेंडर निकाला गया,‍ जिसमें चार कंपनियों ने लैपटॉप की आपूर्ति के लिए टेंडर डाले। तकनीकी निविदाएं डालने वाली कंपनियों में एचसीएल, एसर, ह्यूलेट पैकर्ड (एचपी) व लेनोवो रहीं। कंपनियों को 26 नवंबर को तकनीकी प्रस्तुतीकरण करना था, जिसे सिर्फ एचपी ने 10 दिन पहले पूरा किया। उसी दिन आपूर्ति करने वाले लैपटॉप का नमूना भी प्रस्तुत भी किया गया। कंपनियों की निविदाओं का परीक्षण करने के लिए निदेशक यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन की अध्यक्षता में समिति गठित की गई।
 
समिति तकनीकी निविदाओं का मूल्यांकन करने के बाद  प्रस्तुतीकरण के बाद समिति तकनीकी बिड क्वालिफाई करने वाली कंपनी एचपी के नाम को  उजागर किया। पहले वित्तीय निविदा के लिए आखिरी तारीख 1 दिसंबर तय की गई थी लेकिन प्रस्तुतीकरण न होने की वजह से ये भी लटक गई।
 
अब जब लैपटॉप बांटा जाना शुरू हो गया है, तो जाहिर सी बात है उन लाखों छात्रों के दिलों में सवाल कौंध रहा होगा कि उनके हाथ में लैपटॉप कब आएगा? जानकारी के मुताबिक 11 मार्च से 10 हजार छात्रों को लैपटॉप बांटने का काम सितम्‍बर तक 15 लाख छात्रों की अंतिम सीमा तक पहुंच जाएगा। यानी अगले सात महीने में प्रदेश भर में बेरोजगारी भत्‍ते, कन्‍या विद्याधन के चेकों की तरह जिलों में लैपटॉप बांटने का भी अभियान चलाया जाना है। सूत्रों के अनुसार एचपी कंपनी को जिम्‍मेदारी दी गई है उसके मुताबिक कंपनी को लैपटॉप की 75000 लैपटॉप की पहली खेप में दो महीने में देनी है। यानी अप्रैल तक कुल 75 हजार छात्रों को लैपटॉप मिल जाने की उम्‍मीद है। इसके बाद इसके बाद 75 हजार और लैपटॉप सप्‍लाई करने के लिए कंपनी के पास मई तक का समय दिया गया है। जून में इसके बाद खेप की रफ्तार में तेजी आएगी और कंपनी इस महीने सरकार को 3 लाख 75 हजार लैपटॉप उपलब्‍ध कराएगी। जुलाई में भी कुछ ऐसा ही होगा और 3 लाख 75 हजार लैपटॉप की सप्‍लाई आएगी। इसके बाद अगस्‍त और सितम्‍बर में 3-3 लाख लैपटॉप कंपनी देगी, जिसे सरकार छात्रों के हाथ में सौंप देगी।
 
12 महीने के ये 13 मंत्री, किसी पर अपराध तो किसी पर भ्रष्‍टाचार का आरोप
 
लखनऊ. अखिलेश सरकार की पहली वर्षगांठ आज यूपी की जनता उनके उन 13 मंत्रियों, विधायकों को याद कर रही है, जो इन 12 महीनों के समय में कभी अपराध, कभी भ्रष्‍टाचार के लिए चर्चित रहे। किसी ने खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाईं तो किसी का नाम अपहरण, पशु तस्‍करी जैसे अपराधों से जुड़ा। भ्रष्‍टाचार को लेकर खुद वरिष्‍ठ मंत्री शिवपाल यादव की जुबान फि‍सल गई, तो राजा भैया के ऊपर अब हत्‍या के मामले की जांच सीबीआई कर रही है।
 
1) प्रदेश के खाद्य एवं रसद मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के गृह जनपद प्रतापगढ़ के कुण्डा में उनके करीबी प्रधान नन्हे यादव उनके भाई सुरेश यादव की हत्या की गई। साथ ही नन्हे गुट ने विरोधी कमता पाल के घर पर आगजनी की। मौके पर पहुंचे सीओ जिया उल हक को भीड़ ने घेर कर उनकी ही पिस्तौल से मार डाला। राजा भैया पर हत्या की साजिश मामले में केस दर्ज हुआ। उन्हें मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने पड़ा। भारी दबाव के बीच सीएम अखिलेश को मामले की जांच सीबीआई को सौंपनी पड़ी।
 
2) गोण्डा में राजस्व राज्यमंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह पर  राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले में आयुष डॉक्टरों की नियुक्ति के मसले पर सीएमओ पर दबाव डालने और उनका अपहरण करने का आरोप लगा। मामले में पंडित सिंह का मंत्रिमंडल से इस्तीफा हुआ और सरकार की खूब किरकिरी हुई। यही नहीं सीएम अखिलेश को एसपी, डीएम व सीएमओ के खिलाफ भी कार्रवाई करनी पड़ी। पंडित सिंह कुछ समय बाहर रहने के बाद एक बार फि‍र सरकार में मंत्री बना दिए गए हैं। पिछले दिनों उन्‍होंने एक बार फि‍र अपना रंग दिखाते हुए डीएम को ही धमकी दे डाली। दरअसल गोण्‍डा की डीएम रोशन जैकब शहर को साफ-सुथरा करने का अभियान चला रही हैं। इसके लिए अतिक्रमण हटाया जा रहा है। यही बात पंडित सिंह को नागवार गुजरी। पंडित सिंह ने ऐलान किया है कि ये अभियान नहीं रूका तो डीएम को अंजाम भुगतना होगा। उधर डीएम ने भी ये साफ कर दिया है कि वो सत्ता के दवाब में नहीं झुकने वाली।
 
3) 10 अगस्‍त को मंत्री शिवपाल यादव को अफसरों की मीटिंग में यह कहते हुए कैमरे ने कैद कर लिया कि अगर आप कड़ी मेहनत करते हैं तो छोटी चोरी कर सकते हैं लेकिन लूटिए नहीं। 11 अगस्‍त को शिवपाल यादव ने कुंभ की तैयारियों से जुड़ी एक बैठक में कह दिया कि किसी चीज की कमी नहीं होगी चाहे वो कमीशखोरी हो या बिजली, सड़क पानी आर हैंडपम्‍प हो।
 
4) अलीगढ़ के डिबाई विधानसभा क्षेत्र के सपा विधायक भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित ने 25 फरवरी को उर्दू शिक्षकों के प्रतिनिमंडल से बदसलूकी और मारपीट की। मामले में सभापति गणेश शंकर पाण्‍डेय ने सरकार को निर्देश दिया कि घटना की उच्च स्तरीय जांच की जाए और जांच रिपोर्ट मौजूदा बजट सत्र में ही विधान परिषद के पटल पर रखी जाएगी।
 
5) समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय कार्य समिति के सदस्य केसी पाण्डेय पशु तस्करी में फंसे। उनके करीबी माने जाने वाले आशुतोष पाण्डेय का गोण्डा के एसपी नवनीत राणा ने स्टिंग आपरेशन कर डाला। केसी पाण्डेय टेप में आशुतोष पाण्डेय की पैरवी करते सुने गए और आशुतोष एसपी को घूस की पेशकश करते हुए। सरकार की फजीहत हुई। पुलिस ने उन्हें आपराधिक षडय़ंत्र के तहत नामजद किया। लेकिन सीएम अखिलेश ने स्टिंग ऑपरेशन करने वाले गोण्डा एसपी पर ही गाज गिरा दी।
 
6) लखनऊ में खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के उपाध्यक्ष नटवर गोयल जमीन पर कब्जे के विवाद में फंस गए। उन्‍होंने प्रेस फोटोग्राफर की पिटाई की और सरकार की खूब किरकिरी हुई। आखिरकार मुख्यमंत्री ने उनकी लालबत्ती छीनने का फैसला किया।
 
7) विधूना के विधायक प्रमोद गुप्ता के बेटे ने अपने लखनऊ के एमिटी कॉलेज में पूरी क्‍लास के सामने महिला टीचर पर तमाचा जड़ दिया। मामला विधानसभा और विधान परिषद में भी उठा। आखिरकार विधायक के बेटे के खिलाफ केस दर्ज हुआ और अदालत से जमानत हो गई।
 
8) प्रदेश सरकार को गंभीर शिकायते मिलने पर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष वसीम अहमद की छुट्टी करनी पड़ी। व़ह जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना अहमद बुखारी के खास थे। सरकार ने उनके ऊंचे सियासी कद के चलते उन्हें लालबत्ती से नवाजा था। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को उनके खिलाफ लगातार गंभीर शिकायतें मिल रही थीं। फजीहत होने के चलते उन्हें पद से हटाने का फैसला करना पड़ा।
 
9) इलाहाबाद में सपा विधायक विजमा यादव के बेटे के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का मामला सामने आया।
 
10) अम्‍बेडकरनगर के टांडा में हिन्‍दू जागरण मंच के नेता राम बाबू गुप्‍ता की हत्‍या के बाद वहां साम्‍प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। उनके परिवारवालों ने हत्‍या करवाने का आरोप सपा विधायक अजीमुलहक पहलवान पर लगाया।
 
11) इससे पहले पिछले साल अक्‍टूबर में मेरठ में समाजवादी पार्टी के नेता ओमकार यादव पर रंगदारी मांगने का आरोप लगा। उन्होंने एक ज्वैलरी हाउस के मालिक के एक प्लॉट पर काम रुकवाने की धमकी दी और उनसे एक करोड़ रुपये की मांग की। व्यापारी का आरोप है कि इस मामले में पुलिस ने भी उनकी कोई मदद नहीं की।
 
12) सूबे में सपा सरकार बनने के बाद स्‍वागत समारोह में सादगी बरतने की समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव की हिदायतों के बावजूद पूर्व मंत्री एवं वर्तमान विधायक शाकिर अली लखनऊ से अपने गृह जिले देवरिया पहुंचे तो उनके समर्थक स्वागत के लिए प्लेटफॉर्म पर घोड़ा लेकर पहुंचे थे। शाकिर रेलगाड़ी से जैसे ही देवरिया स्टेशन पहुंचे, वहां मौजूद समर्थकों ने नारेबाजी करते हुए उन्हें फूल-मालाओं से लादकर घोड़े पर बिठा दिया। समर्थकों का अभिवादन करते हुए शाकिर घोड़े पर सवार होकर स्टेशन के बाहर तक आए। मामले में सपा सरकार की खूब किरकिरी हुई।
 
13) वहीं बहराइच में पीडब्लूडी के कर्मचारी उस पर प्रदर्शन पर उतारू हो गए जब ठेका ना मिलने पर जिला पंचायत सदस्य गब्बर सिंह ने पीडब्लूडी इंजीनियर ए के वार्ष्णेय को जान से मारने की धमकी दे डाली। इंजीनियर और उसका पूरा परिवार इस घटना से दहशत में हैं। पीडब्लूडी कर्मचारियों का कहना है कि सत्तादारी दल से जुड़ा होने के नाते पुलिस गब्बर सिंह को बचाने की कोशिश कर रही है।
साल भर विकास का खाका खींचती रही सरकार
 
लखनऊ. पिछले एक साल में अखिलेश सरकार ने विकास की नई इबारत लिखने की कोशिश में सबसे ज्‍यादा बेरोजगारी भत्‍ते, कन्‍या विद्याधन, लैपटॉप आदि योजनाओं पर सबसे ज्‍यादा गौर किया। विकास का खाका खींचने के लिए सीएम अखिलेश ने कई योजनाएं, जैसे लखनऊ में मेट्रो प्रोजैक्‍ट, आगरा से लखनऊ सिक्‍स लेन हाइवे, जिलों में नए सब स्‍टेशन स्‍थापित करने, नए डिग्री कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज स्‍थपित करने, सुपर स्‍पेशियालिटी हॉस्पिटल स्‍थापित करने की योजनाएं पेश कीं लेकिन ये कब मूर्त रूप लेंगीं, इसके बारे में नहीं कहा जा सकता।  इस दौरान उन्‍होंने प्रदेश में नए उद्योग धंधे लगाने की आगरा में इन्‍वे्स्‍टर्स समिट आयोजित करने के साथ ही दिल्‍ली में हुए मेले में यूपी सरकार के पंडाल को बेहतर ढंग से पेश किए जाने की कोशिश की गई।
 
यही नहीं सीएम अखिलेश से लखनऊ में आए दिन कभी वर्ल्‍ड बैंक के अध्‍यक्ष से,  कभी बिल गेट्स से तो कभी अमेरिका के व्‍यापारियों से उनकी मुलाकात को काफी सुर्खियां मिलीं। लेकिन इन सबके बीच ये भी सच है कि अभी तक यूपी में किसी बड़ी कंपनी ने कोई बड़ा इन्‍वेस्‍टमेंट करने की इच्‍छा जाहिर नहीं की है। वो अलग बात है कि सरकार इस बात के दावे जरूर कर रही है कि यूपी में इन्‍वेस्‍टमेंट का बेहतर माहौल बना है।
 
बहरहाल, यूपी के विकास की राह में अखिलेश सरकार ने पिछली सरकार की कई अहम योजनाओं को या तो खत्‍म कर दिया या उन्‍हें नए ढंग से समाजवादी रंग दे दिया। सरकार बनने के कुछ महीने बाद ही मई में अखिलेश सरकार ने मायावती के एक फैसले को पलटते हुए ग्रेटर नोएडा के जेवर में ग्रीन फील्‍ड ताज इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने के फैसले को रद कर दिया। यही नहीं माया सरकार की 26 विभिन्‍न योजनाओं को खत्‍म कर दिया गया, इनके लिए बजट में तय की गई करीब 1000 करोड़ रुपए की राशि को समाजवादी पार्टी के चुनावी वायदों को पूरा करने में लगाने का फैसला किया। शहरी विकास, हाउसिंग, ग्राम्य विकास, गरीबी उन्‍मूलन, महिलाओं और लड़कियों के कल्‍याण, शिक्षा, अल्‍पसंख्‍यक कल्‍याण, समाज कल्‍याण और सिंचाई से जुड़ी ये योजनाएं भीमराव अम्‍बेडकर, कांशीराम और सावि‍त्री बाई फुले के नाम थीं।
 
अम्‍बेडकर ग्राम विकास स्‍कीम का नाम बदलकर राम मनोहर लोहिया स्‍कीम कर दिया गया। साथ ही अब इन गांवों के चुनाव की प्रक्रिया में दलित जनसंख्‍या की बजाए पिछड़े वर्ग के लोगों की जनसंख्‍या को आधार बना दिया गया। यही नहीं सरकारी ठेकों में एससी, एसटी को आरक्षण देने के माया के फैसले को भी रद कर दिया गया। इसमें अखिलेश सरकार ने सफाई दी कि 2009 में लागू की गई इस व्‍यवस्‍था के बाद से जो भी काम कराए गए, उनकी गुणवत्‍ता सही नहीं है।
 
जुलाई आई तो अखिलेश सरकार ने बसपा सरकार द्वारा बनाए गए 8 जिलों को खत्‍म कर दिया। इसमें अमेठी से बनाए गए छत्रपति शाहूजी महाराजनगर का नाम बदलकर गौरीगंज कर दिया गया। इसी तरह रमाबाईनगर को कानपुर देहात, प्रबुद्धनगर को शामली, महामायानगर को हाथरस, भीमनगर को बहजोई, पंचशीलनगर को हापुड़, कांशीरामनगर को कासगंज और जेपीनगर को फि‍र से अमरोहा कर दिया गया। 
 
बिजली क्षेत्र की बात करें तो अगर मांग और आपूर्ति में अंतर की बात की जाए तो बसपा शासनकाल में 2007 में 7,479 मेगावाट की मांग के सापेक्ष उत्तर प्रदेश 6,138 मेगावाट की ही आपूर्ति कर पा रहा था। यानी करीब 1,342 मेगावाट की कमी लगातार बनी हुई थी। अब अखिलेश शासनकाल में प्रदेश में करीब 12,000 हजार मेगावाट की मांग के सापेक्ष करीब 9,500 मेगावाट की ही आपूर्ति की जा रही है। यानी पांच सालों में मांग और आपूर्ति के बीच अंतर 1,342 मेगावाट से करीब 2,500 मेगावाट पहुंच चुका है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के शैलेंद्र दुबे बताते हैं चाहे वह बसपा की सरकार हो या सपा की, सभी प्राइवेट कंपनियों पर आश्रित होती जा रही हैं। यही कारण है सार्वजनिक क्षेत्र की कपंनियों की बजाए प्राइवेट सेक्टर से कंपनियों से करार किया जा रहा है।
 
अखिलेश सरकार ने 1000 रुपए प्रति व्यक्ति प्रति माह के हिसाब से हर तीन महीने में बेरोजगारी भत्ते का भुगतान शुरू किया। साथ ही ऐलान किया है कि इन 20 लाख से ज्यांदा बेरोजगारों को नौकरी दिलाने के लिए ऱोजगार कार्यालय जॉब फेयर आयोजित करेगा। जॉब फेयर तो शुरू नहीं हुआ, उलटे सपा सरकार ने करीब साढ़े 8 करोड़ का बेरोजागारी भत्‍ता बांटने के आयोजनों पर ही साढ़े 12 करोड़ रुपए खर्च कर डाले।
 
टीईटी शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया भी जल्द ही करने का दावा किया गया लेकिन हुआ कुछ नहीं मामला कोर्ट में लटका है। खुद सीएम अखिलेश कहते हैं कि प्रदेश में युवाओं को रोजगार दिलाना एक चुनौती है, इसके लिए वह प्रदेश में अवस्‍थापना और औद्योगिक नीति लागू कर ज्यादा से ज्यादा उद्योग धंधे प्रदेश में लाने की कोशिश कर रहे हैं, इससे प्रदेश के युवाओं को रोजगार मिलेगा। तब तक के लिए भत्ता दे रहे हैं। वहीं बालिकाओं को भी ज्यादा से ज्यादा नौकरियों तक पहुंचाने के लिए कन्या विद्याधन दिया जा रहा है, जिससे वे पढ़ाई पूरी कर नौकरियों के लिए काबिल बन सकें। इसके अलावा गरीब बालिकाओं के लिए मुफ्त मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की व्यवस्था की जा रही है।
 
2012 को सत्ता में आते ही सीएम अखिलेश यादव ने जनता दर्शन की व्यवस्था शुरू की। लेकिन जनता दर्शन की यह व्‍यवस्‍था चरमराती ही दिख रही है कभी विधानसभा सत्र के नाम पर तो कभी ज्‍यादा ठंड के नाम पर और तो और कभी सहालग के नाम पर जनता दर्शन हर महीने टलता ही रहता है। अगर अखिलेश सरकार की बात की जाए तो पिछले एक साल में 13,650 करोड़ रुपए की 280 नई योजनाएं चलाई हैं। इनमें 4617 करोड़ रुपए बेरोजगारी भत्ता, छात्रों में लैपटॉप, टैबलेट वितरण, कन्या  विद्याधन, कृषक दुघर्टना बीमा योजना 5 लाख रुपए तक करने के लिए रखे हैं।
 
इन सभी योजनाओं में लैपटॉप और टैबलेट वितरण की योजना के अलावा बाकी सभी योजनाओं पर काम शुरू हो चुका है। इसके अलावा अखिलेश सरकार ने शिक्षा के विस्तार और विकास पर 33,263 करोड़ रुपए, चिकित्साक स्‍वास्‍थ्‍य के लिए 7033 करोड़ रुपए, समाज कल्याण के लिए 14,950 करोड़ रुपए, बिजली पर 585 करोड़ रुपए, भूमि सेना योजना पर 48 करोड़ रुपए, शहरी विकास के लिए 473 करोड़ रुपए, सिंचाई के लिए 740 करोड़ रुपए रखे।           साभार.दैनिक भास्कर