कवि ‘ताहिर’ ने लोकगीत जैसी अपनी इस रचना में यह रूपक बांधा था कि भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन को ब्याहने जा रहा है, भारत के 35 करोड़ लोग बाराती हैं और मातमी बाजे बज रहे हैं। गीत बड़ा ही मार्मिक था, जिसे सुनकर मंच पर बैठे भगत सिंह के पिता रोने लगे। पंडित नेहरू और श्रीमती कमला नेहरू की आंखें भी भीग गईं। श्रोताओं का भी बुरा हाल था। लगता था मानो उनके किसी सगे सम्बन्धी की मृत्यु हो गई है। लोग जार-जार रो रहे थे।
23 मार्च, 1931 को सरदार भगत सिंह को फांसी दी गई थी। उसके लगभग एक महीना बाद की बात है, पश्चिमी पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) के झंग नामक स्थान पर एक बड़ा भारी शहीद स्मृति सम्मेलन हुआ। उसमें भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह, पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनकी पत्नी कमला नेहरू भी सम्मिलित हुए। शोक संतप्त लोगों की अथाह भीड़ थी। मंच पर मियांवाली, सरगोधा और लायलपुर (वर्तमान फैसलाबाद) क्षेत्र के एक प्रसिद्ध पंजाबी कवि राम लभाया ‘ताहिर’ ने शहीद भगत सिंह की स्मृति में एक ऐसा शोकगीत गाया, जो छंद और शैली में ‘घोड़ी’ यानि पंजाब का एक विवाह-गीत था। कवि ‘ताहिर’ ने लोकगीत जैसी अपनी इस रचना में यह रूपक बांधा था कि भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन को ब्याहने जा रहा है, भारत के 35 करोड़ लोग बाराती हैं और मातमी बाजे बज रहे हैं। गीत बड़ा ही मार्मिक था, जिसे सुनकर मंच पर बैठे भगत सिंह के पिता रोने लगे। पंडित नेहरू और श्रीमती कमला नेहरू की आंखें भी भीग गईं। श्रोताओं का भी बुरा हाल था। लगता था मानो उनके किसी सगे सम्बन्धी की मृत्यु हो गई है। लोग जार-जार रो रहे थे।
इस घोड़ी ने पंजाब में ऐसी धूम मचाई कि कवि राम लभाया ‘ताहिर’ से प्रायः हर स्वराज्य सम्मेलन में इसे ही सुनाने की फरमाइश की जाती। घोड़ी घर-घर गूंजने लगी। मेरे परिवार में भी पहुंची और मुझे अक्सर यह अपनी बुआ और मां के दर्द भरे स्वर में सुनाई पड़ने लगी। शैशवावस्था में सुनी उस घोड़ी ने बड़े होने पर मेरे मन में इसके रचयिता से मिलने की लालसा पैदा की, लेकिन मुझे किसी से उनका अता-पता न मिला। किसी को यह भी ज्ञात नहीं था कि ‘ताहिर’ जीवित भी हैं या नहीं। मेरी बुआ और मां की बहुत पहले मृत्यु हो चुकी थी। मैंने अनेक लोगों से पूछा कि कवि न सही, उनकी यह रचना ही किसी को याद हो, लेकिन सब भूल चुके थे। ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले’ गाने वाले देश में स्वतन्त्रता के बाद शहीदों और सुराजी कवियों की जैसी उपेक्षा हुई है, यह उसका एक और प्रमाण था। तभी सौभाग्य से मेरी राम लभाया ‘ताहिर’ जी से भेंट हो गई। तब वे सौ वर्ष के हो रहे थे, लेकिन स्वस्थ और निरोग लगते थे। वे मेरे एक निकट के रिश्तेदार के मित्र निकले, जिन्होंने उन्हें घर पर खाने के लिए आमन्त्रित किया था। संयोग से मैं वहां उपस्थित था। मेरे मन की मुराद पूरी हुई और मैंने ‘ताहिर’ जी से आग्रह किया कि वे अपने स्वर में मुझे भगत सिंह की घोड़ी सुनायें। ‘ताहिर’ जी ने मेरी श्रद्धा और लगन देखकर वह घोड़ी सस्वर सुनाई, जिसे मैंने तत्काल रिकार्ड कर लिया। सौ वर्ष की आयु में भी ‘ताहिर’ जी का कंठ सुरीला था और घोड़ी उन्हें याद थी। वे अपने झंग-सरगोधा वाले पंजाबी उच्चारण के साथ पूरी तन्मयता से घोड़ी सुनाते रहे और मेजबान परिवार मन्त्रमुग्ध-सा बैठा सुनता रहा। मैं भाव-विभोर था। ‘ताहिर’ जी ने झंग में आयोजित उस शहीद स्मृति सम्मेलन के बारे में भी विस्तार से बताया।
वे शायद उस घोड़ी को रिकार्ड कराने को ही जीवित थे, क्योंकि उसके कुछ हफ्रतों बाद मुझे समाचार मिला कि उनका देहान्त हो गया। शहीदों की और राम लभाया ‘ताहिर’ की वह अमूल्य धरोहर पूरे देश की है, इसलिए मैं उसे देश को समर्पित कर रहा हूं।
इस घोड़ी में कवि ‘ताहिर’ ने पंजाबी विवाह से सम्बन्धित सारी रस्मों को सांग रूपक में पिरोया है। जब दूल्हा सजने लगता है, तो उसकी माता और अन्य महिलाएं सस्वर गाती हैं-
आओ नी भैणो रल-मिल गाविये घोड़ियां,
जंज तां होई ए तिआर वे हां
मौत कुड़ी नूं परनावन चल्लिआ
भगत सिंघ सरदार वे हां
आओ बहिनों, मिलकर घोड़ी के गीत गायें। बारात तैयार खड़ी है। सरदार भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन से विवाह करने जा रहा है। दूल्हे के सिर पर देखो कैसा विचित्र मुकुट है-
फांसी दी टोपी वाला मुकट बणा के
सेहरा तां बद्धा झालरदार वे हां
उसने काली थैली-नुमा टोपी का मुकुट धारण किया है, जिसे फांसी के समय सिर और मुंह पर पहना जाता है और (बालों की लटों वाला) उसका झालरदार सेहरा है।
भारत दी माता उत्तों छंदा चा कीता
पाणी तां पीता उत्तों वार वे हां
दूल्हे की माता स्वयं भारत माता है, जिसने बेटे की नजर उतारने के लिए उसके सिर पर से पानी को न्योछावर करके खुद पी लिया है। माता बलैयां ले रही है कि बेटा सलामत रहे। पंजाब में शादी के समय घड़ोली भरने की एक रस्म होती है, जब भाभियां घड़े लेकर पास के कुएं से पानी लाती हैं और देवर को नहलाती हैं। फिर दूल्हे की कलाई पर लाल रंग का मौली-सूत्र ;कलावाद्ध बांधा जाता है। भगत सिंह के लिए भी ये दोनों रस्में हुईं-
हंजुआं दे पाणी नाल भरके घड़ोली,
लहू दी रखी ए मौली तार वे हां
आंसुओं से घड़ोली भरने की रस्म अदा हुई और मौली थी खून का सम्बन्ध-सूत्र। दूल्हे के हाथों में मेहंदी लगाई जाती है और उसकी कलाई पर गान्ना अर्थात गंडा बांधा जाता है, जिसे विवाह होने के बाद ही खोला जाता है। भगत सिंह की मेहंदी और गान्ना किस तरह के थे-
खूंनी मेहंदी चा तैनूं लाई फिरंगीआं,
हथकड़ियां दा गांन्ना वी तिआर वे हां
फिरंगियों ने तुझे खूनी मेहंदी लगाई है और हथकड़ियों का गंडा बांधा है। पंजाब में दूल्हा स्नान करने के बाद पटरे पर से उछलकर आगे रखी घड़े के ढक्कन जैसी मिट्टी की छूंनियों पर इस तरह छलांग लगाता है कि वे सबकी-सब टूट जाती हैं। सबका टूटना जरूरी और शुभ माना जाता है। इसे खारे पर चढ़ने की रस्म कहते हैं। भगत सिंह फांसी के तख्ते से खारे पर चढ़ा है और पालथी मारकर बैठ गया है-
फांसी दे तख्त नूं खारा बणा के
बैठा तां चैंकड़ी मार वे हां
अब रस्म होगी घुड़चढ़ी की। घोड़ी की लगाम को बहिनों ने विशेष रूप से सजाया है। उन्होंने परम्परागत ढंग से दूल्हे को लगाम थमाने की रस्म अदा की, जिसके बाद वे भाई से नेग मांगेंगी। विवाहोपरान्त भाई को बहिनों के अधिकार का आदर करने के साथ-साथ उनकी भावनाओं का हमेशा मान रखना होगा-
वाग पकड़ाई वे तेथों भैणां ने मंगनी,
भैणां दा रक्खीं वीरा भार वे हां
खारे पर चढ़ने की रस्म के बाद बाजे बजने लगे-
मातमी वाजे वजदे बूहे धरत दे,
मारू दा राग उचार वे हां
ये बाजे आम नहीं, मातमी बाजे हैं, जो धरती के द्वार पर मारू राग बजा रहे हैं। धर्मनिष्ठ बाबुल गांधी ने लग्न और मुहूर्त का पूरा विचार करके विवाह सम्बन्धी शुभ कार्य आरम्भ किये हैं-
बाबुल गांधी धरमी काज रचाया,
लगन मुहूरत विचार वे हां
भगत सिंह के समान हरी किशन भी मौत से शादी कर रहा है। उसे ‘ताहिर’ ने भगत सिंह के साढ़ू की संज्ञा दी है और कहा है कि दोनों एक साथ लड़की वालों के घर पधारे हैं-
हरी किशन वी तेरा बणिआ ए सांढू,
ढुक्के तुसीं तां इक्के वार वे हां
लेकिन सहबाले कौन हैं? ये हैं राजगुरु और सुखदेव, जिन्हें भगत सिंह के साथ ही फांसी पर लटकाया गया था। इन सहबालों के बीच दूल्हा भगत सिंह कैसा शोभायमान हो रहा है-
राजगुरू ते सुखदेव सहबालड़े,
तुरिआ ए तूं विचकार वे हां
बारात भी छोटी-मोटी नहीं है, भारत के 35 करोड़ नागरिक बाराती हैं, जिनमें कोई पैदल चल रहा है और कोई वाहन पर सवार है। बारातियों ने काली पोशाकें धारण कर रखी हैं, जिनके साथ जाने के लिए कवि ‘ताहिर’ भी पूरा उत्साह दिखा रहे हैं-
पैंत्ती करोड़ तेरे जांजी वे लाड़िआ
पैदल ते कोई असवार वे हां
कालियां पुशाकां पाके जंज है तुर पई,
‘ताहिर’ वी होए ने तिआर वे हां।
राम लभाया ‘ताहिर’ भी सचमुच तैयार थे, मौत के रिश्तेदारों से ‘मिलनी’ करने के लिए। तभी तो इस गीत को सुनाने के कुछ ही हफ्रतों बाद सन 1988 में उनका देहान्त हो गया।
23 मार्च, 1931 को सरदार भगत सिंह को फांसी दी गई थी। उसके लगभग एक महीना बाद की बात है, पश्चिमी पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) के झंग नामक स्थान पर एक बड़ा भारी शहीद स्मृति सम्मेलन हुआ। उसमें भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह, पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनकी पत्नी कमला नेहरू भी सम्मिलित हुए। शोक संतप्त लोगों की अथाह भीड़ थी। मंच पर मियांवाली, सरगोधा और लायलपुर (वर्तमान फैसलाबाद) क्षेत्र के एक प्रसिद्ध पंजाबी कवि राम लभाया ‘ताहिर’ ने शहीद भगत सिंह की स्मृति में एक ऐसा शोकगीत गाया, जो छंद और शैली में ‘घोड़ी’ यानि पंजाब का एक विवाह-गीत था। कवि ‘ताहिर’ ने लोकगीत जैसी अपनी इस रचना में यह रूपक बांधा था कि भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन को ब्याहने जा रहा है, भारत के 35 करोड़ लोग बाराती हैं और मातमी बाजे बज रहे हैं। गीत बड़ा ही मार्मिक था, जिसे सुनकर मंच पर बैठे भगत सिंह के पिता रोने लगे। पंडित नेहरू और श्रीमती कमला नेहरू की आंखें भी भीग गईं। श्रोताओं का भी बुरा हाल था। लगता था मानो उनके किसी सगे सम्बन्धी की मृत्यु हो गई है। लोग जार-जार रो रहे थे।
इस घोड़ी ने पंजाब में ऐसी धूम मचाई कि कवि राम लभाया ‘ताहिर’ से प्रायः हर स्वराज्य सम्मेलन में इसे ही सुनाने की फरमाइश की जाती। घोड़ी घर-घर गूंजने लगी। मेरे परिवार में भी पहुंची और मुझे अक्सर यह अपनी बुआ और मां के दर्द भरे स्वर में सुनाई पड़ने लगी। शैशवावस्था में सुनी उस घोड़ी ने बड़े होने पर मेरे मन में इसके रचयिता से मिलने की लालसा पैदा की, लेकिन मुझे किसी से उनका अता-पता न मिला। किसी को यह भी ज्ञात नहीं था कि ‘ताहिर’ जीवित भी हैं या नहीं। मेरी बुआ और मां की बहुत पहले मृत्यु हो चुकी थी। मैंने अनेक लोगों से पूछा कि कवि न सही, उनकी यह रचना ही किसी को याद हो, लेकिन सब भूल चुके थे। ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले’ गाने वाले देश में स्वतन्त्रता के बाद शहीदों और सुराजी कवियों की जैसी उपेक्षा हुई है, यह उसका एक और प्रमाण था। तभी सौभाग्य से मेरी राम लभाया ‘ताहिर’ जी से भेंट हो गई। तब वे सौ वर्ष के हो रहे थे, लेकिन स्वस्थ और निरोग लगते थे। वे मेरे एक निकट के रिश्तेदार के मित्र निकले, जिन्होंने उन्हें घर पर खाने के लिए आमन्त्रित किया था। संयोग से मैं वहां उपस्थित था। मेरे मन की मुराद पूरी हुई और मैंने ‘ताहिर’ जी से आग्रह किया कि वे अपने स्वर में मुझे भगत सिंह की घोड़ी सुनायें। ‘ताहिर’ जी ने मेरी श्रद्धा और लगन देखकर वह घोड़ी सस्वर सुनाई, जिसे मैंने तत्काल रिकार्ड कर लिया। सौ वर्ष की आयु में भी ‘ताहिर’ जी का कंठ सुरीला था और घोड़ी उन्हें याद थी। वे अपने झंग-सरगोधा वाले पंजाबी उच्चारण के साथ पूरी तन्मयता से घोड़ी सुनाते रहे और मेजबान परिवार मन्त्रमुग्ध-सा बैठा सुनता रहा। मैं भाव-विभोर था। ‘ताहिर’ जी ने झंग में आयोजित उस शहीद स्मृति सम्मेलन के बारे में भी विस्तार से बताया।
वे शायद उस घोड़ी को रिकार्ड कराने को ही जीवित थे, क्योंकि उसके कुछ हफ्रतों बाद मुझे समाचार मिला कि उनका देहान्त हो गया। शहीदों की और राम लभाया ‘ताहिर’ की वह अमूल्य धरोहर पूरे देश की है, इसलिए मैं उसे देश को समर्पित कर रहा हूं।
इस घोड़ी में कवि ‘ताहिर’ ने पंजाबी विवाह से सम्बन्धित सारी रस्मों को सांग रूपक में पिरोया है। जब दूल्हा सजने लगता है, तो उसकी माता और अन्य महिलाएं सस्वर गाती हैं-
आओ नी भैणो रल-मिल गाविये घोड़ियां,
जंज तां होई ए तिआर वे हां
मौत कुड़ी नूं परनावन चल्लिआ
भगत सिंघ सरदार वे हां
आओ बहिनों, मिलकर घोड़ी के गीत गायें। बारात तैयार खड़ी है। सरदार भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन से विवाह करने जा रहा है। दूल्हे के सिर पर देखो कैसा विचित्र मुकुट है-
फांसी दी टोपी वाला मुकट बणा के
सेहरा तां बद्धा झालरदार वे हां
उसने काली थैली-नुमा टोपी का मुकुट धारण किया है, जिसे फांसी के समय सिर और मुंह पर पहना जाता है और (बालों की लटों वाला) उसका झालरदार सेहरा है।
भारत दी माता उत्तों छंदा चा कीता
पाणी तां पीता उत्तों वार वे हां
दूल्हे की माता स्वयं भारत माता है, जिसने बेटे की नजर उतारने के लिए उसके सिर पर से पानी को न्योछावर करके खुद पी लिया है। माता बलैयां ले रही है कि बेटा सलामत रहे। पंजाब में शादी के समय घड़ोली भरने की एक रस्म होती है, जब भाभियां घड़े लेकर पास के कुएं से पानी लाती हैं और देवर को नहलाती हैं। फिर दूल्हे की कलाई पर लाल रंग का मौली-सूत्र ;कलावाद्ध बांधा जाता है। भगत सिंह के लिए भी ये दोनों रस्में हुईं-
हंजुआं दे पाणी नाल भरके घड़ोली,
लहू दी रखी ए मौली तार वे हां
आंसुओं से घड़ोली भरने की रस्म अदा हुई और मौली थी खून का सम्बन्ध-सूत्र। दूल्हे के हाथों में मेहंदी लगाई जाती है और उसकी कलाई पर गान्ना अर्थात गंडा बांधा जाता है, जिसे विवाह होने के बाद ही खोला जाता है। भगत सिंह की मेहंदी और गान्ना किस तरह के थे-
खूंनी मेहंदी चा तैनूं लाई फिरंगीआं,
हथकड़ियां दा गांन्ना वी तिआर वे हां
फिरंगियों ने तुझे खूनी मेहंदी लगाई है और हथकड़ियों का गंडा बांधा है। पंजाब में दूल्हा स्नान करने के बाद पटरे पर से उछलकर आगे रखी घड़े के ढक्कन जैसी मिट्टी की छूंनियों पर इस तरह छलांग लगाता है कि वे सबकी-सब टूट जाती हैं। सबका टूटना जरूरी और शुभ माना जाता है। इसे खारे पर चढ़ने की रस्म कहते हैं। भगत सिंह फांसी के तख्ते से खारे पर चढ़ा है और पालथी मारकर बैठ गया है-
फांसी दे तख्त नूं खारा बणा के
बैठा तां चैंकड़ी मार वे हां
अब रस्म होगी घुड़चढ़ी की। घोड़ी की लगाम को बहिनों ने विशेष रूप से सजाया है। उन्होंने परम्परागत ढंग से दूल्हे को लगाम थमाने की रस्म अदा की, जिसके बाद वे भाई से नेग मांगेंगी। विवाहोपरान्त भाई को बहिनों के अधिकार का आदर करने के साथ-साथ उनकी भावनाओं का हमेशा मान रखना होगा-
वाग पकड़ाई वे तेथों भैणां ने मंगनी,
भैणां दा रक्खीं वीरा भार वे हां
खारे पर चढ़ने की रस्म के बाद बाजे बजने लगे-
मातमी वाजे वजदे बूहे धरत दे,
मारू दा राग उचार वे हां
ये बाजे आम नहीं, मातमी बाजे हैं, जो धरती के द्वार पर मारू राग बजा रहे हैं। धर्मनिष्ठ बाबुल गांधी ने लग्न और मुहूर्त का पूरा विचार करके विवाह सम्बन्धी शुभ कार्य आरम्भ किये हैं-
बाबुल गांधी धरमी काज रचाया,
लगन मुहूरत विचार वे हां
भगत सिंह के समान हरी किशन भी मौत से शादी कर रहा है। उसे ‘ताहिर’ ने भगत सिंह के साढ़ू की संज्ञा दी है और कहा है कि दोनों एक साथ लड़की वालों के घर पधारे हैं-
हरी किशन वी तेरा बणिआ ए सांढू,
ढुक्के तुसीं तां इक्के वार वे हां
लेकिन सहबाले कौन हैं? ये हैं राजगुरु और सुखदेव, जिन्हें भगत सिंह के साथ ही फांसी पर लटकाया गया था। इन सहबालों के बीच दूल्हा भगत सिंह कैसा शोभायमान हो रहा है-
राजगुरू ते सुखदेव सहबालड़े,
तुरिआ ए तूं विचकार वे हां
बारात भी छोटी-मोटी नहीं है, भारत के 35 करोड़ नागरिक बाराती हैं, जिनमें कोई पैदल चल रहा है और कोई वाहन पर सवार है। बारातियों ने काली पोशाकें धारण कर रखी हैं, जिनके साथ जाने के लिए कवि ‘ताहिर’ भी पूरा उत्साह दिखा रहे हैं-
पैंत्ती करोड़ तेरे जांजी वे लाड़िआ
पैदल ते कोई असवार वे हां
कालियां पुशाकां पाके जंज है तुर पई,
‘ताहिर’ वी होए ने तिआर वे हां।
राम लभाया ‘ताहिर’ भी सचमुच तैयार थे, मौत के रिश्तेदारों से ‘मिलनी’ करने के लिए। तभी तो इस गीत को सुनाने के कुछ ही हफ्रतों बाद सन 1988 में उनका देहान्त हो गया।

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