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रविवार, 23 जनवरी 2011

पुस्तक समीक्षा : राष्ट्रवादी कविता



-हेमा पाण्डेय
कवि लक्ष्मी नारायण ‘भाला’ चूंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं इसलिए उनके इस कविता संग्रह ‘भारत में भारत हो’ में राष्ट्रवाद नजर आये तो किसी को अचरज कैसा। भाला की काव्य शैली कि यह विशेषता है कि बिम्ब उकेरने में उन्हें सटीक शब्द की शायद ही खोज-बीन करनी पड़ती है।
प्रस्तुत कविता संग्रह में उन्होंने विभिन्न विषयों को कलमबद्ध किया है। कहीं वो भारतमाता का गुणगान करते हुए दिखते हैं तो कहीं वो देश के युवा को आंदोलित करते हुए नजर आते हैं। इस संग्रह की कविताओं की यह खासियत है कि ये कविता कम और गीत ज्यादा लगती हैं। पाठक इन्हें लोकल ट्रेन की तरह रुक रुक कर नहीं पढ़ता बल्कि राजधानी या शताब्दी एक्सप्रेस की तरह गति के साथ पढ़ता ही चला जाता है। इस उदाहरण से बात सिद्ध हो जाएगी-
‘छोटे छोटे हाथ जोड़कर
अपना शीश झुकाते हैं।
तुतली बोली में भालत मां
तेले गीत गाते हैं।’
ऐसा नहीं है कि लक्ष्मी नारायण भाला ने केवल वैसी ही कविताएं लिखी हैं जो उनके सार्वजनिक जीवन को व्यक्त करती हैं। इस संग्रह में पाठकों को वो कविताएं भी मिलेंगी जिनसे कवि के व्यक्तिगत जीवन की झलक मिलती है। जैसे ‘अनपढ़ा पृष्ठ’ शीर्षक की कविता की ये पंक्तियां-
जीवन की खुली किताब को/ पढ़ते पढ़ाते/ एक पृष्ठ पर/ रुक जाती हैं आंखें/ उस धरातल पर/ जो कहीं सपाट है, कहीं लचीला/ कहीं मुलायम तो कहीं पथरीला।
राष्ट्रवादी लोगों के लिए यह कविता संग्रह अपने पुस्तकालय में संग्रह करने लायक है।
पुस्तक : भारत में भारत हो
कवि : लक्ष्मीनारायण ‘भाला’
प्रकाशक : स्वदेशी प्रेस, शाहदरा, दिल्ली
मूल्य : 150 रुपये
पृष्ठ : 132

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